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Somewhere in the heart of the deep south live a group of imperfect Muslims. They argue, yell at each other, go on a fast of silence, speak words that leave a wound in the heart of the other, and then get back together much like siblings. 1,615 more words



She always know that this was going to be a step she would take.At first she was hesitant because she know things were going to change but then she decided it was the right decision to make.So on the 1st of march her journey began and she finally decided to put on the hijab.Every girl who puts on the hijab is faced with some sort of obstacle.For some it’s their families not wanting them to wear it and others have self esteem issue with it,others face doubt’s about it.The challenge that she had faced was one of the many others have also faced.She was embarrassed and often asked herself why she needed to be so different and she went about her high school life struggle with her identity trying to answer the questions of who she was really and the she fell in love with the hijab because she came to understand that it was not simply a piece of fabric draped over her body to conceal beauty and preserve modesty.It was a physical manifestation of her submission and connection with her lord.When she learnt the rationale for the hijab presented in the Quran she was blown away.But we need to understand that by wearing hijab is not considered as islam rather she is a muslim. 54 more words


Tafsiir Continued


A topic that is widely discussed in the Quran and that has many political implications in today’s society, is Jihad (“holy war” or “holy struggle”). 1,176 more words


Leila Aboulela: The West & Islam

Animosity towards “the Other” has long been a recurring phenomenon throughout Western countries, with the mistrust and isolation of minorities being deeply rooted in prejudice and hate. 1,547 more words


One sided laws.

Following six months of consultations with various groups, the All-Party Parliamentary Group (APPG) on British Muslims proposed “Islamophobia is rooted in racism and is a type of racism that targets expressions of Muslimness or perceived Muslimness” as an official definition. 329 more words


...तो भारत में कितने लोग शाकाहारी हैं?

यहां यदि आप किसी से पूछेंगे के आप मांसाहारी हैं या शाकाहारी तो वे अपने शाकाहारी होने का बहुत अच्छे अंदाज़ में दावा करते हैं। मसलन आप अगर किसी से पूछेंगे कि भाई आप मांसाहारी हो या शाकाहारी तो आपको जवाब मिलेगा…….
“शाकाहारी हूं लेकिन चिकन खा लेता हूं ”
” हां ऐसा शाकाहारी हूं के प्याज़, लहसुन भी नहीं खाता हां अंडा खा लेता हूं ”
” शाकाहारी हूं भाई लेकिन घर के लिए, बाहर में कभी-कभी चिकन खा लेता हूँ ”
” मेरे घर में मांस मछली सब खाते हैं लेकिन मंगलवार को नहीं बनाते” और कुछ लोग रविवार को शाकाहारी बन जाते हैं”
2003 में अमेरिका के खाद्द संगठन के द्वारा एक सर्वे किया गया जिसमें पाया गया के भारत में करीब 42 फीसदी लोग ही शाकाहरी हैं। और 58 फीसदी लोग मांसाहारी जिसमें पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक करीब 98 फीसदी लोग मांस-मछली का सेवन करते हैं। साल 2014 में रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के सर्वे के मुताबिक ये आंकड़ा बढ़कर करीब 71 फीसदी हो गया जो मांस-मछली का सेवन करते हैं।
भारतीयों को लेकर कई जगहों पर ये ग़लतफहमी है कि वे लोग शाकाहारी होते हैं। हालांकि मौजूदा केन्द्र सरकार की रणनीती भी इस धारना को पोखता बनाती है जबकि सच इससे बिल्कुल उलट है। देश की आबादी में 80 फीसदी हिन्दू हैं जिसमें अधिकतर लोग मांस खाते हैं केवल अगड़ी जातियों के हिन्दू ही शुद्ध शाकाहारी हैं। तथाकथित छोटी जातियों, दलित और जनजातियों के लोग मुख्यत: मांसाहारी ही हैं।
केरल की 70 फीसदी आबादी मटन की जगह बीफ खाना पसंद करते हैं जबकि केरल की आबादी में केवल 26.6 फीसदी आबादी ही मुसलमान हैं और करीब 18.4 फीसदी ईसाई हैं दोनों को मिला दिया जाए तो ये करीब 45 फीसदी होते हैं। हालांकि केरल के 70% लोग बीफ खाते हैं।
सरकार के मुताबिक भारत में बीफ खाने वालों की संख्या बेहद कम है केवल 17 फीसदी लोग ही बीफ का सेवन करते हैं। हालांकि ज़मीनी सच कुछ और ही बयां करती हैं। मौजूदा सरकार भी इस प्रकार की धारणा को प्रमोट करती है। वे मानते हैं कि बीफ खाना अपवित्र होता है, वे गाय को एक पवित्र जानवर मानते हैं। हालांकि लगभग 80 फीसदी आबादी बीफ मांस-मछली का सेवन करती है, जिसमें से 65 फीसदी लोग हिन्दू और दूसरी जाती के हैं।