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अविरलता बिन गंगा निर्मल नहीं 

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga

नर्मदा, गंगा और यमुना जैसी पुरानी नदियां भारतीय उपमहाद्वीप की जीवनरेखा है। बहुसंख्य समाज इन्हें पवित्र मानकर पूजती है। साथ ही यह भी सच है कि इनकी शुद्धता पर ही सवाल है। चिपको आंदोलन के प्रवर्तक और गांधीवादी पर्यावरणविद सुन्दर लाल बहुगुणा ने वर्षों पहले यह मामला उठाया था। आज यह सवाल रह रह कर बराबर उठ रहा है। गंगा एक्सन प्लान की शुरुआत से पहले ही उच्चतम न्यायालय में इसकी शुद्धता का मामला पहुंच चुका था। ढ़ाई–तीन सालों तक यह उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों की परेशानी का सबब बना रहा। फिर जस्टिस राजीव शर्मा और आलोक सिंह की अदालत ने बीते 20 मार्च को मोहम्मद सलीम की याचिका पर सुनावाई करते हुए गंगा रिवर सिस्टम को कानूनी रुप से जीवंत मानने का आदेश जारी किया। पिछले हफ्ते सर्वाेच्च न्यायालय ने इस मामले में स्थगनादेश जारी किया है। इस तरह 108 दिनों तक गंगा और यमुना के संदर्भ में दृष्टिकोण बदलने की कानूनी बाध्यता रही।

प्रधानमंत्री ने बनारस से लोकसभा चुनाव लड़ते हुए गंगा के प्रति अपना भाव जाहिर किया था। फिर उन्होंने नमामि गंगे कार्यक्रम का सूत्रपात किया। अपने ही अंदाज में अमरकंटक की यात्रा कर उन्होंने नमामि देवि नर्मदे अभियान को भी गति प्रदान किया है। इस बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गंगा के मामले में खासे चिंतित दिखते हैं। उन्होंने कहा है कि अविरलता के बिना गंगा की निर्मलता संभव नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि नदियों के संदर्भ में वस्तुतः अवरिलता और निर्मलता समानार्थी शब्द हैं। निश्चय ही उन्होंने एक बड़ी रेखा खींचा है। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह एक साहसिक पहल माना जाएगा। पिछले सत्तर सालों में किसी सरकार ने अविरलता की बात कहने का साहस नहीं किया। इसलिए यह एक दिलचस्प ऐतिहासिक मोड़ है।

पटना में बिहार सरकार ने फरवरी के आखिरी हफ्ते में बातचीत का सिलसिला शुरु किया था। गंगा के सवाल पर यह एक इंटरनेशनल कांफ्रेंस थी। कुछ समय पहले चीनी विद्वान हू शीसेंग ने पड़ोस में ऐसी ही एक पंचायत हिमालय के सवाल पर आयोजित किया था। फिर नीतीश कुमार अपनी बात को विस्तार देने दल–बल के साथ दिल्ली पहुंचते हैं। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में दो दिनों तक चर्चा चलती रही। पर्यावरण वैज्ञानिक से संन्यासी हुए स्वामी सानंद (जीडी अग्रवाल) उनके साथ खड़े थे। गाद की समस्या पर बात करने वाले विद्वानों की बात समाप्त होने पर जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव ने दस सूत्रीय दिल्ली घोषणापत्र भी जारी किया। इस पंचायत में उन्होंने गंगा की धाराओं पर खड़े अभियांत्रिकी के हैरतअंगेज कारनामों के कारण बिहार में पनपी गाद और भूक्षरण की समस्या से निजात पाने का सपना देखा है। इस क्रम में बताते हैं कि सूबे की सरकार ने इसी मद में पिछले पांच सालों में एक हजार करोड़ से ज्यादा धनराशि खर्च किया है। साथ ही माधव चितले समिति की रिपोर्ट का जिक्र करते हैं। वास्तव में फरक्का बराज से नदी बेढ़ब हो जाती है। इससे बिहार में भारी अपव्यय होता है। आज अविरलता का मामला उठाने का मूल आधार यही है। इस अवसर पर राज्य के जल संसाधन मंत्री ने केन्द्र से संवाद में होने वाली चूक का जिक्र किया था। केन्द्र और राज्य की सरकारों के बीच संवादहीनता दूर होनी चाहिए। इस तरह की त्रुटियों और गतिरोधों से उपजी चुनौतियों का जिक्र न्यायालय के आदेशों में भी है।

आज नमामि गंगे में हो रही तरक्की का विरोध बनारस के घाटों पर मल्लाह कर रहे हैं। स्थानीय नाविकों और गंगाभक्तों ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रस्तावित तैरने वाली जेटी का जोरदार विरोध किया है। यह उनकी जीविका ही नहीं बल्कि अविरलता से जुड़ा मामला है। गंगा की अविरलता पर चल रही चर्चा का इतिहास 170 साल पुराना है। महामना मदन मोहन मालवीय इस आंदोलन के महानायक माने जाते हैं। उन्नीसवीं सदी के मध्य हिन्दू समाज में गंगा की अविरलता का सवाल जोर-शोर से उठने लगा था। उस युग में भारतीय समाज नदियों पर बनने वाले पुल का भी विरोध करता था। इस लिहाज से बनारसी मल्लाहों की पारंपरिक समझ अब तक भी नष्ट नहीं हुई। इन्हीं रहस्यों को समझने चार–पांच सालों बाद मैंने फिर काशी का रुख किया था।

पहले विश्व युद्ध के कालखंड में महामना ने इसे एक जनांदोलन का रुप दिया। उनके साथ देश की जनता और रियासती सरकारें अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुट खड़ी थीं। आज अपना मतलब खो चुका भागीरथ–बिन्दू नाम से 1916 में छोड़ा गया अविरल प्रवाह उनके सफलता की कहानी कहती है। उन्होंने अंतिम क्षणों में गंगा को बांधने के विषय में चेताया भी था। फिरंगी सरकार सिंचाई के नाम पर नदियों का दोहन करती रही और बाद की सरकारों ने शोषण करने में भी कसर बाकी नहीं रखा। अस्सी के दशक से ही सरकार और न्यायालय लगातार इसमें सक्रियता दिखा रही है। इन प्रयासों को देखकर एक देशी कहावत समझ में आती है, लेने गई पूत और खो आई खसम। यह कैसा दुर्भाग्य है कि आजाद भारत में लोग गंगा–राइट्स से वंचित हो गए।

लाखों साल पुरानी गंगा का जल हमेशा इस कदर दूषित नहीं रहा। साठ के दशक तक यह जल पीने के लिए प्रयोग किया जाता था। समाज ने शुद्धता सहेजने के लिए तमाम तरह की परंपराएं रचीं। त्याग और बलिदान की उसी परिपाटी ने इनकी पवित्रता को बरकरार रखा। स्वामी सानंद एक दशक से गंगा के अविरलता की मांग कर रहे हैं। करीब तीन साल पहले बनारस में शहीद हुए बाबा नागनाथ छः सालों तक इसी बात पर अनशनरत रहे। 2011 की जून का दूसरा सोमवार गंगापुत्र निगमानंद की शहादत के नाम है। इस बलिदान से देश द्रवित हो उठा था। आज बिहार में अविरलता की बात उठी है। इस बीच आधा युग बीत गया। क्या नीतीशजी सचमुच गंगा मुक्ति की मांग करने वाले आंदोलनकारियों की जमात में शामिल हो रहे हैं? उनके साथ खड़े सत्याग्रहियों को देख कर वाकई यह वहम हो सकता है।

बिहार सरकार की दो बातों पर गौर करने से स्थिति साफ होती है। घोषणापत्र में इस कवायद का मकसद केन्द्र सरकार की गंगा से जुड़ी परियोजनाओं को गति देना बताया गया है। मुख्यमंत्री ने नपे–तुले शब्दों में साफ कहा कि फरक्का बराज तोड़ने की पैरवी करने नहीं, बल्कि गंगा की अविरलता सुनिश्चित करने आए हैं। यहां विरोधाभाषी बातों के बीच एक ऐसी कल्पना है, जिसमें अविरलता कृत्रिम निर्माणों को तोड़े बगैर ही संभव हो। एक दृष्टांत युरोप पेश करता है। करीब चार दशक पहले पर्यावरण से जुड़ी ऐसी समस्या सामने आई। ग्रेट ब्रिटेन में कोयला संचालित विद्युत उत्पादन केन्द्रों से होने वाले प्रदूषण के कारण नाॅर्वे और पश्चिमी जर्मनी के जंगल और झील तबाह हो रहे थे। इसके लिए हर्जाने की मांग उठी। ब्रिटीश सरकार लंबे समय तक पल्ला झाड़ती रही। पर्यावरण विशेषज्ञों के बीच उनकी खूब किरकिरी होती रही। अंत में उन्हें कई बीलियन पाउंड खर्च कर नुकसान की भरपाई करना पड़ा। बिहार सरकार का पहला काम अपव्यय के लिए जिम्मेदार दोषियों को चिन्हित कर उन्हें भरपाई के लिए बाध्य करना चाहिए। साथ ही उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि बिहार में सत्तर के दशक में गंगा की लहरों पर आग की लपट देखा गया था। उस वक्त जय प्रकाश नारायण के कुछ शिष्यों ने इसे उठाया था। आज अविरलता के लिए अनिल प्रकाश जैसे गांधीजन वहीं जनांदोलन में लगे हैं।

वास्तव में गंगा की अविरलता सुनिश्चित करने के लिए कृत्रिम निर्माणों को ध्वस्त करना ही पर्याप्त नहीं है। इस विषय में वयोवृद्ध बहुगुणा साफ–साफ कहते हैं कि इसके लिए हिमालय का भू उपयोग परिवर्तित करना होगा। इस दीर्घकालिक योजना पर सरकारों ने विचार ही नहीं किया। कभी हिमालय चैड़ी पत्तियों वाले वृक्षों से भरा सघन और सदाबहार वन था। अंग्रेजों ने व्यापारिक हितों को साधने हेतु हिमालय की नैसर्गिक वनस्पतियों को नष्ट करने की योजना बनाई। आज इसका परिणाम प्रत्यक्ष है। चैड़ी पत्तियों वाले ओक (बांझ) के बदले नुकीली पत्तियों वाले पाइन (चीर) के पेड़ यत्र–तत्र खड़े हैं। स्थानीय लोग इसी वजह से बार–बार भूक्षरण की समस्या का सामना करते हैं। इसके बावजूद भी हिमालय की पथरीली भूमि के अनुकुल कोई प्रभावी योजना अब तक नहीं बन सकी है।  

गंगा की अविरलता का मामला समूचे उपमहाद्वीप को प्रभावित करता है। यह बड़ा काम बड़े मन से ही संभव है। इस लक्ष्य को साधने के लिए नीतीश कुमार को दलीय राजनीति के दलदल से ऊपर उठ कर महामना होने की जरुरत है। उन्हें पहले अपने सर्मथकों को इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तैयार करना होगा। किसी भी सूरत में ऐसा सभी के सहयोग से ही संभव है। यह केन्द्र और दूसरे राज्यों से जुड़ा मामला है। हिमालयन माॅनसून को प्रभावित करने वाले दक्षिण एशिया के दूसरे देशों और विश्व बैंक जैसे महाजनों से भी बारीकी से जुड़ा है। सभी को परस्पर सहयोग के लिए राजी करने की मुश्किल चुनौती सामने है। आज यदि गंगा की अविरलता का सपना देखते हैं तो इसे पूरा होने में भी कई दशक लगेंगे। यद्यपि इस विषय में सक्रिय विशेषज्ञों का नेतृत्व राजेन्द्र सिंह कर रहे हैं, तथापि अनुपम मिश्र और अरुण कुमार ‘पानीबाबा’ जैसे गांधीवादी पर्यावरणविदों की बातें परिचर्चा से बाहर है। तैरने में कभी सक्षम रहे समाज को आज डूबने से बचने के लिए उनकी तरकीबों को सीखने और समझने की जरुरत है। ऐसी दशा में यह असाधरण भूल मानी जा सकती है। साथ ही इन समस्याओं का वास्तविक समाधान बीसवीं सदी के आॅस्ट्रियन वैज्ञानिक विक्टर शाॅबर्गर की चेतना से युक्त होकर ही संभव है।

Kaushal Kishore

Things You Must Do When Visiting Varanasi.

We’ve written many general articles about the holy city Varanasi and the life along the Ganges river. But people keep asking us what our personal Varanasi highlights are, therefore, we’d now like to share our 7 must do’s when visiting this great city (we left out typical sights like the famous Kashi Vishwanath Temple because we like going off the beaten path): 1,155 more words

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