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क्योंकि हम आम नागरिक हैं!

शायद! 12 जनवरी, 2018 को भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में ‘काला दिन’ के रूप में याद किया जाए। कारण कि इस दिन सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने परंपरा से हटते हुए आंतरिक मामले को प्रेस कांफ्रेंस के जरिये सार्वजनिक किए और मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ आवाज बुलंद किये।

न्यायाधीशों ने कई आरोप भी लगाए थे। इन आरोपों में मुख्य न्यायाधीश से संबंधित मुकदमा, पीठों के चयन को लेकर मुख्य न्यायाधीशों का अधिकार और एक जवाब में सीबीआई के विशेष जज लोया की हत्या का मामला प्रमुख थे।

प्रेस कांफ्रेंस के बाद मत बंट गए। कुछ ने इसे सही ठहराते हुए ‘साहसी कदम’ बताया तो कुछ ‘महाभियोग’ चलाने की बात कह डाले।

मीडिया ने विमर्श को गलत हवा दिया

मीडिया भी पीठ थपथपाने लगी। बहस को अपने-अपने माध्यम से आगे बढ़ाया जाने लगा। अपरिपक्व वार्ताकार, अनुभवहीन लेखक और राजनीतिक नुमाइदंगों को अधिकांश बहस का हिस्सा बनाकर, प्रेस कांफ्रेस वाली ‘सही-गलत’ कदम को अप्रासंगिक बना दिया गया।

विश्वसनीयता का ह्रास

मतों के बंटे होने के बावजूद, इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि प्रेस कांफ्रेंस ने न्यायिक संस्था की विश्वसनीयता को गंभीर क्षति पहुंचायी है। समस्त भारत न्यायिक व्यवस्था में विश्वास व्यक्त करता है। भले ही अकादमिक स्तर पर विभिन्न तरीकों से तर्क-वितर्क हो सकते हैं, लेकिन जैसे ही एक ‘सामान्य नागरिक’ के नजरिये से पूरे घटनाक्रम को देखने का प्रयास करते हैं, ‘गंभीर क्षति’ स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होने लगती है।

प्रेस कांफ्रेंस के एक दिन बाद न्यायाधीश गोगोई कहते हैं कि न्यायालय में कोई संकट नहीं है। न्यायाधीश जोसेफ भी कहते नजर आए कि किसी भी बाहरी को हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है। हम मिलकर मामले को सुलझा लेंगे। तो एक दिन पहले प्रेस कांफ्रेंस करने की क्या जरूरत थी? बी. वी. आचार्य, कर्नाटक के पूर्व एडवोकेट जनरल सवाल उठाते हैं,”वे क्यों मीडिया के समक्ष जाकर न्यायिक व्यवस्था की साख धूमिल किये?”(जनवरी 16, 2018, द हिन्दू)

सांकेतिक पक्षकारों का रुख

प्रेस कांफ्रेंस के बाद केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि यह न्यायपालिका का आंतरिक मामला है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया तथा सुप्रीम कोर्ट के बार एसोसिएशन का रुख भी ऐसा ही रहा। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा संतुलित रुख अपनाए रहे। लेकिन, सवाल बना हुआ है कि क्या न्यायापालिका की धूमिल साख को कब तक हासिल किया जा सकेगा?

न्यायिक सुधार

इसके इतर प्रेस कांफ्रेंस एक महत्वपूर्ण इशारा भी करता है। चारों न्यायाधीश न्यायपालिका में सुधार पर जोर देते हैं। प्रताप भानु मेहता, अशोक विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर, इंडियन एक्सप्रेस में छपे अपने एक लेख में इसी ओर इशारा करते हैं और कहते हैं,”इनमें से एक जो भविष्य के मुख्य न्यायाधीश हैं, के पास ‘न्यायिक सुधार’ की शुरुआत करने का महत्वपूर्ण अवसर है।

अभी पूर्वानुमान लगाना भले ही जल्दीबाजी हो सकता है। लेकिन सुधार की सुगबुगाहट न्यायिक व्यवस्था के अंदर ही होने लगी है। यह सुगबुगाहट कितना सफर तय करती है, समय ही बता पाएगा!

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