Tags » Mushaira

A few notes to some dear friends...

Miley tumsey pehli baar

Zamana ho gaya

Maaf karna tum pe koi

Deewana ho gaya

Tere hunar ke fitoor mein

Na janey kitni raatein di guzar… 38 more words

Poetry

Tera zikr...

Aaj sur ki ganga mein
mujhey behney de
tera zikr mujhey
zara aur karney de…

Umr ko chhal ke tuney
jawano ko peechhey chhod diya… 59 more words

Poetry

Bachpan ki Saheli ke liye

Aa chal aaj mil ker koodein
bichha ker bachpan ki yaadon ka bichhauna
tere janmdin pe deti hoon
tujhey her ek wo khilauna
jisey chhooney ke liye… 82 more words

Poetry

Shaam e Sher: An evening of pleasant surprises #UrduPoetry

Last weekend, I attended a Mushaira in an unusual place. I say unusual because, of all the possible places in and around Dehli (as it’s pronounced and written in Urdu), which could be associated with Urdu and Mushairas, NOIDA stands the least probable. 710 more words

सूरज भी आ गया था आशिकी के दांव में...

कल घूमने गया था समंदर के गांव में,
हिचकोलियां खाती रही कश्ती बहाव में,
 
आज जल्दी शाम हो मैं ये दुआ करने लगा
और वो सफर करता रहा सूरज की छांव में,
 
सूरत को क्या बयां करूं वो हुस्न नूर था,
नजरें थीं आसमान पर इतना गुरूर था,
 
पायल कि वो झनकार सुन रहा हूं आज तक,
जादूगरी थी ऐसी कोई उसके पांव में।
 
थे होंठ सुर्ख और बदन मरमरी सा था,
था रूप कोई अप्सरा का या परी का था,
 
जुल्फों में घटाएं थीं चेहरे पे धूप थी,
सूरज भी आ गया था आशिकी के दांव में।।
                                — अतुल कन्नौजवी

यहां परदेस में मुझको मेरा घर याद आता है...

वो घर जो बचपन में शरारत करने पर
 हमें अपने कोने में छुपा लेता था
 वो घर जिसके आंगन में आज भी
 मेरी पैदाइश का नाडा दबा हुआ है.
 वो घर जिसमें मां—बाप बचपने में मुझे
 हंसते खिलखिलाते देखकर खुश होते थे,
 वो घर जिसमें हम सब
 भाई बहनों का बचपन बीता है
 वो घर जो हम सबसे हमेशा बातें करता था
 और खुद बच्चे की तरह हमारे साथ खेलता नजर आता था
 वो घर जो हमें आंधी, तूफान, धूप—बारिश से हमेशा
 बचा लेता था और हम चैन से सोते रहते थे
 वो घर जो मेरा, दीदी और भइया के बर्थ डे पर
 हम सबके साथ खिलखिलाता सा दिखता था,
 वो घर जो दीदी की शादी में विदाई के समय
 और बाद में खूब रोया और कई दिनों तक गुमशुम रहा था
 वो घर जो बचपने में मुझे हर शैतानी के लिए
 पूरा आंगन हाथ फैलाकर खोले रहता था
 वो घर जो मेरे और दीदी के स्कूल से लौटने पर
 हम लोगों के साथ आंख मिचौली खेलने का इंतजार करता था
 वो घर जो मेरे खिलौने और तमाम चीजें अपने पास
 छुपाकर रख लेता था और किसी को नहीं बताता था
 वो घर जो भइया और मेरे पढाई के लिए जाने पर
 आंखें नम कर लेता था
 वो घर जो मेरे दूर जाने पर
 हमेशा गुमशुम सा हो जाता था
 वो घर जो बूढे मां—बाप की आज भी
 हमेशा की तरह परवाह करता है
 वो घर जो हर त्योहार पर मेरा इंतजार करता है
 वो घर मेरे आज भी पहुंचने पर गले लग जाता है
 और पहले खूब रोता है और फिर मेरे साथ मस्ती करता है
 वो घर मेरे रहने तक
 पुरानी बातों की जिक्र करता रहता है
 वो घर मेरे वापस दूर जाने पर
 सिसकियां भरता है
 लेकिन चुपचाप आंसू पी जाता है
 वो घर मेरे पुराने कपडों, मेरी पुरानी किताबों और गेंद—बल्ले को
 आज भी सहेजकर रखे हुए है
 वो घर आज हमेशा त्योहारों के आने का इंतजार करता है
 क्योंकि हम लोग इन्हीं मौकों पर पहुंच पाते हैं
 और जब हम त्योहार पर घर जाते हैं तो
 वो घर मुझे पूरे साल की शहर में हुई घटनाएं,
 लोगों की कानाफूसी और
 शहर का हालचाल विस्तार से बताता है
 इसलिए दोस्तों, रोजगार की तलाश में
 देश में रहो या विदेश में, लेकिन घर से हमेशा प्यार करो
 क्योंकि घर न होता तो हम बेघर होते
 और बेघर लोगों को यह प्यार नहीं मिल पाता है।
 इसलिए वो घर जिसमें रहते हैं मां—बाप,
 यही सबसे बडा तीर्थस्थल है, जन्मस्थल है।
 इसे कभी मत भूलना....!

–  — अतुल कन्नौजवी

Atul Kannaujvi