Tags » Memoirs » Page 2

Book review: Dryland: One Woman's Swim to Sobriety

I drink the way I used to swim: all or nothing. Truthfully, “nothing” was never an option. It was always “all.”

~ Nancy Stearns Bercaw

809 more words
Spirit

The Hall Of New Beginnings

Stuck between lifetimes
in the hall of new beginnings

this world between worlds

where infinite possibilities

stretch out
across

the imaginary boundaries
of time, space… 117 more words

Changing The World

Book Review: Cruel to Be Kind by Cathy Glass

A few weeks ago, I found out about a new Cathy Glass book on an E-mail list I’m part of. Most of the members of the list are big Cathy Glass fans, but I’d never read a book by her. 458 more words

Books

Six Word Memoirs Part 3

Hello Everyone!

I hope everyone is having a wonderful day, today. If not, I hope that a little bit of poetry can cheer you up. I decided that since we had such an empty week last week, that I’d make up for it with some extra creative writing pieces added to the mix this week. 328 more words

Allen The Writer

सुहाना सफ़र - 6

आज़ादी  के  कुछ  वर्षों  बाद  तक  भारतीय  रेल  द्वारा  यात्रा  करना  एक  मनोरंजक  अनुभव  था.  स्लीपर  क्लास  तब  होती  नहीं  थी  और  यात्री  काफ़ी  जद्दोजहद  के  बाद  डब्बे  में  प्रवेश  कर  पाते थे. गाड़ी  स्टेशन  पर  पहुँचने  से  पहले  ही  अंदर  बैठे  यात्री  किलाबंदी  करके  बहादुरी  से  आक्रामक  यात्रियों  का  मुकाबला  करते  थे. सफल  यात्री  अंदर  आकर  छुटपुट  हमले  करके  अपने  व  अपने  सामान  के  लिए  जगह  बनाते  थे.  अगला  स्टेशन  आते  आते  शत्रुता  मित्रता  में  बदल  जाती  और  फिर  सब  मिल  कर  नये  आक्रमण  का  मुकाबला  करने  के  लिए  मोर्चा  संभाल  लेते  थे. 

मुझ  जैसे  तटस्थ  यात्री  के  मनोरंजन  का  यह  सिलसिला  स्लीपर  क्लास और  उसमें  आरक्षण  के  कारण  लगभग  समाप्त  हो  गया. शत्रुता  का  कोई  कारण  ही  नहीं  रहा. यात्री  अपने  अपने  आरक्षित  स्थान  ग्रहण  करके  अपनी  रूचि  के  मुताबिक  अख़बार, पत्रिका  या  उपन्यास  पढ़ने  में  व्यस्त  हो  जाते  हैं. आपस  में  बात  यदि  होती  भी  है  तो  नहीं  के  बराबर. इसलिए  मित्रता  भी  नहीं  हो  पाती. मित्रता  के  लिए  वार्तालाप आवश्यक  होता  है.      

अब  का  तो  पता  नहीं, लेकिन  तब  हर 150 किलोमीटर  पर  एक  दिन  रुक  कर  अगले  दिन  उसी  टिकट  पर  आगे  यात्रा  की  जा  सकती  थी. साथ  ही  यात्रा  शुरू  करने के  समय आने  जाने  का  टिकट  खरीदने  पर  कुछ  रियायत  मिल  जाती  थी. पहली  बार  इस  सुविधा  का  लाभ  मैंने  लखनऊ–देहरादून  यात्रा  के  लिए  उठाया. वापसी  में  गाड़ी  देहरादून  से  शाम  को  चल  कर  सुबह  लखनऊ  पहुँच  जाती  थी. हरिद्वार  पार  हो  जाने  के  बाद  टिकट  चेकर  आकर  सबके  टिकट  चेक  करने  लगा.  मैंने  भी  अपना  टिकट  दिखाया.  टिकट  हाथ  में  लेकर उसने  उसे  उलट  पलट  कर  देखा. बोला, “आपका  टिकट  ग़लत  है. आप इस  पर  यात्रा  नहीं  कर  सकते.” 

मैं अवाक  रह  गया. पूछा,”क्यों? टिकट  लखनऊ  का  ही  तो  है.”

“है.”  वह  बोला,”लेकिन  दस  दिन  पुराना  है.”

“हाँ, दस  दिन  पहले  मैं  लखनऊ  से  देहरादून  आया  था. अब  वापस  जा  रहा  हूँ. इसमें  ग़लत  क्या  है.”

“देहरादून  पहुँच  कर  आपने  इस  पर  तारीख  नहीं  डलवाई. क्या  पता  आप  कितनी  बार  लखनऊ–देहरादून–लखनऊ  यात्रा  कर  चुके  हैं.”

इस  बात  का  मेरे  पास कोई  जवाब  नहीं  था. मैंने  काफ़ी  कोशिश  की  उसे  समझाने  की  कि  मुझे  यह  मालूम  नहीं  था और  मैं  कोई  ग़लत  काम  नहीं  कर  रहा.  उसने  समझने  से  इनकार  कर  दिया.

हार  कर  मैंने  पूछा,”फिर अब  क्या  करना  है?”

“करना  क्या  है. पेनल्टी  के  साथ  नया  टिकट  बनेगा.” बेरूख़ी  से  उसने  जवाब  दिया. 

“पर  मेरे पास तो इतने पैसे नहीं  हैं.”

“फिर  जेल  जाना  होगा.”

बिना  कुछ  ग़लत  किए  जेल  जाने  की  नौबत  आ  गई. “कुछ तो  करिए  सर.” मैंने  विनम्रता  से  कहा.

शायद  उसे  मुझ  पर  कुछ  तरस  आया  हो. “अच्छा, देखते  हैं.” कुछ  सोचते  हुए  बोला और  टिकट  लेकर  चला  गया.

परेशान  सा  मैं  उसके  आने  की  इंतज़ार  करता  रहा. वो  नहीं  आया. जिस  तरफ  वो  गया  था, आँखें  उधर  ही  निहारती  रहीं, पर  उसका  पता  न  था. ना  जाने  कहाँ  चला  गया.  पता  नहीं  आएगा  भी  या  नहीं. अगर  उसकी  ड्यूटी  बदल  गई  और  कोई  और  आ  गया  तो? मेरा  क्या  होगा? क्या  वाकई  जेल  जाना  पड़ेगा? इसी  उधेड़बुन  में  सारी  रात  सो  नहीं  पाया. बैठे  बैठे  सोना  वैसे  भी  मुश्किल  होता  है.  

जैसे  तैसे  सुबह  हुई.  टिकट  चेकर  फिर  भी  नहीं  आया.

हरदोई  अच्छा  ख़ासा  बड़ा  स्टेशन  है. उसके  बाद  लखनऊ  पहुँचने  से  पहले  गाड़ी  केवल  सॅंडीला  पर  रुकनी  थी.

“मेरा  टिकट  लेकर  सॅंडीला  पर  बाहर  जाकर  लखनऊ  का  टिकट  खरीद  लाओ, बेटा. तुम्हारा  काम  हो  जाएगा.” मुझे  परेशान  देख  कर  मेरे  बराबर  में  बैठे  एक  अधेड़  सज्जन  ने  अपना  टिकट  मेरी  तरफ  बढ़ाते  हुए  कहा.

दिमाग़  की  बत्तियाँ  एकदम  जल  गईं. सॅंडीला  पर  गाड़ी  रुकते  ही  भागता  हुआ  स्टेशन  के  बाहर  गया, टिकट  खरीदा और  वापस  आकर  हाँफते  हुए  अपनी  जगह  पर  बैठ  गया. गाड़ी  चली.  कुछ  देर  में  टिकट चेकर  महोदय  प्रगट  हुए. मेरा  टिकट  उनके  हाथ  में  ही  था. बोले,”बताओ क्या  करना  है.”

“किस  बारे  में?” मैंने  अनजान  बनते  हुए  मासूमियत  से  पूछा. 

“तुम्हारे  टिकट  के  बारे  में.”

“ये  रहा मेरा  टिकट.” सॅंडीला  में  खरीदा  टिकट  मेरे हाथ  में  था.    

“ये  तो  सॅंडीला  से  है.  तुम  देहरादून  से  बैठे  हो.”

“क्या बात कर  रहे  हो. अभी अभी  तो  सॅंडीला  से  बैठा  है, मेरे  सामने.” मेरे  रक्षक  ने  गवाही दी.

टिकट  चेकर  हकबका  कर  उन्हें  देखता  रह  गया. फिर  अपना  सा  मुँह  लेकर  चुपचाप  चला  गया.

Memoirs

I'm Just a Person

Tig Notaro

So many memoirs of famous people are ghost written. If this was one of them, props to the writer. Every page glows with honesty about Tig’s life, her mother’s death, her relationship with her stepfather, her struggles with health, and her personal relationships. 22 more words

Book Reviews