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A Green footprint of Peace.

To shine without the light.

Before the rays of the sun hit the city, is the perfect time to experience the serene ashram of the Mahatma. 631 more words

Ashram

Indomitable Will

Strength does not come from physical capacity. It comes from an indomitable will. – Mahatma Gandhi

Inspiration

अनाथों का नाथ फिर भी अनाथ -महात्मा गाँधी

मेरे साथियों !
सब से पहले मै आप का तहे-दिल से
हार्दिक अभिनंदन करता हूँ।
क्योंकि आप आज……
हिम्मत-जिगर दिखाकर
ऐसे लोकनेता के बारे में
विचार पढने के लिए तैयार हुए,

जिस लोकनेता की अवस्था
इस समाज ने
बेसहारा…,
बेचारा…. ,
असहाय्य…. जैसी की है ।
कट्टरतावादी सामाजिक प्रवाह
मुझे से नाराज होगा…
यह मालूम होते हुए भी,
मै जानबूझ कर….
ऐसे लोकनेता के बारे में
बोलने जा रहा हूँ,

जो आजाद भारत में
सबसे ज्यादा ‘बद-नसीब’…
लोक-नेता रहा।
जिसके पीछे कोई भी
व्यक्ति,नेता,या पार्टी
सच्ची श्रध्दा भावना से
कभी खड़ी नहीं हुई।
उन के नाम पर
गलतफहमिया फैलाई गयी।
हर कोइ उस लोकनेता के नाम
‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’ की तरह
इस्तेमाल कर रहा है।
या ‘पब्लिक प्रॉपर्टी’…. की तरह
उस लोकनेता के नाम को
बरबाद कर रहा है।
जरूरत के हिसाब से
उपयोग में ला रहा है
‘यूज़ एंड थ्रो’…. कर रहा है
उस लोकनेता का फोटो
जिसपर है उस… 500 और
1000 रुपयों नोटों को तो
प्यार से अपनाता है;
लेकिन, व्यक्तिगत या सामाजिक रूप से…
बड़ी नफरत करता है
ऐसा क्या हुआ ?….
उस लोकनेता ने किया क्या?….
की हम इतनी नफरत करते है ?
उस महामानव ने लोगों को लूटा नहीं….
अपने ‘खानदान को राजनीति’ में
आगे बढ़ाने की कोशिश नही की….
कोई प्रॉपर्टी खड़ी नही की….
देश आजाद होने के बाद
आराम से राष्ट्रपति बन सकते था
लेकिन उस लोकनेता ने राष्ट्रपिता बनाना पसंत किया।
सम्पूर्ण जिंदगी स्वयं व्यक्तिगत रूप से
कोई फायदा नहीं उठाया।
न -अपने सगे बेटे को भी उठाने नही दिया।
क्या, वह… उनकी गलती थी ?
लेकिन वह लोकनेता उस वक्त करोड़ो देशभक्तों के आँखों का तारा था।
आज आजादी के साठ साल के बाद
भारतीय लोगों के अंदर
उस लोकनेता के बारे में
आज जहर… आया कहाँ से ?
इस सब बातों के मूल कारण को…
मै समझता हूं ,मै मानता हूँ।
हम में से स्वयं घोषीत- महाबुद्धिमान
बढ़ते जा रहे है, या
पढ़े लिखे परबुद्धि गवार लोगों का अज्ञान
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Essay

“We but mirror the world. All the tendencies present in the outer world are to be found in the world of our body. If we could change ourselves, the tendencies in the world would also change.”

~ Mahatma Ghandi

Transformation

गांधी और अंबेडकर के एक होने का वक्त आ गया है - Rakesh Kayasth

इतिहास के कुछ कालखंड निर्णायक होते हैं। हम एक ऐसे ही निर्णायक कालखंड में दाखिल हो चुके हैं। यह समय बीसवीं सदी के दो सबसे प्रखर बौद्धिक विचारों के एक होने का है। वो विचार जिन्हे हमेशा दो अलग ध्रुव माना गया और दोनो अलग-अलग रहे भी। ये विचार हैं, गांधीवाद  और अंबेडकरवाद। तीस के दशक में गांधी और अंबेडकर के बीच गहरा वैचारिक और राजनीतिक टकराव हुआ। नतीजे में पूना पैक्ट सामने आया। तकनीकी तौर पर गांधी जीते और अंबेडकर हारे। लेकिन असल में कौन हारा, ये सवाल अब भी कायम है। गांधी के जाने के बाद गांधीवाद लाइब्रेरी और म्यूज़ियम में रखी जानेवाली चीज़ बन गया। लेकिन कांग्रेसी सरकारों द्वारा लगातार हाशिये पर डाले जाने की कोशिशों के बावजूद अंबेडकर दिलों में जिंदा रहे। उनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई। ये अलग बात है कि अंबेडकर एक प्रेरक व्यक्तित्व ज्यादा रहे, उनके राजनीतिक विचारो को समग्र रूप से समझकर उन्हे अमली जामा पहनाने के लिए बड़ी और संगठित लड़ाई उस तरह नहीं लड़ी गई जिस तरह लड़ी जानी चाहिए थी। अंबेडकरवाद के वारिस गांधी से अपनी राजनीतिक दुश्मनी आजतक निभा रहे हैं। कड़वाहट का आलम ये है कि अंबेडकरवादी गांधी से उस आरएसएस के मुकाबले कहीं ज्यादा नफरत करते हैं, जो आज़ादी के बाद से ब्राहणवादी विचारों का सबसे बड़ा  प्रतिनिधि है। 9 more words

The Feminist