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Leaving the past behind.

Saying you are going to leave the past behind, is one of the hardest concepts for most people: because it implies that the past has happened, even though we’re feeling the pain in the present. 386 more words

स्वस्थ जीवन पर,दिमाग का पहरा

यह केवल आज की ही बात नही…

जीवन के धरा पर उतरने से लेकर….

आँखों के बंद होने तक का फसाना है….

ज्यादा गूढ़ बातों के फेर मे मत पड़ो तो…

जीवन सिर्फ, जीभ के स्वाद और,शब्दों के साथ

जीभ के फिसलने और,संभलने का खेल है…..

मन का और जीभ का,बड़ा अद्भुत सा मेल है….

इन दोनो की गहन मित्रता से

सारा जग हैरान और परेशान है……

चिकित्सा जगत के धुरंधरों का भी यही मानना है….

अगर स्वस्थ और खुश रहना है तो…..

मन और जीभ को,दिमाग की बात को

अक्षरश:मानना है……

विचारों के इसी क्रम के साथ…..

हम भी निद्रा देवी के आगोश मे सो गये….

सोते सोते ही ,मिठाईयों, हरी सब्जियों,सूखे मेवे

के साथ-साथ, स्वच्छ जल के वार्तालाप मे शामिल हो गये…..

जनमानस स्वादिष्ट मिठाईयों और, व्यंजनो को फटकार रहा था……

मिठाईयों के मीठे मीठे से स्वाद को,तीखे शब्दों के बाणों से

भेदता जा रहा था…..

तरह तरह की मिठाईयाँ नज़र आ रही थीं….

उलझी हुयी सी जलेबी, चाशनी मे

डुबकी लगा रही थी…..

छेने की मिठाईयाँ, बड़े गर्व के साथ खड़ी थीं…..

स्वादिष्ट होने की बात को,दूर से ही बोल रही थीं….

रसगुल्लों का बड़ा वृहत सा,साम्राज्य दिख रहा था…..

कहीं राजभोग,कहीं गुलाब जामुन,कही छेने का रसगुल्ला

उछल कूद कर रहा था…

हरी सब्जियाँ, सलाद,फलऔर सूखे मेवे

खड़े खड़े ही इतरा रहे थे…..

खुद के सबसे ज्यादा उपयोगी होने की बात को

दर्प के साथ बतला रहे थे……

बोले दिनभर की ऊर्जा को संजोना है तो

हमे साथ मे लीजिये …..

बाकी की चीजों की तरफ से, ज़रा मुख तो फेरिये….

स्वच्छ और शीतल जल था,बोतल के भीतर बंद….

अपने अविरल बहते रहने की बात को, झुठला रहा था…..

बोतल के भीतर से ही मुस्कुरा रहा था…..

बोला!वाटर प्यूरीफायर से निकलकर

बंद बोतलों मे आपके सामने खड़ा हूं…..

जब से स्वच्छ और स्वास्थ वर्धक जल और, बोतलों का साथ हुआ

तब से तरह तरह के ब्रांड से मिला हूं……

प्लास्टिक ही सबसे ज्यादा,जल को प्रदूषित करता है…

देखिये जल को,प्लास्टिक की बोतलों और पाउच के साथ ही

स्वस्थ और स्वास्थ वर्धक भी नज़र आता है…..

नदियों और मीठे जल स्रोत की, दुर्गति की बात को जल

दुखी मन से बोल रहा था …..

व्यायाम शालायें कह लो,या कह लो जिम

व्यंग्य के साथ इठला रहे थे …

बोले,मिठाईयाँ वही है,इंसान भी वही है ….

लेकिन देखिये,अब जमाना बदल गया …..

इंसान पैदल चलना या,अन्य प्रकार के

शारीरिक श्रमों को करना भूल गया ……

ये आधुनिक जमाना है ,आप जैसों की सोच को

मुश्किल पचाना है….

एयर कंडीशनर की शीतल हवा मे ही

पसीना बहाना है…..

मीठा न खाना और,न खिलाना तो

बस एक बहाना है……

असल मे आधुनिकता के इस दौर मे ….

कट्स एंड कर्वस कह लो या…..

सिक्स एब्स का फेर कह लो…..

बस इसी के साथ, सारा जमाना है…..

जेबें अपनी ढीली करते चलो ….

पसीना बहाने के लिये

एयर कंडीशनर की हवा को चुनो ….

यूँ ही लोग मिठाईयों और, स्वादिष्ट व्यंजनों को

बदनाम करते हैं …

दिमाग को पीछे छोड़कर ….

मन और जीभ के फेर मे पड़ते हैं …

मेरे विचार से तो…

मिठाईयाँ हो या स्वादिष्ट व्यंजन….

हरी सब्जियाँ हो, या फल और सूखे मेवे ….

हर चीज स्वस्थ शरीर,और खुश मन के लिये

आवश्यक होती है ……

जीभ और मन की चंचलता ……

दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने शून्य

नज़र आती है ….

It's Not Your Fault

As a teenager myself, deeply in love, mesmerized by passion, and desperately wanting to experience sex for the first time, I never forgot the helplessness of being unable to console my teenage girlfriend after realizing she wasn’t, “ready” at the last possible moment. 304 more words

Mankind At Its Worst

The Sociology of an Unrequited Love

   

        An unrequited love is a type of romantic love that is common among young lovers who misread verbal and nonverbal cues of their beloved and who have yet to learn about their own romantic needs and wants. 483 more words

Relationship

जमीं पर,जमीर की फेहरिस्त

यूं ही आराधना के लिये हाथ जुड़ गये…..

मस्तक ऊपर वाले के दरबार मे

सम्मान के साथ झुक गये…..

शब्द विश्वास के साथ, प्रश्नोत्तर की राह पर मुड़ गये….

हो रहा था ऊपर वाले के दरबार मे, आमना सामना….

मन मे थी आस्था और भक्ति की भावना….

दिख रहा था मुखौटों के पीछे का

किरदार हर किसी का…..

हमने पूछा क्या हाल है शहर का…..

बोले मदमस्त है इंसान जमीं का…..

पुतले चलते हुये दिखते हैं…..

नासमझ और अनजान समझ,जीवन की राह मे छलते हैं…..

धर्म का बाजार सजा दिखता है….

पता है सबको….

कोई मिट्टी तले सोता है…..

कोई मिट्टी मे मिलता है…..

दिखी छोटी सी फेहरिस्त हाथों मे…..

हमने पूछा!सारे जहान का हिसाब-किताब

इन्हीं हाथों से संभालते हो…..

फिर भी इतनी छोटी सी, ही फेहरिस्त लिये

क्यों?इस जहान से उस जहान फिरते हो……

बातों मे हमारी अदब था…..

ऊपर वाले को शायद, गुफ्तगूं करने का अंदाज पसंद था…..

ज़रा सा मुस्कुरा कर बोले….

अपनी रहमतों का पिटारा खोले…..

बोले,अपने शब्दों को संभालते जाना…..

कलम की सकारात्मक आवाज और ताकत को पहचानना…..

कुछ अपनी कहना,कुछ हमारी सुनती जाना…..

ज्यादातर इंसान आता है तब दरबार मे….

जब रह जाता है कुछ बकाया, उसका इस

भौतिकवादी और मायावी संसार मे……

हमारे पास सवाल अनंत थे….

जवाब के लिये, बस छोटे-छोटे से ही कुछ पल थे…..

फेहरिस्त के छोटे से आकार का जवाब मिल गया….

बोले,हम तो ऊपरी चमक दमक देख कर हैरान थे….

पास मे जाकर देखा तो,असली चेहरे

मुखौटों के पीछे,छिपे हुये दिख गये…..

जमीं पर इंसान, भौतिकवादी और अमीर दिख गया…..

लेकिन जमीर के मामले मे

खुद को ही छलता हुआ दिख गया……

बस, फेहरिस्त छोटी इसीलिये रह गयी…..

करना था केवल,जमीर वालों के कर्मों का हिसाब…..

सारा हिसाब किताब बस कागज के

चंद टुकड़ों मे ही सिमट गया……

(सभी चित्र internet से )

Franciscans of Life in Defense of the Family

While driving down the road to Mass, I noticed a trailer park that I had not seen nor heard of before.  It sits in the center of a middle-class neighborhood.  825 more words

Life Issues