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Apologetic

Dearest Darling,

Your love is the best thing happened to me. My stupidity had been so that either I make you sad or hurt you with my idiotic reactions. 239 more words

Letters

Love Letters

Darling,

It doesn’t happen every day when your heart is filled with so much love that it begins to drip out for the world to see that your face and eyes both look happy and lively. 164 more words

Letters

खत

मैं इन लम्हों की हकीक़त का बयान शायद लफ्ज़ो में नही कर सकता। एहसास की डोर जो मुझे तुम्हारी तरफ खींचती है उसमें इतनी ताब है कि तुमसे दुरी जैसे मुझे जला रही हो। मैं तुम्हे सामने बैठ कर देखना चाहता हुं। तुम्हारे एक एक नक्श को निहारना चाहता हुं। तुम्हारी सांसो की खुश्बू में डुब कर महकना चाहता हुं।

जब तुमसे बात नही कर रहा होता तब भी मैं तुमसे बात कर रहा होता हुं। फर्क ये है कि मैं अपने दिल को बताता हुं। ये तुम्हारी आंखे, तुम्हारे चेहरे से टपकता हुआ नुर मेरी खुदी को रोशन कर रहा है। मेरे लफ्ज़ो को अचानक ऐसा महसुस हो रहा है जैसे किसी ने उन पर उन्गलियॉ रख दी हों और ये उसके इशारों पर रक्श करने पर आमादा हैं।

ये इबतेदा का हंगामा, एक इन्तेहा बनता जा रहा है। और मुझे इस इन्तेहा से लगाव है। मुझे तुम्हारी नर्मी और तुम्हारी गर्मी दोनो मे शामील होना है। मुझे पीघला कर खुद में उतार सको तो उतार लो। मै तुमसे हो कर, तुम्हारा रहना चाहता हुं।

Letters

Lawatan Ke Galeri Diwani Kraf

Lawatan sambil belajar dari Pondok Tahfiz Raudhatul Jannah ke Galeri Diwani Kraf pada 21.10.2017. Semoga lawatan ini membawa keberkatan dan rahmat kepada galeri kami. Didoakan semoga akan lahir dari adik-adik ini para huffaz yang mahir dalam dua bidang ilmu al-Quran iaitu qiraat (bacaan / hafazan) dan resam (menulis / seni khat). 10 more words

Surah Al-Qiyamah (Thuluth & Nasakh) -2

 وَجُمِعَ ٱلشَّمۡسُ وَٱلۡقَمَرُ (٩) يَقُولُ ٱلۡإِنسَـٰنُ يَوۡمَٮِٕذٍ أَيۡنَ ٱلۡمَفَرُّ (١٠) كَلَّا لَا وَزَرَ (١١) إِلَىٰ رَبِّكَ يَوۡمَٮِٕذٍ ٱلۡمُسۡتَقَرُّ (١٢) يُنَبَّؤُاْ ٱلۡإِنسَـٰنُ يَوۡمَٮِٕذِۭ بِمَا قَدَّمَ وَأَخَّرَ (١٣) بَلِ ٱلۡإِنسَـٰنُ عَلَىٰ نَفۡسِهِۦ بَصِيرَةٌ۬ (١٤)وَلَوۡ أَلۡقَىٰ مَعَاذِيرَهُ ۥ (١٥) لَا تُحَرِّكۡ بِهِۦ لِسَانَكَ لِتَعۡجَلَ بِهِۦۤ (١٦) إِنَّ عَلَيۡنَا جَمۡعَهُ ۥ وَقُرۡءَانَهُ ۥ (١٧) فَإِذَا قَرَأۡنَـٰهُ فَٱتَّبِعۡ قُرۡءَانَهُ ۥ (١٨) ثُمَّ إِنَّ عَلَيۡنَا بَيَانَهُ ۥ (١٩