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आज कल लडकियाँ भी लड़कों से कम नहीं,मजाल है कि घर का कोई काम कर ले 😎😏😏😜😁

बिना चॉकलेट दिए जो लड़का लड़कियों के साथ रिलेशन में रह लिया , समझ लो वो बिना petrol के कार भी चला सकता है 😁😁

आदमी कितना भी व्यस्त रहता हो..मगर पास से जाती हुई खूबसूरत लड़की को देखने 👀के लिये वो टाइम निकाल ही लेता है…इसे बोलते है इंसानियत 🙂 😁😁

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किसी लड़की की शादी नही हो रही हो,तो मुझे बताना………..क्योंकि मैं जिस लड़की से भी प्यार करता हूँ,उसकी शादी हो जाती है..😏 😏

Short Story: माँ, शादी उलझन है (भाग 1)

आधी रात हो चली है। प्रतीक्षा अपने कमरे में बैठी है। दुल्हन की वेशभूषा में, सिर से पैर तक आभूषणों में सज्जित, वो दीवार की ओर देखती है। चेहरे पर कोई भाव दृश्य नहीं है, मानो मेकअप ने उन्हें नजरों से छिपा दिया हो। वह बस बैठी हुई दीवार को ताकती है। उसकी सखी उसके साथ है, परन्तु वह बालकनी में खड़ी है। दूर में बारात दिखती है, वो उसके बारे में बोल रही है।

प्रतीक्षा के आसपास इतना कुछ घटित हो रहा है, फिर भी वह इन सब से बेखबर लगती है। चुपचाप बैठी बस दीवार की और देखती है।

*****

सुबह के आठ बज रहे है। प्रतीक्षा घर के बाहर स्कूल बस के इंतजार में खड़ी है। उसकी सहेली पूजा अभी तक ना आई थी।

प्रतीक्षा सत्रह वर्ष की है। वह कदकाठी में कम, परन्त आवाज में बुलंद थी। बचपन ख़त्म होने तक उसे बाल छोटे रखने का शौक था। माँ ने कई बार बाल बड़े करनें को लेकर टोका था। छोटे बाल लड़कियों पर अच्छे नहीं लगते, माँ ने कहा था। पर उसने माँ की बाकी बातों की तरह ये बात भी टाल दी थी। पर जब से पूजा न अपने बड़े बालों में चोटी करनी शुरू कर दी थी, तब से उसने बाल बढ़ाने की ठान ली थी। अब वो रोजाना माँ से बालों में तेल की चम्पी कराती और चोटी करने को कहती। शुरू के एक-दो दिन माँ को ये अजीब लगा। लड़की बात कभी ना सुनती और अब अचानक बालो में तेल और चोटी, सोचकर माँ भी हैरान थी। सब सही था, परंतु उसके बाल छोटे थे। चोटी घनी ना बन पाती थी। इसके ऊपर उसकी छोटी बहन उसे ‘चोटी चुहिया’ कहकर चिढ़ाती थी। माँ-बाप सामने होते तो प्रतीक्षा स्वयं को रोक लेती थी, पर अकेले में पाकर वो भी उसको एक-दो थप्पड़ रसीद कर देती थी। फिर जब सुप्रिया कहती कि वो थप्पड़ की बात माँ को बताएगी, तो प्रतीक्षा उसे चुप रहने के प्रलोभन भी देती थी।

प्रतीक्षा घर के बाहर खड़ी है। घर के सामने रखे बड़े गमलों में फूल खिले है। सवेरे मोगरा के सफ़ेद फूल अच्छे लग रहे थे। वो उनकी ही तरफ देख रही थी, कि अचानक उसे कन्धे पर हाथ रखे जाने का आभास हुआ। शरीर में एक पल के लिए स्तब्धता उठती है, परंतु ज्यों ही वो मुड़ती है, पूजा को पाती है। पूजा आ गयी थी, पर हांफ रही थी।

“आज फिर तुझसे उठा ना गया क्या?”, सुबह की वार्ता प्रतीक्षा शुरू कर देती है।

“उठ गयी थी। पर फिर वो हिस्ट्री का असाइनमेंट भी तो पूरा करना था।”, पूजा बोलती है।

“आलसी कही की। एक हफ्ते पहले दिया था असाइनमेंट, तू अब तक पूरा ना कर पायी क्या?”

“अब तेरे जैसी पढनतरु तो हूँ नहीं मैं। बस आज सुबह किया पूरा।”

“ना पता तेरा आलसपन कब हिस्ट्री बनेगा। मैं तो…”

इससे पहले की प्रतीक्षा बात पूरी कर पाती, नजदीक आती बस के हॉर्न ने उस पर पूर्ण विराम लगा दिया था।

Hindi

आठ मार्च

आठ मार्च

ममता का ऐसा नज़ारा
क्या दिखता कहीं जहाँ में
स्नेह का सागर उफनते देखा है
मैंने माँ की आँखों में

बहने जब राखी से
कलाइयाँ सजाती हैं
भुजाएं मानों स्वतः ही
असीम शक्ति पाती हैं

कष्टों का पहाड़ जब
सीधे सिर पर आता है
जग छोड़ दे अकेला ,
तब भी वो साथ निभाती है
हाँ वो , धर्म पत्नी कहलाती है

त्याग का ऐसा सामूहिक नज़ारा
शायद ही कहीं नज़र आता है
बचपन से जवानी जिस घर में वो बिताती हैं
एक झटके में सबकुछ छोड़ आती हैं
हाँ वो, बेटी कहलाती है

चेहरा शर्म से झुक जाता है
आँखे नम हो जाती है
जब समाचारपत्र में
भ्रूणहत्या, बाल विवाह, घरेलू हिंसा, और रेप की ख़बरें
अब भी जगह बनाती है
स्मरण रहे कि,

युद्धक्षेत्र में बन
रणचंडी भी वो आती है
शत्रुओं के वक्ष में
अपनी शूल धसाती है

ओलिंपिक में जब हम
मुह लटकाये भाग्य कोसते होते हैं
तो वे कर पराक्रम
भारत की लाज बचती है

भारत सोने की चिड़िया या विश्व गुरु
तभी तक कहलाती है
नारी का सम्मान जब तक
यह धरा कर पाती है
………अभय ……….

Hindi Poem