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Kahaani (2012)

Vidya (Vidya Balan) moves slowly in the world of men. Her large pregnant belly requires she take up space they don’t want to cede. Taxi drivers and police tell her she should be at home, resting. 596 more words

Feminism

मैं सामान्य श्रेणी का दलित हूँ साहब मुझे आरक्षण चाहिए।

मैं सामान्य श्रेणी का दलित हूँ साहब मुझे आरक्षण चाहिए।
तेजाब की फैक्टरी में काम करते हुए खुद को जला कर मुझे पाला,
आज उस पिता की बीमारी के इलाज के लिए धन चाहिए,
मैं सामान्य श्रेणी का दलित हूँ साहब मुझे आरक्षण चाहिए।

कमजोर हो रही हैं निगाहें माँ की मुझे आगे बढ़ता देखने की चाह में,
उसकी उम्मीदों को पूरा कर सकूँ उसे मेरा जीवन रोशन चाहिए,
मैं सामान्य श्रेणी का दलित हूँ साहब मुझे आरक्षण चाहिए।

आधी नींद में बचपन से भटक रहा हूँ किराये के घरों में,
चैन की नींद आ जाये मुझे रहने को अपना मकान चाहिए,
मैं सामान्य श्रेणी का दलित हूँ साहब मुझे आरक्षण चाहिए।

भाई मजदूरी कर पढ़ाई करता है थकावट से चूर होकर,
मजबूरियों को भुला उसे सिर्फ पढ़ने में लगन चाहिए,
मैं सामान्य श्रेणी का दलित हूँ साहब मुझे आरक्षण चाहिए।

राखी बंधने वाली बहन जो शादी के लायक हो रही है,
उसके हाथ पीले करने के लिए थोड़ा सा शगुन चाहिए,
मैं सामान्य श्रेणी का दलित हूँ साहब मुझे आरक्षण चाहिए।

कर्ज ले-ले कर दे रहा हूँ परीक्षाएं सरकारी विभागों की,
लुट चुकी है आज जो कर्जदारी में मुझे वो आन चाहिए,
मैं सामान्य श्रेणी का दलित हूँ साहब मुझे आरक्षण चाहिए।

भूखे पेट सो जाता है परिवार कई रातों को मेरा,
पेट भरने को मिल जाये मुझे दो वक़्त का अन्न चाहिए,
मैं सामान्य श्रेणी का दलित हूँ साहब मुझे आरक्षण चाहिए।

जहाँ जाता हूँ निगाहें नीचे रहती हैं मेरी मुझमें गुण होने के बावजूद,
घृणा होती है जिंदगी से अब तो मुझे मेरा आत्मसम्मान चाहिए,
मैं सामान्य श्रेणी का दलित हूँ साहब मुझे आरक्षण चाहिए।

Reads

Stories

​Jaisi Karni Waisi Bharni

Ek gaanv me ek adami rehta tha jiske 3 bacche the(badaa beta 3 saal ka, dusra beta 1.5 saal ka or sabse chota 4 mahine ka). 395 more words

Reads

बस तुम ढूंढ लेना।

मैं आज सोना नही चाहती, आंखें नींद से तर हो चुकीं पर इन्हें बंदकर तुम्हारे ख्वाब देखने की हिम्मत अभी तक जुटा नहीं पाई हूँ। मुझे मालूम है कि तुम भी अच्छी तरह जानते हो कि सुबह होते ही मैं तुम्हें भुलाना शुरू कर देती हूँ, तुम्हारे वजूद का कोई जिक्र भी नही होता, न गैलरी खोलती हूँ न मेमोज़ क्योंकि दोनों ही जगह बस तुम हो। प्लेलिस्ट दिन में तीन दफा बदल देती हूँ क्योंकि मैक्सिमम गाने तुम्हारे प्लेलिस्ट में भी हैं और नए गाने ढूंढ पाने का वक़्त नहीं मिल पा रहा।

कहानियों से दूर रहती हूँ कि डर रहता है किसी ने तुम जैसा न लिखा हो कुछ, फेसबुक नही खोलती क्योंकि नही चाहती कि तुम्हारी ही कहानी या कविता सामने न आ जाये किसी और के शेयर करने पर। न व्हाट्सएप्प में कॉन्टैक्ट्स चेक करती हूँ क्योंकिसबसे पहला कॉन्टैक्ट तुम्हारा है जिसमें तुम्हारी वो तस्वीर अब नज़र नही आ रही। कॉल लॉग्स तो देखना  हम भूल ही चुके हैं। घर से फ़ोन आ जाता है। रूममेट व्हाट्सएप्प कर देती है।

पर फिर दिन ख़त्म हो जाता है। आसमान नारंगी और नीले के बीच में तालमेल बनाना शुरू करता है उधर और इधर कानों में तुम्हारी मुस्कुराहट गूँजती है, आँखों के आगे अंधेरा छाने लगता है और नज़र आता हैं, तुम्हारे आँखों के नीचे का डार्क सर्कल! मैं सकपका जाती हूँ। जहाँ होती हूँ, दो पल ठहर जाती हूँ पर जो दर्द टीस मारते हुए छाती से ससरता हुआ बदन भर में फैल जाता है, वो नहीं ठहरता।

फिर आसमान ख़ुद को काला कर लेता है, मैं चारों तरफ रोशनी कर लेती हूँ कमरे में और ज़ोर-ज़ोर से बातें करती हूँ, खिलखिला कर हंस भी देती हूँ। प्लैन्स भी बना लेती हूँ। सब करती हूँ जो नॉर्मल लोग करते हैं, बस चुप नहीं होती क्योंकि चुप होने पर दिल की धड़कन सुनाई देती है, और उसकी आवाज़ से अब सर में दर्द होने लगता है जो पहले तो तुम होने पर अपनी बातों से मिटा दिया करते थे।

पर फिर एक वक़्त के बाद कमरे में अँधेरा करना पड़ता है,  और जब तकिये पर सर रख लेट जाती हूँ, तब तुम्हारे हाथों को अपने-आप से लिपटा हुआ पाती हूँ। भले ही मैं इस दुनिया की नज़रों में सो जाती हूँ, पर जो हमारी दुनिया है ना, वहाँ मैं तभी जगती हूँ। गाहे बगाहे वहाँ का सूरज तभी खिलता है जब तुम और मैं, दोनों ही, मिल चुके होते हैं। वहाँ तुम्हारे कुकर के सीटी की आवाज़ नही आती, और न ही कोई मुझे पुकार पाता है। वहाँ मैं बेझिझक तुम्हारी आँखों में आँखें डाल कर हर बात करती हूँ।

फिर न जाने अचानक ही क्या हो जाता है। हमारी दुनिया ढह जाती है। उसके दीवार टूटने लगते हैं। आसमान नीले से लाल हो जाता है और जिस कमरे में तुम सोये हुए थे, जिस कमरे की खिड़की पर खड़ी होकर मैं बाहर देख सोच रही थी वो कमरा, वो खिड़की, वो बिस्तर, वो गद्दे, सब देखते ही देखते ओझल हो जाते हैं और तब मैं नींद से चौंक कर जग जाती हूँ। तब यहाँ का अँधेरा मेरे चारों तरफ दीवार बना देता, उस दीवार के बाहर मेरी आवाज़ जा नही पाती।

बस मन में ये, क्या कहते हैं, हाँ, आस लगी रहती है,कि तुम तक आवाज़ जरूर पहुंचेगी, तुम भी जागोगे नींद से, और पुकारोगे मेरा नाम और शायद टूट जाएगी ये दीवार और आएगी मेरे साँसों में साँस। मेरे करवट बदलने पर तुम्हारा चहरा सामने होगा। वही चहरा जिससे देखकर उम्र बिताने का एक पर्सनल प्लैन बनाया था मैंने। तुम्हें शायद बोला भी था कभी, जिक्र किया ही होगा।पर एक फोन कॉल की हज़ारों बातों में ये मेरी छोटी सी ख्वाहिश शायद अनसुनी रह गई तुमसे, और शायद उस भगवान से भी।

मेरे हाँथ ठण्डे पड़ जाते हैं, मैं चाहती हूँ उठकर उस ए.सी. को स्विच ऑफ कर देना, काश कि अपने डर को, सारे दर्द को भी कोई लाल या हरा बटन दबा कर महसूस होने से रोक पाती। खैर, अब रात वापस लौटने वाली है, अब कुछ देर में आसमन ग्रे हो जायेगा।  किसी नई  सुबह की ताक लगाए परिंदे को उसका क्षितिज  पुकारने लगेगा | मुझे फिरसे तुम्हें भूलना होगा।अब शायद मुझे नींद आ रही है। अब शायद मुझे सोना ही होगा।

Short Story: माँ, शादी उलझन है (भाग 1)

आधी रात हो चली है। प्रतीक्षा अपने कमरे में बैठी है। दुल्हन की वेशभूषा में, सिर से पैर तक आभूषणों में सज्जित, वो दीवार की ओर देखती है। चेहरे पर कोई भाव दृश्य नहीं है, मानो मेकअप ने उन्हें नजरों से छिपा दिया हो। वह बस बैठी हुई दीवार को ताकती है। उसकी सखी उसके साथ है, परन्तु वह बालकनी में खड़ी है। दूर में बारात दिखती है, वो उसके बारे में बोल रही है।

प्रतीक्षा के आसपास इतना कुछ घटित हो रहा है, फिर भी वह इन सब से बेखबर लगती है। चुपचाप बैठी बस दीवार की और देखती है।

*****

सुबह के आठ बज रहे है। प्रतीक्षा घर के बाहर स्कूल बस के इंतजार में खड़ी है। उसकी सहेली पूजा अभी तक ना आई थी।

प्रतीक्षा सत्रह वर्ष की है। वह कदकाठी में कम, परन्त आवाज में बुलंद थी। बचपन ख़त्म होने तक उसे बाल छोटे रखने का शौक था। माँ ने कई बार बाल बड़े करनें को लेकर टोका था। छोटे बाल लड़कियों पर अच्छे नहीं लगते, माँ ने कहा था। पर उसने माँ की बाकी बातों की तरह ये बात भी टाल दी थी। पर जब से पूजा न अपने बड़े बालों में चोटी करनी शुरू कर दी थी, तब से उसने बाल बढ़ाने की ठान ली थी। अब वो रोजाना माँ से बालों में तेल की चम्पी कराती और चोटी करने को कहती। शुरू के एक-दो दिन माँ को ये अजीब लगा। लड़की बात कभी ना सुनती और अब अचानक बालो में तेल और चोटी, सोचकर माँ भी हैरान थी। सब सही था, परंतु उसके बाल छोटे थे। चोटी घनी ना बन पाती थी। इसके ऊपर उसकी छोटी बहन उसे ‘चोटी चुहिया’ कहकर चिढ़ाती थी। माँ-बाप सामने होते तो प्रतीक्षा स्वयं को रोक लेती थी, पर अकेले में पाकर वो भी उसको एक-दो थप्पड़ रसीद कर देती थी। फिर जब सुप्रिया कहती कि वो थप्पड़ की बात माँ को बताएगी, तो प्रतीक्षा उसे चुप रहने के प्रलोभन भी देती थी।

प्रतीक्षा घर के बाहर खड़ी है। घर के सामने रखे बड़े गमलों में फूल खिले है। सवेरे मोगरा के सफ़ेद फूल अच्छे लग रहे थे। वो उनकी ही तरफ देख रही थी, कि अचानक उसे कन्धे पर हाथ रखे जाने का आभास हुआ। शरीर में एक पल के लिए स्तब्धता उठती है, परंतु ज्यों ही वो मुड़ती है, पूजा को पाती है। पूजा आ गयी थी, पर हांफ रही थी।

“आज फिर तुझसे उठा ना गया क्या?”, सुबह की वार्ता प्रतीक्षा शुरू कर देती है।

“उठ गयी थी। पर फिर वो हिस्ट्री का असाइनमेंट भी तो पूरा करना था।”, पूजा बोलती है।

“आलसी कही की। एक हफ्ते पहले दिया था असाइनमेंट, तू अब तक पूरा ना कर पायी क्या?”

“अब तेरे जैसी पढनतरु तो हूँ नहीं मैं। बस आज सुबह किया पूरा।”

“ना पता तेरा आलसपन कब हिस्ट्री बनेगा। मैं तो…”

इससे पहले की प्रतीक्षा बात पूरी कर पाती, नजदीक आती बस के हॉर्न ने उस पर पूर्ण विराम लगा दिया था।

Hindi

Kahaani (2012)

“Kahaani” means story and what a story this is. The following review was written in probably 2013 and till date I have seen this perhaps 5 times and each time it still wields the same power without diminishing in authority. 794 more words

Drama

दो लक्कड़हारे - एक नई कहानी

एक लक्कड़हारा था जो बहुत महेनती था वह हर रोज़ लकड़िया काट कर अपने सेठ को देता। सेठ उसे हर महिने २००० रुपये देता। वो अपने सेठ के साथ पिछले पाँच साल से काम कर रहा था, परंतु सेठ ने कभी उसका पगार नही बढ़ाया। उसने भी कभी नही कहा।

Management Fundaas