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माण्डूक्यकारिका

आगम प्रकरण

विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ है । इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है ।1।

Darshan

THE WORLD IS MIND ALONE: SHANKARACHARYA

The World is mind alone: Shankara

In the Mundakopanishad 2.1 is this mantra:

अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः ।
वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४ ॥ 678 more words

Advaita

माण्डूक्य उपनिषद

‘ॐ’ – यह अक्षर ही सर्व है । सब उसकी ही व्याख्या है । भूत, भविष्य, वर्तमान सब ओंकार ही हैं । तथा अन्य जो त्रिकालतीत है, वह भी ओंकार ही है ॥१॥

यह सब कुछ ब्रह्म ही है । यह आत्मा भी ब्रह्म ही है । ऐसा यह आत्मा चार पादों वाला है ॥२॥

जाग्रत् जिसका स्थान है, बाहर की ओर जिसकी प्रज्ञा है, सात अंगों वाला, उन्नीस मुखों वाला, स्थूल विषय का भोक्ता, वैश्वानर ही प्रथम पाद है ॥३॥

स्वप्न जिसका स्थान है, अन्दर की ओर जिसकी प्रज्ञा है, सात अंगों वाला, उन्नीस मुखों वाला, सूक्ष्म विषय का भोक्ता, तैजस ही दूसरा पाद है ॥४॥

सोया हुआ, जब किसी काम की कामना नहीं करता, न कोई स्वप्न देखता है, वह सुषुप्ति की अवस्था है । सुषुप्ति जिसका स्थान है, एकीभूत और प्रज्ञा से घनीभूत, आनन्दमय, चेतनारूपी मुख वाला, आनन्द का भोक्ता, प्राज्ञ ही तीसरा पाद है ॥५॥

यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह अन्तः आयामी है, यही योनि है, समस्त भूतों की उत्पत्ति-प्रलय का स्थान है ॥६॥

जो न अन्दर की ओर प्रज्ञा वाला है, न बाहर की ओर प्रज्ञा वाला है, न दोनों ओर प्रज्ञा वाला है, न प्रज्ञा से घनीभूत ही है, न जानने वाला है, न नहीं जानने वाला है, न देखा जा सकता है, न व्यवहार में आ सकता है, न ग्रहण किया जा सकता है, लक्षणों से रहित है, न चिन्तन में आ सकता है, न उपदेश किया जा सकता है, एकमात्र आत्म की प्रतीति ही जिसका सार है, प्रपञ्च से रहित, शान्त, शिव, अद्वैत ही चौथा पाद कहा जाता है । वही आत्मा है, वही जाननेयोग्य है ॥७॥

ऐसा वह आत्मा अक्षरदृष्टि से, मात्राओं का आश्रयरूप, ओंकार ही है । पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद है, जो कि अकार, उकार और मकार हैं ॥८॥

जाग्रत स्थान वाला वैश्वानर ही अकार है । सबमे व्याप्त और आदि होने के कारण ही प्रथम मात्रा है । जो इस प्रकार जानता है वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है और सबमें प्रधान होता है ॥९॥

स्वप्न स्थान वाला तैजस ही उकार है । उत्कर्ष और उभयत्व के कारण ही द्वितीय मात्रा है । जो इस प्रकार जानता है वह ज्ञान की परम्परा को उन्नत करता है और समान भाव को प्राप्त होता है । उसके कुल में कोई ब्रह्मज्ञानहीन नहीं होता ॥१०॥

सुषुप्ति स्थान वाला प्राज्ञ ही मकार है । जाननेवाला और विलीन करने वाला होने के कारण ही तृतीय मात्रा है । जो इस प्रकार जानता है वह सबको जाननेवाला और सबको स्वयं में विलीन करने वाला होता है ॥११॥

मात्रारहित ही वह चतुर्थ है । अव्यवहार्य, प्रपञ्चरहित, शिव, अद्वैत, ओंकाररूप वह आत्मा आत्मा के द्वारा आत्मा में ही प्रविष्ट होता है, जो इस प्रकार जानता है, जो इस प्रकार जानता है ॥१२॥

Darshan