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क्या देखती हो चाँद को छलनी से?

एक शाम तो ऐसी मिलो,
जब तुममे वफ़ा हो.
एक धागा तो ऐसी बांधों,
जब तुम्हारा मन सच्चा हो.
क्या देखती हो चाँद को?
छलनी से.
और मांगती हो सात जन्मों,
का रिस्ता।
अरे एक जन्म तो पहले,
सही से, किसी का साथ निभा दो.

परमीत सिंह धुरंधर

जाने ह्रदय में किसका नाम लिए?

अधरों पे मुस्कान लिए,
वक्षों पे गुमान लिए.
वेणी उसके नितम्बों पे,
सम्मोहन के बाण लिए.

आँखों में सागर की लहरें,
मुख-मंडल पे अभिमान लिए.
पतली कमर पे यौवन उसके,
हिमालय का भार लिए.

चंचल है वो हिरणी सी,
मादकता का भण्डार लिए.
बलखाती है, लहराती है,
जाने ह्रदय में किसका नाम लिए?

परमीत सिंह धुरंधर

वीणा में तार जैसे

मुख मोड़ कर खड़ी है,
समझाऊं कैसे?
दिल तोड़ कर खड़ी हैं,
मनाऊं कैसे?
कमर पे चोटी लटके,
वीणा में तार जैसे।
बीच में लक्ष्मण रेखा पड़ी है,

बीबी मेरी भाग गयी

इश्क़ में मुझसे गुनाह हो गया,
माँ को छोड़कर मैं बीबी का हो गया.
और जब बीबी भाग गयी,
चार बच्चों को छोड़कर,
माँ ने सब भुलाकर, बच्चों और मुझे,
अपने आँचल में छुपा लिया।

परमीत सिंह धुरंधर

दौलत

इश्क़ ने मेरे समुन्दर सूखा दिया,
हुस्न ने उसके बादलों को पिघला दिया।
मैंने सारी दौलत लुटा दी उसके मुस्कराहट पे,
और अंत में उसने उसी दौलत के लिए,
मेरा प्रेम ठुकरा दिया।

परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम और कलम

मेरा प्रेम घुट कर रह गया,
बस बन कर मेरी कलम की लिखावट।
कोई मिला ही नहीं, की जीवन निसार कर दूँ,
देख – देख कर उसकी मुस्कराहट।

बस ख़्वाबों तक ही सिमित रहा,
मेरा और उसका चुम्बन।
कानों की किस्मत में कहाँ?
की सुने उनके कदमो की आहट.
जाने रब ने क्यों ना लिखा?
बना के मुझे किसी लड़की की चाहत।

परमीत सिंह धुरंधर

जब से चढ़ी है जवानी तुमपे

जब से चढ़ी है जवानी तुमपे,
शहर – शहर तेरा दीवाना है.
झूम रहें हैं पंडित और काजी,
तेरे नजरों का पैमाना है.

सुबहा की धुप सी,
तुम जो निकलती हो छत पे.
क्या बच्चे और क्या बूढ़े?
सबका बस तू ही एक निशाना है.

भौरों ने भी छोड़ दिया है,
कलियों को पीना।
जब से तेरे ओठों को छूकर,
पवन हो गया रसीला है.

दुप्पट्टा रखो या,
मुख को छुपा लो घूँघट में.
कसम खा के बैठें हैं,
उठा के तुझे ले जाएंगे।
इस जीवन का अब बस,
तेरी बाहें ही ठिकाना है.

परमीत सिंह धुरंधर