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Matching the Match

Hey! Haven’t you been able to tell it to the guy or girl sitting next to you, at your school or college, how much you loved them? 470 more words

Life

The Deep-Dark Story of Our Education – Part I

Some time back, I came across a thought provoking blog written by a colleague – a fun guy who occasionally writes controversial stuff, just like me. 2,062 more words

Pondering

Mood Indigo 2016 - IIT Bombay cultural/cult fest - events, dates, registration


Mood Indigo is the annual cultural festival of IIT Bombay and has grown into being Asia’s largest festival. To know more about events & registrations, click here… 13 more words

The-Pre IIT Story

Engineering has become the most opted stream in India. Parents have a dream of providing their children with a wonderful future and engineering is being opted for this purpose. 1,065 more words

Engineering

The LAMP Act - An IITians Proposal to India, Indians & NRIs

Today, 17th July, is being celebrated across the world as International Justice Day, also called as World Day for International Justice or Day of International Criminal Justice. 459 more words

India

कहीं फिर से फ़क अप न हो जाए | WETx AaiAaiTea KayJeePea | Shashi Mukherjee

सुबह १० बजे की बात है। मैं हर शनिवार की तरह बवाना रोड से इलेक्ट्रॉनिक रिक्शा पकड़कर बादली मेट्रो आ रहा था। रिक्शा पहले से ही भरी हुई थी। मैंने हाथ हिलाकर रोका तोह कुछ दूर जाकर रुकी। रिक्शा चालाक ने पुकारा मुझे – “आओ आओ, जल्दी आओ।” मैं उनकी ही सीट में थोड़ा एडजस्ट करके बैठ गया। वे बोलने लगे – “अरे वह बस आ रही थी ना तभी तुम्हारे पास रोक नहीं पाया।” चालक अधेड़ से कुछ ज़्यादा उम्र के थे। हम कुछ दूर पहुंचे तो एक पुल आया। पुल के नीचे छोटी नदी बह रही थी। वहाँ ट्रैफिक क़ाफी था जो धीरे धीरे क्लियर होने लगा। रिक्शा चालक ने इशारे से एक काली गाड़ी को रोकने को कहा ताकि हम पहले निकल जाए। गाड़ी रुकी नहीं और हमारे सामने से निकल गयी। फिर हम भी वहाँ से निकलने लगे। चालक ने मुझे मुस्कुराकर कहा – “छोटे लोगों की कोई नहीं सुनता सर। बड़ी गाड़ी छोटे रिक्शे की कहाँ मानता।” मैंने भी हँसके बोला – “हा! हा! जी बिलकुल! सच बात है।” थोड़ा ठहरकर मैंने फिर बोला – “यहीं तो ज़िन्दगी का…” और मेरी आवाज़ लुप्त हो गयी।

क्यों? सही शब्द मेरे ज़ेहन में नहीं आ रहे थे वाक्य को पूरा करने। और आ भी गए तो यह कन्फर्मेशन कौन प्रेमचंद दें की वह पुल्लिंग शब्द है। ऐसा हर बार होता है मेरे साथ। हिंदी भाषा पर कमांड नहीं है मुझे अब तक। इसलिए बोलचाल में क़ाफी अंडरकॉन्फिडेंट रहता हूँ। क्यों नहीं ऐसा होता की गूगल ऐसी अवस्था में मुझे वर्ड सजेशन्स दें। पर चालक ने खुद ही पूरा कर दिया – “…उसूल है सर।” फिर वह बोलने लगे – “और यह सच बात है। हमें इस नियम को मानकर चलना चाहिए। अगर सभी यह नियम मान ले सर और अपने से बड़ी गाड़ी को पहले जाने दें, तो दुनिया में कोई एक्सीडेंट ही नहीं होगी सर।” मैं बस हाँ में हाँ मिलाने लगा। पीछे की सीटों में दो लड़के एवं दो लडकियां बैठी थी। मेरे ही उम्र के। शायद डी॰टी॰यु॰ के ही होंगे। वह आपस में बात कर रहे थे और उन्हें हमारी बातचीत का कुछ पता न था। चालक फिर बोलने लगे – “पर यह सोच शायद मेरे दिमाग में अब आई है। शायद उम्र ने सिखाया है सर। शायद जवानी में मैं भी उतना ही उग्र और हिंसक था।” मैंने भी हँसके बोला – “जी बहुत अच्छी सोच है।”

पर एक बात मुझे तब से खटक रही थी। कि वह मुझे ‘सर’ क्यों बुला रहे हैं। मुझे लज्जा का अनुभव हो रहा था। मैं सोच रहा था कि उनको बोलूं – “मुझे सर नहीं बेटा बुलाइए।” पर यह कहने में मुझे कह लीजिए शर्म या किसी तरह कि हिचकिचाहट हो रही थी। लेकिन इस बार तो हिंदी भी आसान थी। कोई का-की कन्फ्यूशन नहीं। फिर भी मेरी फट रही थी। अपनी इस एक्सट्रीम हम्बलनेस से मैं बचपन से जूज रहा हूँ। पाने योग्य चीज़ मांग नहीं पाता और अतिरिक्त मना नहीं कर पाता। मुझे डर था कि चालक को यह बात बताते कहीं मेरा फिर से फ़क अप न हो जाए। इतने में पास कि गली से एक स्कूटी निकली जिसे एक जवान लड़का चला रहा था। लड़का वेल बिल्ट और अपमार्केट लुकिंग था। स्कूटी छोटी थी, रिक्शा उससे बड़ी। उसके नज़्दीक पहुँचते ही हमारे रिक्शे कि गति धीमी कर दी गयी। चालक ने इशारा किया कि वह रुके और हम पहले निकले। पर स्कूटीवाला तब तक बड़ी शान से मीटरों दूर पहुँच चुका था। ‘ज़िन्दगी का उसूल’ वाहन का है या सोशल स्टेटस का, मैं बस सोचता ही रह गया।

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