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My Favourites ...Solos

Even though the title says “My Favourites” – in reality, that is not actually possible…..for every song listed i can find at least another 5 to replace…it is almost impossible to narrow down the list but i will try and highlight at least one stunning hidden gem from each song that has resulted in the song appearing in my list. 360 more words

Bollywood

Appalling ...

Karan Johar is one the most arrogant and self centred individuals who hangs around with the rich and glossy fraternity in bollywood , to add to these accolades he is ignorant and has just proved what a repulsive individual he has become with not an ounce of shame… 398 more words

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Mohammed Rafi Saab ...

This is something i have wanted to do for a long, long time – my own personal tribute to the one individual who’s voice has had a profound  affect on my life. 338 more words

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मन रे.. तू काहे ना धीर धरे...

हम कितना भी इस मन को समझा लें, मगर वो समझता है क्या? ये मन कभी किसी तरह का धीरज रखता है क्या? फिर उस पर किसी और के कहने-समझाने से तो ये और भी न रुके, बल्कि और भी ज़्यादा फैलें। वैसे भी अब जबकि दुनिया ‘ये दिल मांगे मोर’ और ‘थोड़ा और विश करो’ का मंत्र लेकर बढ़ रही हैं, तब मन को बांधते की सीख देने वाले लोग गुज़रे ज़माने के लगते हैं। लेकिन ये सीख, ये समझाईश अगर रफ़ी साहब की आवाज़ में मिले तो क्या होगा? भई मैं औरों की तो नहीं जानता, लेकिन मैं तो एक जगह बैठकर अपने आप से इस मन की चंचलता पर लग़ाम कसने का वादा ज़रूर करूंगा। फिर चाहे वो वादा इस गीत के ख़त्म होने के साथ ही अपने आप टूट जाए।

महान फिल्मकार केदार शर्मा साल 1964 में फिल्म “चित्रलेखा” लेकर आए थें, जो कि उनकी ही साल 1941 में इसी नाम से आई फिल्म की रीमेक थी। ओरिजनल फिल्म तो बेहद कामयाब रही लेकिन इसके रीमेक को न तो थिएटर में दर्शक मिलें और ना ही अख़बारों में क्रिटिक्स की तारीफ़, लिहाज़ा ये फिल्म कोई असर नहीं छोड़ पाई। जबकि फिल्म में अशोक कुमार, प्रदीप कुमार और मीना कुमारी जैसे बड़े सितारें थें। वो कहते हैं न कि सफलता का दोहराव अक़्सर ख़तरनाक होता है, तो 1964 की फिल्म “चित्रलेखा” के साथ भी यही बात लागू हुई।

एक ख़राब फिल्म होते हुए भी “चित्रलेखा” हिंदी सिनेमा में अपनी मौजूदगी दर्ज़ करा गई और इसकी वजह बना रोशन साहब का अमर संगीत और साहिर लुधियानवी के आला दर्ज़े के गीत। ख़ासकर ‘मन रे तू काहे ना धीर धरे’ तो हमें साहिर की शब्दरचना का लोहा मानने को मजबूर कर देता है।

उर्दू के इस महान शायर ने जिस तरह से हिंदी शब्दों का सटीक इस्तेमाल किया है वो हिंदुस्तानी ज़बान को लेकर उनकी जानकारी और समझ को ज़ाहिर करता है। (कुछ ऐसा ही एहसास मुझे तब हुआ था, जब जावेद साहब ने फिल्म “लगान” में ‘ओ पालनहारे’ और ‘राधा कैसे न जले’ लिखा था।)

दोस्तों, रोशन और साहिर के इस प्रयास को असल में ज़िंदा किया रफ़ी साहब ने, क्योंकि उन्होंने जिस लगन, गहराई, तल्लीनता और आत्मीयता से इस गीत को गाया है, वैसे तो दोबारा से फिर कोई नहीं गा पाया है। कई साल पहले अपने एक लाइव कॉन्सर्ट के शुरू होने से पहले किशोर दा ने अपने इस दोस्त यानी रफ़ी साहब को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए ये गीत गाया था। हो सकता है कि श्रद्धांजलि के तौर पर गाए इस गीत को सुनकर लोग इन दोनों महान गायकों के बीच तुलना करने लगे, लेकिन सचमुच में ऐसा करना मुझे बहुत अखरता है क्योंकि ये दोनों ही अपनी-अपनी जगह पर अपना अलग रूतबा रखते हैं। ज़रा किशोर दा की आवाज़ में ये महान गीत सुनिए…

इसी गीत को अब लता मंगेशकर जी की आवाज़ में भी सुनिए। लता जी ने भी ये गीत रफ़ी साहब को ट्रिब्यूट देने के लिए ही गाया था।

दोस्तों, हमारे हिंदी फिल्म संगीत में ऐसे कई गीत हैं जो हमारे सामने जीवन का दर्शन खोलकर रख देते हैं। हो सकता है कि इनमें मेरी और आपकी पसंद के कई और भी अलग-अलग गीत शामिल हों, लेकिन ये तो मानना होगा कि फिल्म “चित्रलेखा” का ये नग़मा अपनी जगह बहुत ऊपर रखता है। बहुत-बहुत शुक़्रिया… प्यार…

Mohd Rafi-You are a Legend

The year was 1996 in Kolkata and the local sound box in our para were tirelessly playing all the patriotic songs.Songs like ‘Ab Tumhare Hawale Watan Sathiyo’,’Ae Watan Ae Watan Humko Teri Kasam’ and ‘Woh Bharat Desh Hain Mera” appeared in repeat mode..I was enigmatically drawn to the unique voice of the playback singer. 534 more words

A Bit Of Everything

My Father's Jukebox: Memories of Mohd. Rafi

My memories of my childhood are almost all tragic. Don’t get me wrong. I had a perfectly healthy, normal — a bit too normal for my taste in films and literature — childhood, when I think about it rationally. 922 more words