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मोदी कहीं ‘मनमोहन’ तो नहीं बन रहे हैं?

BY पंकज कुमार

ना खाउंगा, ना खाने दूंगा… इसी चुनावी नारे के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में आए थे. लेकिन आज हालात दूसरे हैं. बीजेपी के तीन बड़े नेताओं पर गंभीर आरोप लगे हैं. जिसमें से दो केंद्रीय मंत्री, एक मुख्यमंत्री और एक महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार में मंत्री हैं. सबसे अहम बात कि ये चारों बड़े नेता महिलाएं हैं. हर मौके पर अपनी बात रखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरोपों पर चुप्पी साध रखी है. अब सवाल ये है कि क्या मोदी बीजेपी के मनमोहन बन रहे हैं ?

ये सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि इंदिरा गांधी के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही ऐसे राजनेता हैं जिनके अंदर करिश्माई संवाद क्षमता है. वो एक प्रखर वक्ता हैं. नरेंद्र मोदी हर मंच पर, हर मौके पर, हर उत्सव पर अपनी बात सबके सामने रखते हैं. छोटी से छोटी बात को सोशल मीडिया पर लोगों से शेयर करते हैं. महीने में एक बार रेडियो के जरिए दूर दराज के ग्रामीण भारत से वो सीधे जुड़ते हैं. लेकिन आज जब उनकी पार्टी के चार बड़े नेताओं पर सवाल उठ रहे हैं तो वो चुप हैं. वो हर मुद्दे पर बात करने के लिए तैयार हैं लेकिन अपने नेताओं और मंत्रियों पर लग रहे आरोपों पर वो कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं हैं. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर भी यही आरोप लगते थे कि वो अच्छे हैं लेकिन उनकी आंखों के सामने उनकी पार्टी के लोग गलत करते रहे और वो चुपचाप तमाशा देखते रहे. उन्होंने मौन धारण कर लिया. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ‘मनमोहन’ बनने की राह पर हैं.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पर आरोप है कि उन्होंने आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी को पुर्तगाल का वीजा दिलाने में मदद की. हालांकि सुषमा स्वराज साफ कर चुकी हैं कि उन्होंने सिर्फ मानवीय आधार पर मदद की और नियमों के दायरे में रहकर मदद की. क्योंकि ललित मोदी को अपनी पत्नी के इलाज के लिए उन्हें लेकर पुर्तगाल जाना था. अब सवाल ये उठता है कि जो व्यक्ति कानून से बचने के लिए लंदन में ऐशो आराम की निर्वासित जीवन जी रहा हो उसे किस मानवता के आधार पर आपने मदद की ? विपक्ष सुषमा स्वराज का इस्तीफा मांग रहा है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौन हैं. यानी की ‘मनमोहन’ बने हुए हैं.

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी पर उनकी फर्जी डिग्री को लेकर विवाद है. आरोप है कि उन्होंने दो अलग चुनावों में अलग–अलग हलफनामों में अपनी अलग – अलग डिग्रियों का जिक्र किया. विपक्ष का आरोप है कि दिल्ली के पूर्व कानून मंत्री जीतेंद्र सिंह तोमर की तरह ही स्मृति ईरानी की डिग्री भी फर्जी है. इसलिए स्मृति ईरानी की डिग्री की भी जांच होनी चाहिए. उन्हें अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे पर भी ‘मनमोहन’ बने हुए हैं. ये वहीं स्मृति ईरानी हैं जिनके लिए लोकसभा चुनाव में प्रचार करते हुए नरेंद्र मोदी ने अपनी बहन बताया था. आज नरेंद्र मोदी की बहन की फर्जी डिग्री पर सवाल उठ रहे हैं और वो मौन धारण किए हुए हैं.

तीसरा मामला वसुंधरा राजे को लेकर है. आरोप है कि वसुंधरा राजे के बेटे की कंपनी हेरिटेज हेल्थ में ललित मोदी ने 11 करोड़ रुपये निवेश किया. ललित मोदी ने 10 रुपये के एक शेयर 90 हजार रुपये में खरीदे. दुष्यंत की कंपनी में उनकी मां वसुंधरा राजे के करीब 3200 शेयर हैं. यानी की ललित मोदी ने सीधे वसुंधरा राजे को फायदा पहुंचाया. अब सवाल ये है कि ललित मोदी ने ये सब क्यों किया ? दूसरा सवाल ये कि ललित मोदी को बदले में क्या मिला ? इस मुद्दे पर भी विपक्ष प्रधानमंत्री से सफाई मांग रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री मौन धारण किए हुए हैं.

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की सरकार में मंत्री पंकजा मुंडे पर भी करीब 200 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप है. पंकजा मुंडे बीजेपी के पूर्व वरिष्ठ नेता गोपीनाथ मुंडे की बेटी हैं. जिनकी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पंकजा का पूरी तहर से बचाव किया है. फडणवीस ने कहा कि अगर विपक्ष के पास सबूत है तो वो पहले सबूत दे तभी जांच होगी.

बीजेपी की ये चारों बड़ी महिला नेता फिलहाल मुश्किल में हैं लेकिन पार्टी इनके साथ मजबूती से खड़ी है. प्रधानमंत्री इस विषय पर कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं हैं. केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद ये पहला मौका है जब विपक्ष को हमलावर होने का मौका मिला है. भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे बड़ी चिंता ललित मोदी को लेकर उठे विवाद से है.

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि नरेंद्र मोदी जो कि पिछले दो दशक के सबसे ज्यादा बोलने वाले प्रधानमंत्री हैं वो ललित मोदी से जुड़े विवाद या स्मृति ईरानी की फर्जी डिग्री से जुड़े विवाद पर कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं है. अब सवाल ये है कि जब नरेंद्र मोदी भी आरोपों पर नहीं बोल रहे हैं तो वो मनमोहन सिंह से अलग कैसे हुए. अब सवाल ये है कि नरेंद्र मोदी चुप क्यों हैं. इसकी दो वजहें हो सकती हैं. पहला ये कि बिहार में इस साल चुनाव होने हैं. अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुषमा स्वराज से इस्तीफा ले लेते हैं तो इससे जनता में मोदी सरकार के प्रति नकारात्मक संदेश जाएगा. जनता ये मान लेगी की सुषमा गलत थीं. जिसका नुकसान पार्टी को बिहार चुनाव में हो सकता है. दूसरी प्रमुख वजह ये है कि सुषमा को हटाने के से पार्टी में भी फूट पड़ सकती है. क्योंकि बीजेपी के अंदर आडवाणी गुट हमेशा से सुषमा के साथ रहा है.

मनमोहन सिंह की आलोचना का एक मात्र कारण यही था कि उनके सामने गलत होता रहा और उन्होंने होने दिया. मौन व्रत धारण कर लिया. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी घोटालों और आरोपों पर मौन व्रत धारण कर लिया है. अब मन में सवाल ये उठ रहा है कि कहीं ‘मोदी भी मनमोहन बनने की राह पर तो नहीं हैं ?’

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