Tags » Human Behavior

How do I decide to do what's right? Examining social norms and human behavior

What are social norms?

Social marketing is based in the idea that people will do what is considered socially acceptable. Burchell, Retties, and Patel (2013) describe the key characteristics of the social norm approach to marketing.  961 more words

Strategic Message Design

Selfishness

We are all so selfish….Or maybe it’s more self-centered.

I mean when you really think about it almost EVERYTHING we do is for our own gain.  290 more words

"सुरक्षा " यानी, मै से हम के कदम

एक बार फिर से हमारी कलम….

अखबार मे छपे हुये विज्ञापन से,प्रेरित हो गयी….

“सुरक्षा”की बात पढ़कर….

कुछ अपनी कहने के लिए, अधीर हो गयी….

“सुरक्षा” यानि मै से हम के कदम….

जीवन के लिये महत्वपूर्ण सा

लगता है,न यह विचार….

नन्हा शिशु हो या, भरा पूरा परिवार

या हो समाज …..

“सुरक्षा”है,हर एक जीव का

जन्मसिद्ध अधिकार …..

ज़रा से उन्मुक्त से समाज मे ….

प्रगतिशील तरीके से, जीवन जीने के विचार के साथ …..

“सुरक्षा”शब्द बड़ा मायने रखता है …..

समाज, स्त्री,पुरुष, संपत्ति …..

खुद का शरीर स्वास्थ की बात के साथ ….

प्रकृति !अंधाधुन्ध विकास के साथ….

हर कोई,सुरक्षा के दायरे मे आता है …..

नन्हे शिशु का, नन्हा सा कदम……

जब अपने अभिवावकों के संरक्षण मे…..

डगमगाते हुये कदमों के साथ…..

संभलता हुआ,नज़र आता है ….

शिशु के चेहरे की, निश्छल सी मुस्कान के साथ…..

खुद को सुरक्षित समझने का भाव…..

शिशु के बार बार प्रयास करने के प्रयास मे

अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है….

खुद का शरीर, चीख चीख कर अपने को

स्वस्थ रखने की बात के लिये….

समय समय पर,आगाह करता नज़र आता है…..

लेकिन खुद की ही आवाज को

अनसुना करता हुआ, इंसान……

दौड़ता भागता सा नज़र आता है…..

छोटी बड़ी स्वास्थ्य से संबंधित परेशानियां…..

शरीर को सुरक्षित रखने की बात को

दृढ़ता से बोलती जाती हैं…..

वर्तमान मे सबसे जानी पहचानी सी लगती

है, एक आवाज…..

संचार माध्यम के जरिये हो…

या हो, प्रगतिशील समाज के साथ ….

महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा की बात …..

सुरक्षित से समझे जाने वाले समाज ….

घरों और परिवारों के बीच मे ….

हैरान और परेशान करती है,यह बात ….

सुख,संपत्ति और समृद्धि के लिये लक्ष्मी जी ….

विद्या और बुद्धि के लिये माँ शारदा ….

शक्ति के लिये माँ दुर्गा की,आराधना करते दिखते हुये

भारतीय समाज मे…..

महिला सुरक्षा की बात सबसे बड़ा मुद्दा हो गयी …..

पुरूष प्रधान समाज के सामने….

ये सारी देवियाँ कैसे, और कब शक्तिहीन हो गयीं …..

स्त्रियों का स्वास्थ्य, स्त्रियों की शिक्षा, स्त्रियों का सम्मान ……

ये तीन बातें, मेरे विचार से …

सुरक्षित समाज के लिये …..

सबसे आवश्यक होती हैं ….

“सुरक्षा”से संबंधित अधिकतर बातों का मूल…..

इन्हीं तीन विषय से शुरू होकर ….

इन्हीं पर खत्म होता है …..

जिस देश और समाज ने

इन तीन बातों का,महत्व समझ लिया……

उस समाज और देश ने

सुरक्षित और सकारात्मक समाज की नींव रखा…..

(सभी चित्र internet से )

वादों और प्रलोभनों के साथ राजनीति

( चित्र दैनिक जागरण से )

सत्ता की लोलुपता और राजनीति का प्रभाव…..

वोटरो को प्रभावित करने की कोशिश मे…..

तरह तरह के छल और छद्म से भरा हुआ नेतागणों

का व्यहवार….

नेताओं की पकड़, सामाजिक समस्याओं और

देश की प्रगति से परे हो गयी…..

ये राजनीति है ज़नाब ……

जो इंसानियत और मानवता को पीछे छोड़कर …..

समाज मे चहुंओर खड़ी हो गयी …..

ध्यान से राजनीतिज्ञों को, देखो तो राजनीति….

किसी एक दल या परिवार की, निजी संपत्ति हो गयी…..

अपवादो को छोड़ दो तो….

वर्तमान मे राजनीतिज्ञों की सबसे बड़ी पहचान…

उजला सा परिधान,अवसरवादिता की तलाश….

लेकिन मन की बात का,किसी भी कोने से

पा न सके,कोई भी थाह…

हर समय राजनीतिक तिकड़मों के साथ

उठापटक का ख्याल …..

समझ मे नही आता कभी-कभी ….

कैसे! इतनी तिकड़मों के बीच मे

सहज तरीके से, जीवन को जी सकता है इंसान……

आपसी वैमनस्ययता और विरोध के स्वर

इतने प्रबल हो चले कि….

देश के विकास के लिये चलने वाले,संसद के सत्र

निरस्त होते दिखे….

विरोधाभासी विचार के साथ….

सहमति और असहमति की बात….

हमेशा विकास के लिए जरूरी होती है….

लेकिन पूर्वधारणा या पूर्वाग्रह से ग्रस्त, राजनेताओं के लिए ….

स्वस्थ वातावरण की बात….

आँखों की किरकिरी होती है….

सत्ता का संघर्ष और लोलुपता की बात…..

ये नही है सिर्फ, वर्तमान की कहानी…

राजनीति का इतिहास पढ़ो तो…

वर्तमान एक दूसरे की टांग खींचने मे

जुटा दिखता….

भूतकाल इसतरह की बातों को

आइने के समान दिखाता….

भविष्य काल का, किसी को भी

नही कोई ज्ञान….

राजनीतिक गलियारों की उठापटक मे….

देश और समाज, अनजान सी राहों मे खड़ा दिखता….

समाज का पिछड़ा वर्ग…

कृतज्ञता के भाव के साथ

खड़ा दिखता…..

अहम् की प्रतिमूर्ति, और चाटुकारिता से भरा हुआ नेता….

समाज के पिछड़े वर्ग को

सिर्फ और सिर्फ वोट लेने के दौरान ही

समझता और बूझता दिखता….

तमाम तरह के वादों और प्रलोभन के बीच में

सामान्य जनता ,उलझती हुयी सी दिखती….

यह राजनीति के गलियारो की बात है ज़नाब ….

जहाँ स्वार्थ की रोटी, यूं ही सिकती हुई नही दिखती……

Jordan Peterson is Right: The Perpetual Fight to the top of Dominance Hierarchies

I’m going to make a disclaimer and say that I cannot say everything I want to say about this topic in one post. This is a topic that runs very deep. 1,012 more words

Nature

Without Light

Desperate,
you almost reach out.
You almost make the call
that would undo
the tight little knot
you made
with the loose ends
that have been dragging… 92 more words

Poetry