…. मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को यूं कभी नहीं महसूस किया होगा आपने….

सितंबर में ऑफिस के काम से बैंगलुरु गई थी। खुद को उनके घर जाने से रोक नहीं पाई। देर शाम को लौटने की ट्रेन थी। और मैं अपने भीतर खूबसारी हिम्मत और हौंसला भरने उनसे मिलने चली आई। उस दिन बैंगलुरु में हड़ताल थी। मशहूर इंफेंट्री रोड पूरी सूनसान पड़ी थी। लंच उनके घर ही करूंगी ये मैंने डिसाइड कर लिया था। खुद से ही। लेकिन एक घंटे का रास्ता था तो ब्रेकफॉस्ट कर के निकलूंगी ये सोच इंफैंट्री रोड तक पैदल आ गई थी। खैर कुछ नहीं मिला। फोन में एसएमएस तीन -चार बार पढ़ चुकी थी। एक बार टैक्सी वाले को भी पढ़ा दिया। उनको चिंता हो रही थी की हड़ताल के बीच मैं सही सलामत वहां पहुंच जाऊं। फोन पर बराबर मेरी खबर लेते रहे। दो-ढाई साल पहले मैं उन दोनों से मुंबई में मिली थी। एक पूरा दिन बिताया और ऐसी पहचान हो गई मानों सालों से जानती हूं।

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