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At Least He's a Man

In the wake of all the chatter, horror, outrage and ridicule concerning the recent US election, my mother’s remark hit me like a sledgehammer. 1,136 more words

सोनम गुप्ता की बेवफाई.....

काफी दिनों से सोशल मीडिया पर एक नाम छाया हुआ है- सोनम गुप्ता!! इस नाम की कोई छवि नहीं है. कोई नहीं जानता ये कौन है, कोई है भी या नहीं. किसी ने नोट पर उसका नाम क्या लिखा पूरा देश पागल हो गया. इतनी तस्वीरे, विडियो, जोक आदि इस एक नाम पर बन गए कि अब कोई नहीं जानता कि ये सब शुरू किसने किया.

पर मज़ाक से ज्यादा ये पूरी कवायद एक बहुत गंभीर प्रश्न पूछती है. इन चुटकुलों में कहीं एक बदसूरत आईना है. सब उस आईने की खूबसूरती दिख रही है पर मुझे आईने में अपना समाज का अक्स दिख रहा है. और सच कहूँ तो ये प्रतिबिम्ब बिलकुल भी सुन्दर नहीं.

अब प्रश्न ये उठता है “सोनम गुप्ता बेवफा है” में मज़ाक कहाँ था. नाम में तो कुछ हास्यापद नहीं है, न ही बेवफाई कोई सुखद एहसास है. 2000 के नोट पर शब्द अंकित कर जानबूझ उसे गंदा करना, क्या ये हास्यापद है… लगता तो नहीं. फिर कैसे इन शब्दों का  मिलन एक मज़ाक बन गया. और क्या वास्तव में बस एक मज़ाक है.

इस पूरे प्रकरण में कई बाते खटकती है. सोचता हूँ अगर इस नोट पर अगर सोनम गुप्ता की जगह अगर किसी और का नाम होता तो क्या ये उतना प्रभावशाली होता. मसलन रमेश या सुरेश बेवफा है… अटपटा लगा न. हाँ लेकिन शायद अगर सोनम की जगह सोनल या कोमल होता तो शायद ज्यादा फर्क नहीं होता. क्यूंकि बात तो नाम की थी ही नहीं. सोनम गुप्ता में कोई बड़ी बात नहीं, न उसका बेवफा होना अचरज की बात है हाँ पर लडकियां बेवफा होती है, इस बात पर हमारे समाज के पुरुषो को कोई ऐतराज़ नहीं है!!

सोनम गुप्ता बेवफा हो न हो परन्तु हमारी मानसिकता अवश्य संकीर्ण है. इस मज़ाक में एक कुंठा झलकती है. वो सभी लोग खासकर युवक जो स्त्री सुख का “उपभोग” करने को आतुर है, वे लोग जो बार बार असफल हो रहे है प्रेम प्रसंग में, वे जिनमे अपने ह्रदय की बात कहने का साहस नहीं, वो जो स्त्रियों को वस्तु या पदार्थ से अधिक कुछ नहीं समझते या वो लोग जो एक पुरुषवादी मानसिकता के गुलाम है, उनके लिए ये अदना से मज़ाक एक सौगात लेकर आया अपने भीतर की कुंठा, वैमनस्य और अतृप्त अभिलाषाओ को अभिव्यक्त करने का. सोनम गुप्ता प्रतीक है उन लाखों करोडो स्त्रियों की जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निरंतर शोषित होती  है. हमारे मज़ाक में एक घृणा है, हमारे हास्य में एक कुंठा. Sigmund Freud ने लिखा है कि मज़ाक उन बातो की अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट माध्यम है जिन्हें गंभीर चर्चाओ में दबाया जाता है. साफ़ है सीधे विचार अभिव्यक्त करने से आपको नारी विरोधी का दर्जा मिल सकता है. हमारी शांति इसलिए नहीं है क्यूंकि हम विकार और वैमनस्य रहित है, नहीं बल्कि हम ठप्पा लगने से डरते है. इसलिए तो जो चीज़ हम खुलकर नहीं कहते उसे मज़ाक में कितनी आसानी से अभिव्यक्त कर देते है.

क्यूँ ऐसा होता है कि स्त्री के चरित्र पर ऊँगली उठाते, उनकी सोच का मज़ाक उड़ाते, उन्हें पुरुषो से हीन बताने वाले विचारो को इतनी लोकप्रियता मिलती है. कोई कह सकता है कि भाई ये तो सिर्फ मज़ाक है, पर क्या हमारे मज़ाक हमारे समाज हमारी सोच का हिस्सा नहीं है? एक चीज़ जो अक्सर मुझे खटकती है वो ये कि फेसबुक पर मौजूद लगभग हर मजाकिया पेज  पर नारीवाद विरोधी हास्य को बड़ी प्रमुखता से जगह दी जाती है. लड़कियां भाव खाती है, लडकियां बुद्धिहीन है, लड़कियां भौतिकतावाद की प्रतिमूर्ति है. और यहीं से जड़े फैलाती है हज़ारो सोनम गुप्ताएं क्यूंकि हम लोगों में ये क्षमता नहीं कि लड़की की ना बर्दाश्त कर सके, न ही इतनी विनम्रता कि किसी के विचारों का, किसी के फैसलों का, किसी की मर्ज़ी को जगह दे सके. सच बात तो ये है कि हमने स्त्री को गर्लफ्रेंड या पत्नी से अधिक कोई दर्जा दिया नहीं, इंसान का तो बिलकुल नहीं.

अगर सोनम गुप्ता ने सच में बेवफाई कि क्यूँ ऐसा था कि पूरा समाज इस बेवफाई को लेकर उत्तेजित हो गया. क्या ये सचमुच मज़ाक था या एक भड़ास और एक कोशिश, उस पितृसत्तात्मक  सरंचना को जायज़ ठहराने की जिसमे स्त्री इस कदर बंधी हुई है कि उसे बेवफाई का न अवसर है न अधिकार. साथ ही फ़ैल गए उनके मुख जो नारीवाद विरोधी विमर्श करना चाहते है और लैंगिक समानता के नाम पर पितृसत्तात्मकता का बिगुल फूंकते है. और साथ ही इस कवायद में शामिल थी भारी संख्या में कन्याएं , लड़कियां, स्त्रियाँ सब जो बदकिस्मती से ये नहीं समझती कि ये मज़ाक वास्तव में उनके अस्तित्व पर किया गया है, उनके सामाज में दर्जे को चुनौती दी गयी है. सोनम गुप्ता की बेवफाई हमें बताती है कि हमारी सोच कितनी पिछड़ी है. नारीवाद से चिढ़ने वाले वास्तव में निपट अज्ञानी है, और कई लोग जो इस शब्द से खुद को जोड़ते है कदाचित इस बात से अनिभिज्ञ है कि नारीवाद की असली लड़ाई हमारे पूरे अस्तित्व से है. वो अस्तित्व जो न हमारा है, जो न हमारी इच्छा से है. सोनम गुप्ता हमें याद दिलाती है कि नारीवाद अभी तक लोगों तक पहुंचा नहीं है.

सोनम गुप्ता बेवफा नहीं, हमारी सोच सामंती है, इस घिसे पिटे मज़ाक के पीछे की सोच बड़ी ही गन्दी है.

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