Tags » Nathuram Godse

It is fitting that Gandhi's assassination is being used to widen the democratic imagination

The information commissioner’s ruling to make public Nathuram Godse’s statement could not have come at a better time

A nation state which aspires to be a national security state and a democracy is a peculiar and a paradoxical entity. 621 more words

Scroll.in

Godse's Ghost

Today, 30th January 2017, we celebrate the 69th Death Anniversary of the killing of Mahatma Gandhi. For the past few years, every January, there are a slew of messages glorifying the murderer, Nathuram Godse; messages that glorify Godse and justify his murder through an essay of his “Why I killed Gandhi”, his statement in court justifying the murder. 952 more words

मूर्ति पूजा क्यों की जाती है ?

एक बार भ्रमण करते धर्मयोद्धा स्वामी विवेकानन्द अलवर राज्य में गये । सम्पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ महाराजा ने स्वामी जी का भव्य स्वागत किया । महाराजा युवक थे एवं पश्चिमी विचारों से कुछ – कुछ प्रभावित भी थे । मूर्ति पूजा में उनकी आस्था नहीं थी । स्वामी जी से वार्तालाप करते समय , उन्होंने व्यंग्य पूर्ण भाषा में पूछा कि मन्दिरों में मूर्ति पूजा क्यों की जाती है ?
स्वामी विवेकानन्द ने महाराजा को बताया कि मूर्ति रूप में ईश्वर की पूजा करना भी उसकी प्राप्ति का एक मार्ग है और इससे कोई हानि भी नहीं है । परन्तु महाराजा इस उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए । अपने तर्क की पुष्टि के लिए स्वामी जी ने वहा उपस्थित मंत्री से कहा कि वह दीवार में लटका महाराजा का एक चित्र लाएं । मंत्री ने महाराजा का चित्र लाकर स्वामी जी को सौंप दिया । स्वामी जी ने तब मंत्री से कहा कि वह महाराजा के चित्र पर थूके । इस सुझाव मात्र पर ही मंत्री का सिर चकराने लगा । उसने स्वामी जी से कहा कि यह काम करना मेरे लिए असम्भव है ।

भारत के लिए आदर्श शिक्षा व्यवस्था – स्वामी विवेकानन्द

तब स्वामी विवेकानन्द महाराज की ओर मुड़े और उन्हें निर्दिष्ट करते हुए कहा कि जिस प्रकार मंत्री ने महाराजा के केवल एक चित्र पर थूकना अस्वीकार कर दिया जबकि वह एक निर्जीव कागज है , केवल महाराजा का एक प्रतीक मात्र है । ठीक इसी प्रकार मूर्ति पूजा भी एक ऐसा प्रतिकात्मक कार्य मात्र है , जो अंत में सामान्य लोगों को ईश्वर में ध्यान केन्द्रित करने एवं उच्च आध्यात्मिक स्तरों तक पहुंचाने में सहायता करता है ।
संस्कृत भाषा में प्रतिक का अर्थ है ‘ ओर आना ‘ या ‘ समीप पहुँना ‘ । विश्व के सभी धर्मो में उपासना की कई पद्धतियां प्रचलित है । कुछ लोग अपने धर्म गुरूओं की पूजा करते है , तो कुछ लोग आकृति विशेष या प्रकृति की पूजा करते है और कुछ ऐसे भी लोग है जो मनुष्य से उच्चतर प्राणियों देवदूत , देवता , अवतार इत्यादि की पूजा करते है । इन भिन्न – भिन्न पद्धतियों में से भक्तियोग किसी का तिरस्कार नहीं करता । वह इन सब को एक प्रतीक नाम के अन्तर्गत कर प्रतिक पूजा या मूर्ति पूजा कहकर मानता है । ये सब ईश्वर की उपासना नहीं कर रहे है पर प्रतिक की उपासना करते है , जो ईश्वर के समीप है । पर ये प्रतिक पूजा हमें मुक्ति और स्वातंत्र्य के पद पर नहीं पहुँचा सकती । यह तो उन विशेष चीजों को ही दे सकती है जिनके लिए हम उनकी पूजा करते है । किसी भी वस्तु को ईश्वर मानकर पूजा करना एक सीढ़ी ही है जो परमेश्वर की ओर मानो एक कदम बढ़ने , उसके कुछ समीप जाने के समान है । यदि कोई मनुष्य अरूंधती तारे को देखना चाहता है , तो उसे उसके समीप का एक बड़ा तारा पहले दिखाया जाता है और जब उसकी दृष्टि बड़े तारे पर जम जाती है , तब उसको उसके बाद उससे छोटा एक दूसरा तारा दिखाते है । ऐसा करते – करते क्रमशः उसको अरूंधती तक ले जाते है । इसी प्रकार ये भिन्न – भिन्न प्रतिक और प्रतिमाऐं उसे ईश्वर तक पहुंचा देती है ।
दो प्रकार के मनुष्य को किसी प्रतिक या मूर्ति की आवश्यकता नहीं होती – एक तो मानव रूपधारी पशु , जो कभी धर्म का विचार नहीं करता और दूसरा पूर्णत्व को प्राप्त हुआ व्यक्ति जो इन सब सीढ़ियों को पार कर गया होता है । इन दोनों छोरों के बीच में सबको किसी न किसी बाहरी या भीतरी आदर्श की आवश्यकता होती है । मैं तो कहता हूं कि चित्र की नहीं चरित्र की उपासना करो , व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व की पूजा करो । भगवान श्रीराम एक नाम नहीं बल्कि श्रीराम का अर्थ त्याग , आदर्श , करूणा , दया , समता , स्वाभिमान , शौर्य , स्वधर्म के प्रति अपने आप को समर्पिक करना है । भगवान श्रीराम प्रत्येक मनुष्य के लिए आदर्श है । भगवान श्रीकृष्ण , भगवान महावीर , भगवान बुद्ध को किसी भी धर्म या जाति विशेष की परीधि में नहीं रखा जा सकता है । ये तीनों अहिंसा , करूणा , तप व त्याग के प्रतिक है । इसलिए चित्र की नहीं चरित्र की पूजा करने की आवश्यकता है ।

अखण्ड भारत के स्वप्नद्रष्टा -वीर नाथूराम गोडसे भाग – एक

अमेरिकी लेखक डेल कार्नेगी लिखते है – जब कभी मैं मानसिक चिंताओं से परेशान होता हूं , मैं अब्राह्म लिंकन के शान्त चित्र पर अपना ध्यान केन्द्रित करता हूं । इससे मन में शान्तभाव , साहस और नई प्रेरणा आती है । मैं तरोताजा होकर फिर काम में जुट जाता हूं । घर में रखी प्रत्येक मूर्ति या चित्र से एक वातावरण का निर्माण होता है । मनुष्य अपनी आंखों से दिन – प्रतिदिन इन चित्रों या मूर्तियों को देखता है , बार – बार दृष्टि पड़ने से इनका सूक्ष्म प्रभाव सीधे मन पर पड़ता है । इन चित्रों में चित्रित भावनाओं , स्थितियों , मुद्राओं के अनुसार हमारे मन में शुभ – अशुभ विचार , भावनाएं उत्पन्न होती है , वैसी ही मन स्थितियां बनती है । हमारे देवी , देवताओं , वेद , उपनिषद् , रामायण , महाभारत के इतिहास से सम्बन्धित मूर्तियों की प्रत्येक आकृति में , हाव – भाव , मुख – मुद्राओं में , दिव्य संदेश भरे हुए है । उन संदेशों को याद करके , जीवन में उतारने का प्रयत्न करना चाहिए ।
अग्निना अग्निः समिध्यते ।
अग्नि से अग्नि , बड़ी से छोटी आत्मा प्रदीप्त होती है । महान विभूतियों , देवी – देवताओं की मूर्तियों से दीप्तिमान शान्तिदायक प्रेरक वातावरण में रहकर अपनी आत्मा को आलोकित करें ।
……………………….

REALITY

अखण्ड भारत के स्वप्न द्रष्टा - वीर नाथूराम गोडसे भाग - 3

पिछले दो भागोँ मेँ आपने श्री नाथूरामजी गोडसे द्वारा गांधीजी का वध करने के प्रमुख कारणोँ को पढा,अब आगे ……

अखण्ड भारत के स्वप्नद्रष्टा -वीर नाथूराम गोडसे भाग – एक

8 more words
REALITY

अखण्ड भारत के स्वप्न द्रष्टा - वीर नाथूराम गोडसे भाग-2

जैसा कि पिछले भाग मेँ बताया गया है कि श्री नाथूराम गोडसे व अन्य राष्ट्रवादी युवा गांधीजी की हठधर्मिता और मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति से क्षुब्ध थे, हिन्दुस्थान की जनता के दिलोँ मेँ गांधीजी के झूठे अहिँसावाद और नेतृत्व के प्रति घृणा पैदा हो चुकी थी । उस समय गांधीजी के चरित्र पर भी अंगुली उठ रही थी जिसके चलते वरिष्ठ नेता जे. बी. कृपलानी और वल्लभ भाई पटेल आदि नेताओँ ने उनसे दूरी बना ली । यहा तक की कई लोगोँ ने उनका आश्रम छोड दिया था । अब उससे आगे के बयान …….
इस बात को तो मैँ सदा से बिना छिपाए कहता रहा हूँ कि मैँ गांधीजी के सिद्धांतोँ के विरोधी सिद्धांतोँ का प्रचार कर रहा हूँ । यह मेरा पूर्ण विश्वास रहा है कि अहिँसा का अत्याधिक प्रचार हिन्दू जाति को अत्यन्त निर्बल बना देगा और अंत मेँ यह जाति ऐसी भी नहीँ रहेगी कि वह दूसरी जातियोँ से, विशेषकर मुसलमानोँ के अत्याचारोँ का प्रतिरोध कर सके ।

अखण्ड भारत के स्वप्नद्रष्टा -वीर नाथूराम गोडसे भाग – एक

हम लोग गांधीजी की अहिँसा के विरोधी ही नहीँ थे, प्रत्युत इस बात के अधिक विरोधी थे कि गांधीजी अपने कार्यो और विचारोँ मेँ मुस्लिमोँ का अनुचित पक्ष लेते थे और उनके सिद्धांतोँ व कार्यो से हिन्दू जाति की अधिकाधिक हानि हो रही थी ।
मालाबार, नोआख्याली, पंजाब, बंगाल, सीमाप्रांत मेँ हिन्दुओँ पर अत्याधिक अत्याचार हुयेँ । जिसको मोपला विद्रोह के नाम से जाना जाता है । उसमेँ हिन्दुओँ की संपत्ति, धन व जीवन पर सबसे बडा हमला हुआ । हिन्दुओँ को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया, स्त्रियोँ के अपमान हुये । गांधीजी अपनी नीतियोँ के कारण इसके उत्तरदायी थे, मौन रहे । प्रत्युत यह कहना शुरु कर दिया कि मालाबार मेँ हिन्दुओँ को मुसलमान नहीँ बनाया गया ।यद्यपि उनके मुस्लिम मित्रोँ ने यह स्वीकार किया कि सैकडोँ घटनाऐँ हुई है । और उल्टे मोपला मुसलमानोँ के लिए फंड शुरु कर दिया ।
कांग्रेस ने गांधीजी को सम्मान देने के लिए चरखे वाले ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज बनाया ।प्रत्येक अधिवेशन मेँ प्रचुर मात्रा मेँ ये ध्वज लगाये जाते थे । इस ध्वज के साथ कांग्रेस का अति घनिष्ट सम्बन्ध था । नोआख्याली के 1946 के दंगोँ के बाद वह ध्वज गांधीजी की कुटिया पर भी लहरा रहा था, परन्तु जब एक मुसलमान को ध्वज के लहराने पर आपत्ति हुई तो गांधी ने तत्काल उसे उतरवा दिया । इस प्रकार लाखोँ – करोडोँ देशवासियोँ की इस ध्वज के प्रति श्रद्धा को गांधी ने अपमानित किया । केवल इसलिए की ध्वज को उतारने से एक मुसलमान खुश होता था ।
कश्मीर के विषय मेँ गांधी हमेशा यह कहते रहे की सत्ता शेख अब्दुल्ला को सौप दी जाये, केवल इसलिए की कश्मीर मेँ मुस्लिम है । इसलिए गांधीजी का मत था कि महाराजा हरिसिँह को संन्यास लेकर काशी चले जाना चाहिए, परन्तु हैदराबाद के विषय मेँ गांधी की नीति भिन्न थी । यद्यपि वहाँ हिन्दूओँ की जनसंख्या अधिक थी, परन्तु गांधीजी ने कभी नहीँ कहा की निजाम फकीरी लेकर मक्का चला जायेँ ।
जब खिलापत आंदोलन असफल हो गया तो मुसलमानोँ को बहुत निराशा हुई और अपना क्रोध हिन्दुओँ पर उतारा । गांधीजी ने गुप्त रुप से अफगानिस्तान के अमीर को भारत पर आक्रमण करने का निमन्त्रण दिया, जो गांधीजी के लेख के इस अंश से सिद्ध हो जाता है – ” मैँ नही समझता कि जैसे खबर फैली है, अली भाईयोँ को क्योँ जेल मेँ डाला जायेगा और मैँ क्योँ आजाद रहूँगा ? उन्होँने ऐसा कोई कार्य नही किया है जो मैँ न करु ।यदि उन्होँने अमीर अफगानिस्तान को आक्रमण के लिए संदेश भेजा है, तो मैँ भी उनके पास संदेश भेज दूँगा कि जब वो भारत आयेँगे तो जहाँ तक मेरा बस चलेगा एक भी भारतवासी उनको हिन्द से निकालने मेँ सरकार की सहायता नहीँ करेगा ।”
मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए गांधी ने एक मुसलमान के द्वारा भूषण कवि के विरुद्ध पत्र लिखने पर उनकी अमर रचना शिवबवनी पर रोक लगवा दी, जबकि गांधी ने कभी भी भूषण का काव्य या शिवाजी की जीवनी नहीँ पढी । शिवबवनी 52 छंदोँ का एक संग्रह है जिसमेँ शिवाजी महाराज की प्रशंसा की गयी है । इसके एक छंद मेँ कहा गया है कि अगर शिवाजी न होते तो सारा देश मुसलमान हो जाता । गांधीजी को ज्ञात हुआ कि मुसलमान वन्दे मातरम् पसंद नही करते तो जहाँ तक सम्भव हो सका गांधीजी ने उसे बंद करा दिया ।
राष्ट्रभाषा के विषय पर जिस तरह से गांधी ने मुसलमानोँ का अनुचित पक्ष लिया उससे उनकी मुस्लिम समर्थक नीति का भ्रष्ट रुप प्रगट होता था । किसी भी दृष्टि से देखा जाए तो यह स्पष्ट है कि इस देश की राष्ट्रभाषा बनने का अधिकार हिन्दी को है । गांधीजी ने अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत मेँ हिन्दी को बहुत प्रोत्साहन दिया । लेकिन जैसे ही उन्हेँ पता चला कि मुसलमान इसे पसन्द नही करते, तो वे उन्हेँ खुश करने के लिए हिन्दुस्तानी का प्रचार करने लगे । बादशाह राम, बेगम सीता और मौलवी वशिष्ठ जैसे नामोँ का प्रयोग होने लगा । मुसलमानोँ को खुश करने के लिए हिन्दुस्तानी (हिन्दी और उर्दु का वर्ण संकर रुप) स्कूलोँ मेँ पढाई जाने लगी । इसी अवधारणा से मुस्लिम तुष्टिकरण का जन्म हुआ जिसके मूल से ही पाकिस्तान का निर्माण हुआ है ।

नाथूराम गोडसे के 150 बयान सार्वजनिक क्यों नहीं किये जाते ? क्यों मारा गोडसे ने गांधी को ? आखिर सच क्यों नहीं है सार्वजनिक

गांधीजी का हिन्दू मुस्लिम एकता का सिद्धांत तो उसी समय नष्ट हो गया जिस समय पाकिस्तान बना । प्रारम्भ से ही मुस्लिम लीग का मत था कि भारत एक देश नही है । हिन्दू तो गांधी के परामर्श पर चलते रहे किन्तु मुसलमानोँ ने गांधी की तरफ ध्यान नही दिया और अपने व्यवहार से वे सदा हिन्दुओँ का अपमान तथा अहित करते रहे । अंत मेँ देश का दो टुकडोँ मेँ विभाजन हो गया और भारत का एक तिहाई हिस्सा विदेशियोँ की भूमि बन गया ।
32 वर्षो से गांधीजी मुसलमानोँ के पक्ष मेँ कार्य कर रहे थे और अंत मेँ उन्होँने जो पाकिस्तान को 55 करोड रुपये दिलाने के लिए धूरर्ततापूर्ण अनशन करने का निश्चय किया, इन बातोँ ने मुझे गांधी वध करने का निर्णय लेने के लिए विवश कर दिया । 30 जनवरी 1948 को बिडला भवन की प्रार्थना सभा मेँ देश की रक्षा के लिए मैने गांधी को गोली मार दी ।

……..

अखण्ड भारत के स्वप्न द्रष्टा – वीर नाथूराम गोडसे भाग – 3

अखण्ड भारत के स्वप्नद्रष्टा -वीर नाथूराम गोडसे भाग – एक

REALITY

अखण्ड भारत के स्वप्नद्रष्टा -वीर नाथूराम गोडसे भाग - एक

19 मई 1910 को मुम्बई – पुणे के बीच ‘ बारामती ‘ में संस्कारित राष्ट्रवादी हिन्दु परिवार मेँ जन्मेँ वीर नाथूराम गोडसे एक ऐसा नाम है जिसके सुनते ही लोगोँ के मन-मस्तिष्क मेँ एक ही विचार आता है कि गांधी का हत्यारा । इतिहास मेँ भी गोडसे जैसे परम राष्ट्रभक्त बलिदानी का इतिहास एक ही पंक्ति मेँ समाप्त हो जाता है । गांधी का सम्मान करने वाले गोडसे को गांधी का वध आखिर क्योँ करना पडा,इसके पीछे क्या कारण रहे, इन कारणोँ की कभी भी व्याख्या नही की जाती । 8 more words

REALITY

Start Small!

Dream of becoming a published author was not a ‘one day adventurous thought’ for me. It all started with a dream which was not exactly mine but was of my father. 604 more words

Featured