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Child Birth Through Vimshottari Dasha – The Parameters

What are the Principles or Parameters needed to study childbirth from Kundli ?

Here are some – that can help you determine a child birth or perhaps you can track down your on Birth and role of planets by applying this parameters. 527 more words

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Planets and Children (Excerpts from K N Rao Book)

Happy New Year 2018 ! Greetings.

The Blog is still very much active. So keep following…

This small series on Planets and Children is a part of Practical Astrology, which is the new heading where daily practical application of astrological principles shall be put into practice. 183 more words

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मकर संक्रांति : इस दिन किया दान लौट कर आता है

काशी पंचांग के अनुसार भगवान भास्कर दिनांक 14 जनवरी 2018 दिन रविवार को रात्रि 7 बजकर 35 मिनट पर धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे। धर्मशास्त्र के अनुसार सूर्यास्त के बाद लगने वाली संक्रांति का पुण्यकाल दुसरे दिन मध्याह्न काल तक रहता है अतः मकर संक्रांति दिनांक 15
जनवरी 2018 को भी सर्वत्र अपनी-अपनी विविध परंपराओं के साथ मनाया जाएगा। इसी दिन भगवान भास्कर उत्तरा पथगामी हो जाएंगे।

सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अंतराल पर होती है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है। इसी कारण यहां पर रात बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की तरफ आना शुरू हो जाता है। इस दिन से रात छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गर्मी का मौसम शुरू हो जाता है।

दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अंधकार कम होगा। अत: मकर संक्रांति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतना एवं कार्यशक्ति में वृद्धि होती है। इसीलिए संपूर्ण भारतवर्ष में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना, आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है।

इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। निम्न श्लोक से स्पष्ट होता है…

माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।

स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥

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जीवन में परेशानियों से गुजर रहे हैं तो करें सोमवती अमावस्या पर ये 7 विशेष उपाय

सोमवती अमावस्या के दिन नदी स्नान और मंत्र जाप का विशेष महत्व है। शास्त्रों में वर्णित है कि पौष, माघ, अगहन के महीने में नदी, तट, सरोवर के जल में स्नान कर सूर्य को गायत्री मंत्र उच्चारण करते हुए अर्घ्य देना चाहिए। यह क्रिया आपको अमोघ फल प्रदान करेगी। साथ ही स्नानदान का पूरा पुण्य भी मिलेगा। इतना ही नहीं, स्नान के समय निम्न मंत्र का जाप करने से आपको विशेष उपलब्धि भी प्राप्त होगी।

वर्ष 2017 की सोमवती अमावस्या 18 दिसंबर को मनाई जाएगी। सोमवार के दिन सर्वार्थ सि‍द्धि योग का महासंयोग बन रहा है। इसके साथ ही पौष अमावस्या सोमवार के दिन होने से इसका महत्व अधिक बढ़ गया है।
ज्ञात हो कि 2017 के बाद ये महासंयोग 11 साल बाद यानी 2028 में आएगा। अत: जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष, विष योग या अमावस्या दोष है, वे सोमवती अमावस्या वाले दिन अपने दोष का निवारण कर सकते हैं।

मंत्र-

।।अयोध्या, मथुरा, माया, काशी कांचीअवन्तिकापुरी, द्वारवती ज्ञेया: सप्तैता मोक्ष दायिका।।

।।गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेस्मिनेसंनिधि कुरू।।

जो लोग नदी पर स्नान के लिए नहीं जा सकते और घर पर स्नान करके अनुष्ठान करना चाहते हैं, उन्हें पानी में थोड़ा-सा गंगाजल मिलाकर तीर्थों का आह्वान करते हुए स्नान करना चाहिए। इसके साथ ही नीचे लिखे उपाय करने से निश्चित ही आपके सारे कष्टों से मुक्ति भी मिलेगी।

सोमवती अमावस्या के उपाय-

* सोमवती अमावस्या के दिन 108 बार तुलसी परिक्रमा करें।

* सोमवती अमावस्या के दिन सूर्य नारायण को अर्घ्य देने से गरीबी और दरिद्रता दूर होगी।

* जिन लोगों का चन्द्रमा कमजोर है, वे गाय को दही और चावल खिलाएं तो मानसिक शांति प्राप्त होगी।

* इसके अलावा मंत्र जाप, सिद्धि साधना एवं दान कर मौन व्रत को धारण करने से पुण्य प्राप्ति और भगवान का आशीर्वाद मिलता है।

* इस दिन शिव का पूजन करने का विशेष मह‍त्व है। अत: शिवजी की पूजा-आराधना पूरे मन से करनी चाहिए तभी फल प्राप्त होता है।

* इसके अलावा अपने पितृ को प्रसन्न करके के लिए सुबह और शाम के समय कंडे जलाकर उसमें गुड़-घी की धूप देकर पितरों का आशीर्वाद ले सकते हैं और किसी भी तीर्थस्थल पर जाकर पितृ के निमित्त पूजन कर सकते हैं।

* सोमवती अमावस्या के दिन पितृदोष निवारण के लिए सूर्य अर्घ्य देते समय पितृ तर्पण तथा ‘ॐ पितृभ्य नमः’ मंत्र का करने से भी जीवन की सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है।

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वर्ष 2018 में किन राशियों पर रहेगी शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या

शनि ग्रह का नाम सुनते ही जो सबसे पहला विचार मन-मस्तिष्क में आता है वह है- साढ़ेसाती व ढैय्या। शनि को न्यायाधिपति कहा गया है और शनि दण्डाधिकारी भी हैं। वे मनुष्यों को उनके कर्मों के अनुसार शुभफ़ल व दण्ड देते हैं। उनका यह न्याय साढ़ेसाती व ढैय्या की अवधि में प्रबल रूप में प्रकट होता है। अपने नामानुसार ही साढ़ेसाती की अवधि साढ़ेसात वर्ष एवं ढैय्या की अवधि ढाई वर्ष की होती है।

साढ़ेसाती व ढैय्या का नाम सुनते ही जनमानस में भय व चिन्ता व्याप्त हो जाती है। लेकिन साढ़ेसाती को लेकर इस प्रकार का भय व चिन्ताएं पूर्णरूपेण सत्य नहीं होतीं क्योंकि जिन जातकों की जन्मपत्रिका में शनि उच्चराशिस्थ, राजयोगकारक एवं शुभ होते हैं उनके लिए साढ़ेसाती की अवधि शुभफ़लदायक एवं उन्नतिकारक होती है।

शनि सौरमण्डल के सबसे मन्द गति से चलने वाले ग्रह हैं। यह एक राशि से दूसरी राशि में गोचर करने में ढाई वर्ष का समय लेते हैं। गोचरवश शनि जिस राशि में स्थित होते हैं वह एवं उससे दूसरी व बारहवीं राशि वाले जातक साढ़ेसाती के प्रभाव में होते हैं।

इसी प्रकार शनि स्थित राशि से चतुर्थ व अष्टम राशि वाले जातक ढैय्या से प्रभावित होते हैं। आइए जानते हैं कि वर्ष 2018 में कौन सी राशि वाले जातकों पर साढ़ेसाती का प्रभाव रहेगा एवं किन राशि वाले जातक ढैय्या से प्रभावित रहेंगे।

इन राशि वाले जातकों पर रहेगी शनि की साढ़ेसाती

वृश्चिक (अंतिम चरण)

धनु (द्वीय चरण)

मकर (प्रथम चरण)

इन राशि वाले जातकों पर रहेगी शनि की ढैय्या

वृष व कन्या

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ग्रह और बीमारियाँ

ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरते हैं तो वह उनको नुकसान पहुंचाते हैं । नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।

वैदिक वाक्य है कि पिछले जन्म में किया हुआ पाप इस जन्म में रोग के रूप में सामने आता है। शास्त्रों में बताया है-पूर्व जन्मकृतं पापं व्याधिरूपेण जायते अत: पाप जितना कम करेंगे, रोग उतने ही कम होंगे। अग्नि, पृथ्वी, जल, आकाश और वायु इन्हीं पांच तत्वों से यह नश्वर शरीर निर्मित हुआ है। यही पांच तत्व 360 की राशियों का समूह है।

इन्हीं में मेष, सिंह और धनु अग्नि तत्व, वृष, कन्या और मकर पृथ्वी तत्व, मिथुन, तुला और कुंभ वायु तत्व तथा कर्क, वृश्चिक और मीन जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। कालपुरुष की कुंडली में मेष का स्थान मस्तक, वृष का मुख, मिथुन का कंधे और छाती तथा कर्क का हृदय पर निवास है जबकि सिंह का उदर (पेट), कन्या का कमर, तुला का पेडू और वृश्चिक राशि का निवास लिंग प्रदेश है। धनु राशि तथा मीन का पगतल और अंगुलियों पर वास है।

इन्हीं बारह राशियों को बारह भाव के नाम से जाना जाता है। इन भावों के द्वारा क्रमश: शरीर, धन, भाई, माता, पुत्र, ऋण-रोग, पत्नी, आयु, धर्म, कर्म, आय और व्यय का चक्र मानव के जीवन में चलता रहता है। इसमें जो राशि शरीर के जिस अंग का प्रतिनिधित्व करती है, उसी राशि में बैठे ग्रहों के प्रभाव के अनुसार रोग की उत्पत्ति होती है। कुंडली में बैठे ग्रहों के अनुसार किसी भी जातक के रोग के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं।

कोई भी ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उन अंगों को नुकसान पहुंचाता है। जैसे आज कल सिंह राशि में शनि और मंगल चल रहे हैं तो मीन लग्न मकर और कन्या लग्न में पैदा लोगों के लिए यह समय स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता।

अब सिंह राशि कालपुरुष की कुंडली में हृदय, पेट (उदर) के क्षेत्र पर वास करती है तो इन लग्नों में पैदा लोगों को हृदयघात और पेट से संबंधित बीमारियों का खतरा बना रहेगा। इसी प्रकार कुंडली में यदि सूर्य के साथ पापग्रह शनि या राहु आदि बैठे हों तो जातक में विटामिन ए की कमी रहती है। साथ ही विटामिन सी की कमी रहती है जिससे आंखें और हड्डियों की बीमारी का भय रहता है।

चंद्र और शुक्र के साथ जब भी पाप ग्रहों का संबंध होगा तो जलीय रोग जैसे शुगर, मूत्र विकार और स्नायुमंडल जनित बीमारियां होती है। मंगल शरीर में रक्त का स्वामी है। यदि ये नीच राशिगत, शनि और अन्य पाप ग्रहों से ग्रसित हैं तो व्यक्ति को रक्तविकार और कैंसर जैसी बीमारियां होती हैं। यदि इनके साथ चंद्रमा भी हो जाए तो महिलाओं को माहवारी की समस्या रहती है जबकि बुध का कुंडली में अशुभ प्रभाव चर्मरोग देता है।

चंद्रमा का पापयुक्त होना और शुक्र का संबंध व्यसनी एवं गुप्त रोगी बनाता है। शनि का संबंध हो तो नशाखोरी की लत पड़ती है। इसलिए कुंडली में बैठे ग्रहों का विवेचन करके आप अपने शरीर को निरोगी रख सकते हैं। किंतु इसके लिए सच्चरित्रता आवश्यक है। आरंभ से ही नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।

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Sagittarius: SUN/MOON/RISING

Most people know their Sun sign mainly because of popular horoscopes and pop astrology. Fortunately, there is a lot more to astrology than a Sun sign and there are important distinctions to make when you begin to learn more about astrology. 530 more words

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