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Szijjarto: Discussing migration in security context vital

In light of the 29 terrorist attacks carried out in Europe by people with a migrant background over the past three years, discussing migration in the context of security is indispensable, the Hungarian foreign minister said in Brussels after a meeting of EU foreign ministers and trade representatives on Tuesday. 418 more words

नई-पुरानी, वही कहानी

इन खेतों खलिहानों से ही एक नौजवान ने कुछ ख्वाब बुना था।
घर परिवार थे हरे भरे पर पैसों से जरा सूना था।

रात दिन एक कर इन ज़मीनों पे सोने उगाता था।
हरे भरे इन खेतों को देख मन ही मन मुस्काता था।
शहर से लौटे राहगीरों से अरारियों पे गप्पे लड़ाता था।
रातों रात काम मेहनत में ही अमीर बन जाने के किस्सों से वो चौंधियाता था।
थक कर रातों को शहरों के ख्वाबों में वो खो जाता था।
सूरज से पहले उठ गाय-बैलों को नहलाता था।
पहली किरण के साथ ही फिर खेतों पर डट जाता था।
गुस्साए सूरज से छिप,नीम के निचे जो थोड़ा सुस्ताता था।
यही सोचता था वो अक्सर की अपनों से दूर शहरों में कहा वो ये सुख पाता था?
शाम को लालटेन की रौशनी में जब बच्चो को पढ़ता वो पाता था।
गौरव से भर जाता था वो,अपनी किस्मत पे इतराता था।
खड़ी फसल की रखवाली को खेतों पे जब जाता था।
यारों के संग मचानो पर वो पाला भी उसे सुहाता था।
यारों से बिछड़न की बात सोच कर भी वो सिहर सा जाता था।
“अपने आसमान में ढल जाना ही उस सूरज की नियति है”
ऐसी बातों से उन्हें समझाता था।

पर नियति तो है महाबली,उसके आगे भला किसकी चली?
सूखे की मार से पुरे गाँव में मच गयी खलबली,
शहर जाने को भीड़ खड़ी थी हर चौराहे और गली गली।
पर था कहा वो डरने वालों में ?
और ना ही आहें भरने वालों में,
हौसलें तो प्राण फूंक देते थे अधमरे या मरने वालों में।
इस विकट घड़ी में भी उसने एक बात मन में ठानी थी,
पुरखों की इस धरती पर वापस गंगा की धरा लानी थी।
उस हल से ज्यादा आँखों में तेज़ लिए जब खेतों की ओर कदम बढ़ाता था।
उस तेजस्वी रूप को देख, खुद काल भी भय खा जाता था।
तपती दुपहरी में तन के पसीने से धरती की प्यास बुझाता था।
उस साहस और हौसले को देख प्रकृति का रोम रोम खिल जाता था।
उन मज़बूरों को अन्धकार में उजाले की आस बंधाता था।
सारी दुनिया से जीत कर जब वापस घर को आता था।
घरवालों के तानो से खुद अपनों से ही हार वो जाता था।

आखिर रंग लायी उसकी मेहनत बड़ी।
खेतों में लहलहाती थी सोने सी फसल खड़ी।
पूरे गाँव में उसके मेहनत की होने लगी चर्चाएं बड़ी।
अब इन पैसों से वो साहूकार के बोझे से निकल जाता था।
बहन की शादी में गहनों की कमी को दूर कर पाता था।

कहानी उसकी आगे बढ़ी और न‌ई मुसीबतें होने लगी खड़ी
बढ़ते उसके परिवार के संग विपदाएं भी होतीं गयी बड़ी

थक हार कर उसने भी अब शहर जाने को ठाना था।
अब जीवन का उद्देश्य उसका बस पैसा ही कमाना था।
उस पैसे के दम पर अपने परिवार का जीवन सुखमयी बनाना था।

वो चला शहर की ओर,यहाँ चकाचौंध थी चारों ओर,
इन पिली उजली रौशनी के गुब्बारों से थी हरदम ही भोर।
गाँव को छो‌‌‍‌ड़ वो था ज़रा भाव विभोर,
पर मन में थी एक आस की फिर लौटेगा गाँव की ओर।
काम से थक कर जब सोता था, तो यहाँ भी होती थी उन गावों वाली ही भोर ,
बस चूल्हे के धुएं की जगह फैक्ट्रियों के धुएं ही थे हर ओर।
शहरों की आपाधापी से कभी जब उसका मन उचट सा जाता था,
गाँव के अपने दिनों को याद कर आंसू की धारा बहाता था।
मनी आर्डर के जवाबी खत को पाकर उसका रोम रोम खिल जाता था।
पिंटू के अंग्रेजी स्कूल में दाखिले की खबर से वो इठलाता था।
बूढी माँ के उसकी सलामती की चिंता को पढ़ गमगीन हो जाता था।
पता नहीं उस खत में ऐसा क्या वो पाता था,
अगली सुबह एक नयी ऊर्जा से मानो वो भर जाता था।
गाँव जाने के उस सपने को लेकर मजबूत कदम बढ़ाता था।
त्योहारों पर छुट्टी लेकर गाँव को वो जाता था,
शहरों की कहानिया सुन माहौल ठहाकों से भर जाता था।
पर दोस्तों से गाँव में लूट मार की घटनाओ का विवरण पाता था।
वापस परिवार को छोड़ शहर जाने से वो घबराता था
पर उस कागज़ के टुकड़े से खुश,परिवार को देख वो भी खुश हो जाता था।
ख़ुशी वाले इन कागज़ों को बटोरने फिर शहर निकल वो जाता था।
माँ की बिगड़ती सेहत की खबर जब वो खतों में पाता था,
धिक्कारता था वो खुद को जो माँ की सेवा छोड़ बेकार ही शहर में समय गवाता था।
अब वो परिवार को भी शहर में बसाने का मन बनाता था।
उनके खातिर एक बड़े घर का ख्वाब भी वो सजाता था।
उस ख्वाब को मन में लिए अब ज्यादा समय इन फैक्ट्रियों में ही वो बिताता था।

समय की गति थी या खुद समय ही गति बन जाता था
जब एक बूढ़े से उसका पोता कहानियां सुनने की ज़िद कर जाता था।
कल की ही बातों को वो कहानियों में बुन कर सुनाता था, वो कहता ” इन खेतों खलिहानो से ही एक नौजवान ने कुछ ख्वाब बुना था,
घर परिवार थे हरे भरे पर पैसों से ज़रा सूना था।
दूर देशों में खजाने की कहानिया सुन उन राहों को उसने चुना था।
पर खजाने नहीं थे उन देशों में,वहाँ तो सब कुछ ही सूना था।
अंत में लौट कर उस मिटटी के घर में खजाने को जब वो पाता था।
हँसता था अपनी किस्मत पर,
और जीवन के आँख मिचौली के खेल को समझ जाता था।
अब खजाना तो वही था,पर अब अपने नहीं थे वहाँ और वो घर भी अब उन दूर देशों जैसा ही सूना सूना था।”

“दादाजी ये कहानी तो मैंने है कई बार सुनी,पर आखिर कौन था वो नौजवान जो खजाने को पाकर भी ना हो सका धनी?”
उस बूढ़े ने हँसते हुए कहा ,”वो नौजवान मेरे दादाजी थे, मेरे पिताजी हुए,फिर मैं हुआ ,अब तुम्हारे पिताजी हैं,और कल तुम खुद ही होगे।
सच है की ये कहानियां तो हम सब ने है कई बार सुनी पर उस दूर देश में किसी खजाने के पीछे भागने ही लग जाते हैं हम, कर इस कहानी को अनसुनी।
अंत में जान ये पाते है की अपनों के बीच उस छोटे से मिटटी के घर में ही छिपी थी उस ख़ज़ाने की चमकीली रौशनी।
शयद उन दूर देशों की राह ही थी गलत जो थी हमने चुनी।”

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