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Safarnama 2k18

Season of Fests is here at Jamia.
With all the various departments organising their fests one after the other, guess who is next in the queue. 55 more words

The Jamia Review

Kedar ko...

Kedar ji Bhojpuri bolte the aur Sanskrit ke bhi the mulniwasi. Mere praant ke Odia Muslims ka bhasha inhi do bhashaon ke pramukhta se ek hadhh tak standardised hai, aur is tarah wo aa gaye mere aatma ke bahat qareeb. 546 more words

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کالج کی ان شاموں میں (College ki un shaamo mein)

کالج کی ان شاموں میں
تجھسے با تیں کرنا
کچھ سننا اور پھر
تیرا چہرہ تکتے رہنا
روز آئیں ایسے لمحے
یہ دلی تمنا کرنا

The Jamia Review

Book for a Cause

I am not one of the avid readers, neither am I a well-read person. I am one of those who spend money on books just to decorate their own little library. 932 more words

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अलीगढ़ टू दिल्ली : एक फर्क नामा

क्या कहोगे ?

क्यूँ आज–कल कलम दाँतों तले दबी रहती है ?

ज़ुबां से बैर तो हमेशा ही था,

क्यूँ लफ्जों से भी आज–कल बिगड़ी रहती है ?

घर की चार दीवारी में दुनिया तराश देते थे,

अब खुले आसमां में क्यूँ तलखी रहती है ?

बेजान पुलों पर रेल सी गुज़र जाती,

वो जो आती–हँसती निकल जाती!

वो हँसी कहाँ गुमसुम रहती है ?

गर्म रास्ते नापते नंगे पैरों की एड़ियों गड़े शूल में,

रफ्तार से लैस गाड़ियों की छूट जाती धूल में,

धूमिल हुई बच्ची दिख जाती

दिख जाती वो लिखने को वजह मिल जाती। मुफलिसी तो यहाँ भी दिल को झकझोर दे!

फिर भी आँखों की नमी कैसे सूखी रहती है ?

रोज़ शमशानों के बीच से निकलता था

पैदल चलने की आहट दुख देती थी।

यहाँ लोगों बीच सन्नाटा (आपसी)

वही याद दिलाता है,?

पर ऐ बड़े शहर तेरे शोर में वो ग़म भी नहीं मना पाता,

चलते थे कंधे मेरे झुक कर शमशानों में,

मुर्दों में आज चलते हैं,

लेकिन न जाने वो ग़मी का ऐहसास नहीं ला पाता!
– अभय यादव
जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय

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