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जानिये नाथूराम गोडसे का वो सच जो आपसे 65 साल तक छुपाया गया

नाथूराम गोडसे एक ऐसा नाम जिसे हम सब ने स्कूलों में पढ़ा, इतिहास में पढ़ा । पर क्या हम उन्हें सही सही जान पाये हैं ? कुछ लोग गोडसे को महात्मा गांधी का क़त्ल करने वाला देशद्रोही बताते हैं । जबकि कुछ अन्य उसे देश के टुकड़े करने वाले गांधी को गोली मारने वाला देशभक्त मानते हैं । कभी आपने सोचा की क्या थी परदे के पीछे की सच्चाई जिसने महात्मा गांधी के ही एक देशभक्त क्रांतिकारी अनुयाई को अपने ही आराध्य पर गोली चलाने को विवश कर दिया ?

आइये जानते हैं कुछ राज़ की बातें । अकसर जब भी नेता गलत नीतियाँ बनाते हैं, घोटाले करते हैं, उलटे सीधे बयान देते हैं, लोगो की मजबूरी पर ग़लत रिपोर्ट से मजाक बनाते हैं, लोगों और सैनिकों के मरने पर मामूली मुआवज़ा देकर उनका उपहास बनाते हैं और देश में गन्दी राजनीती करते है…..तो हम जैसे आम लोग कहते है की ये नेता मर जाएँ तो देश का भला हो, ये नेता मरते क्यों नहीं, कोई इन्हें मार दे तो प्रसाद चढाऊंगा । कुछ ऐसा ही किया था क्रांतिकारियों की आखरी पीढ़ी ने, गाँधी को मार कर(उस समय लगभग 7-8 क्रन्तिकरी दल इस काम में लगे थे) … और सफलता मिली थी “नाथूराम गोडसे” को । वो आज़ाद देश का क्रन्तिकारी जिसने समझा और समझाया की आज़ादी की लड़ाई अभी ख़तम नहीं हुई बस दुश्मन बदले हैं।

इसलिए ये नेता क्रांतिकारियों से डरते हैं और उन्हें आतंकवादी घोषित करवाने में लगे हुए हैं। कांगेस को इसमे काफी सफलता मिल चुकी है जब उस ने बाकायदा पाठ्यक्रम में ये छपवा दिया की नाथूराम गोडसे ने गांधी को मारा । पर क्यों ?

ये कभी किसी ने नहीं बताया आपको । नाथूराम गोडसे की अस्थियाँ आज भी विसर्जित नहीं की गयी हैं उनकी देशभक्ति भरी अंतिम इच्छा के कारण … नीचे फोटो में जानिए क्या थी उनकी अंतिम इच्छा ..?

नाथूराम गोडसे जयंती पर पढ़िए … मैंने गाँधी को क्यों मारा ” ? नाथूराम गोडसे का अंतिम बयान {इसे सुनकर अदालत में उपस्थित सभी लोगो की आँखे गीली हो गई थी और कई तो रोने लगे थे एक जज महोदय ने अपनी टिपणी में लिखा था की यदि उस समय अदालत में उपस्तित लोगो को जूरी बनाया जाता और उनसे फेसला देने को कहा जाता तो निसंदेह वे प्रचंड बहुमत से नाथूराम के निर्दोष होने का निर्देश देते } नाथूराम जी ने कोर्ट में कहा –सम्मान ,कर्तव्य और अपने देश वासियों के प्रति प्यार कभी कभी भी हमे अहिंसा के सिद्धांत से हटने के लिए बाध्य कर देता है. मैं कभी यह नहीं मान सकता की किसी आक्रामक का शसस्त्र प्रतिरोध करना कभी गलत या अन्याय पूर्ण भी हो सकता है।

प्रतिरोध करने और यदि संभव हो तो ऐसे शत्रु को बलपूर्वक वश में करने, में एक धार्मिक और नैतिक कर्तव्य मानता हूँ। तत्कालीन नेता सत्ता के लोभ में अपनी मनमानी कर रहे थे। या तो कांग्रेस, धर्म के आधार पर देश का बँटवारा कर पकिस्तान बनाने की मांग करने वालों की इच्छा के सामने आत्मसर्पण कर दे और उनकी सनक, मनमानी और आदिम रवैये के स्वर में स्वर मिलाये अथवा उनके बिना काम चलाये .वे अकेले ही प्रत्येक वस्तु और व्यक्ति के निर्णायक थे. महात्मा गाँधी अपने लिए जूरी और जज दोनों थे। गाँधी ने नेहरू और जिन्नाह जैसे देश बांटने वाले सत्ता के लोभियों की लालसा को तृप्त करने के लिए अपनी मातृभूमि के साथ विश्वासघात किया.

तत्कालीन नेता अपनी देश भक्ति और समाज वाद का दम भरा करते थे। जिन्नाह और नेहरू ने गुप्त रूप से बन्दुक की नोक पर धर्म के आधार पर मातृभूमी का बंटवारा कर अलग पकिस्तान बनाने की मांग को स्वीकार कर लिया । और इस प्रकार महात्मा ने अपनी देशभक्ति का नेहरू और जिन्नाह के सामने नीचता से आत्मसमर्पण कर दिया .

धार्मिक तुष्टिकरण की निति के कारण भारत माता के टुकड़े कर दिए गए और 15 अगस्त 1947 के बाद देश का एक तिहाई भाग हमारे लिए ही विदेशी भूमि बन गई.

नेहरू तथा उनकी भीड़ की स्वीकृति के साथ ही एक धर्म के आधार पर राज्य बना दिया गया .इसी को वे बलिदानों द्वारा जीती गई सवंत्रता कहते है परंतु किसका बलिदान ? जब कांग्रेस के शीर्ष नेताओ ने गाँधी के सहमती से इस देश को काट डाला, जिसे हम पूजा की वस्तु मानते है, और गांधी जी ने इस देशद्रोह पर शांत रहकर, विरोध नहीं किया तो मेरा मस्तिष्क भयंकर क्रोध से भर गया।

मैं साहस पूर्वक कहता हु की गाँधी अपने कर्तव्य में असफल हो गए ।

मैं कहता हूँ की मेरी गोलियां एक ऐसे व्यक्ति पर चलाई गई थी ,जिसकी नीतियों और कार्यो से करोड़ों देशवासियों को केवल बर्बादी और विनाश ही मिला । इस वक्त देश में ऐसी कोई क़ानूनी प्रक्रिया नहीं थी जिसके द्वारा मातृभूमी के इस अपराधी को सजा दिलाई जा सके इसलिये मैंने इस घातक रास्ते का अनुसरण किया…………..मैं अपने लिए माफ़ी की गुजारिश नहीं करूँगा ,जो मेने किया उस पर मुझे गर्व है . मुझे कोई संदेह नहीं है की इतिहास के ईमानदार लेखक मेरे कार्य का वजन तोल कर भविष्य में किसी दिन इसका सही मूल्याकन करेंगे।

जब तक सिन्धु नदी भारत के ध्वज के नीछे से ना बहे तब तक मेरी अस्थियों को विसर्जित मत करना। शायद सच ही कहा था गोडसे ने ।

गांधी हो, नेहरू हो, या जिन्नाह हो…. या कोई भी बड़ा नेता हो परंतु मातृभूमी के बंटवारे कराने का हक़ किसी महात्मा को नहीं है । इसलिए गोडसे से यह दर्द नहीं सहा गया कि उनके आराध्य गांधी ने चुप रहकर इस कुकर्म का विरोध क्यों नहीं किया । और इसलिए आज तक नाथूराम गोडसे की अस्थियां विसर्जित नहीं की गयी । निःसंदेह महात्मा गांधी ने देश के लिए बहुत कुछ किया है । परंतु देश का बँटवारा भी वो रोक सकते थे ।

पर उनकी चुप्पी ने बटवारे की आग में घी डालने का काम किया । गोडसे सही थे या गलत ये फैसला हम आपके विवेक पर छोड़ते हैं । किन्तु एक बात आप भी मानेंगी की अन्याय पर आँख मूंदकर गलत काम को बढ़ावा देना भी एक गुनाह है, जो उस वक्त महात्मा गांधी ने किया ।

Srishtanews

Bapujis Great Grand Son writes to Rahul 'Duplicate'Gandhi

Open letter by Mahatma Gandhi’s Great Grandson to Rahul Gandhi

Mahatma Gandhi’s great grandson Shrikrishna Kulkarni’s open letter to Rahul Gandhi in response to the Congress VP saying the RSS had killed Gandhi… 232 more words

News

60 साल तक भारत में प्रतिबंधित रहा नाथूराम का अंतिम भाषण “मैंने गांधी को क्यों मारा”

Why????

60 साल तक भारत में प्रतिबंधित रहा नाथूराम का अंतिम भाषण “मैंने गांधी को क्यों मारा”

1948 को नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी लेकिन नाथूराम गोड़से घटना स्थल से फरार नही हुआ बल्कि उसने आत्मसमर्पण कर दिया | नाथूराम गोड़से समेत 17 अभियुक्तों पर गांधी जी की हत्या का मुकदमा चलाया गया | इस मुकदमे की सुनवाई के दरम्यान न्यायमूर्ति खोसला से नाथूराम ने अपना वक्तव्य स्वयं पढ़ कर जनता को सुनाने की अनुमति माँगी थी जिसे न्यायमूर्ति ने स्वीकार कर लिया था | हालाँकि सरकार ने नाथूराम के इस वक्तव्य पर प्रतिबन्ध लगा दिया था लेकिन नाथूराम के छोटे भाई और गांधी जी की हत्या के सह-अभियोगी गोपाल गोड़से ने 60 साल की लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट में विजय प्राप्त की और नाथूराम का वक्तव्य प्रकाशित किया गया | नाथूराम गोड़से ने गांधी हत्या के पक्ष में अपनी 150 दलीलें न्यायलय के समक्ष प्रस्तुति की | देसी लुटियंस पेश करते है “नाथूराम गोड़से के वक्तव्य के मुख्य अंश” 20 more words

Government Of India

पाकिस्तान को धनराशि देना गाँधी की हत्या का कारण नहीं. इससे पहले भी हो चुके थे उनकी हत्या के पांच प्रयास – रुक्मिणी सेन

16 मार्च को हंसल मेहता, तुषार गाँधी और कुमार केतकर एक साथ तीस्ता सीतलवाड़ की किताब  “ संदेह से परे – गाँधी की हत्या के दस्तावेज: संकलन एवं प्राक्कथन ” के अनावरण के लिए एक मंच पर साथ साथ देखे गए।

तीस्ता सीतलवाड़ ने अतिथियों और पत्रकारों को संक्षिप्त संबोधन में कहा :

“गाँधी की हत्या कोई स्वतः स्फूर्त घटना नहीं थी बल्कि उससे पहले भी उनकी हत्या के पांच प्रयास किये जा चुके थे। इनमें से दो में तो गोडसे खुद शामिल था। गाँधी का अस्पृश्यता विरोधी नजरिया और एकजुट राष्ट्र का संकल्प उनके प्रति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की घृणा का मुख्य कारण था।“

संघ के परिचित अंदाज़ में गोडसे का यह दावा सरासर झूठ था कि उसने गाँधी जी की हत्या इसलिए की थी क्योंकि वह देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार थे और उनके चलते पाकिस्तान को 55 करोड़ की राशि हस्तांतरित की गयी थी। तीस्ता सीतलवाड़ अपने संकलन के परिचय में लिखती हैं, “गाँधी जी की हत्या का प्रयास पहली बार सन 1934 में ही किया गया था जब उन्होंने राष्ट्रीयता, जाति, अर्थव्यवस्था और लोकतान्त्रिक अधिकारों की उस समय की प्रचलित अवधारणाओं के विरोध में आवाज उठाई थी, जो संघ के हिन्दू राष्ट्र की तानाशाही सोच को  सीधे-सीधे चुनौती थी। 1933 में, गाँधी जी की हत्या के पहले प्रयास के ठीक एक  साल पहले, गाँधी जी ने अस्पृश्यता जैसी वीभत्स प्रथा के खिलाफ बिल का मुखर समर्थन किया था, जिसका जिक्र संघ ने अपने मिथ्या प्रचार में कभी नहीं किया।”

तीस्ता सीतलवाड़ अपनी किताब के परिचय में आगे लिखती हैं, “स्वतंत्रता आन्दोलन और देश के बंटवारे का इतिहास राष्ट्रीयता के सिद्धांत की दो मुख्तलिफ़ विचारधाराओं के द्वन्द का भी इतिहास है। जहाँ लगभग सौ सालों से अधिक समय तक सभी भारतीयों ने विदेशी शासन और ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होकर संघर्ष किया वहीँ बीसवीं सदी की शुरुआत से लेकर इसके मध्य तक ऐसी शक्तियों का जन्म हुआ जो हिंदुस्तान और पाकिस्तान राष्ट्रीयता के संकीर्ण और सांप्रदायिक सिद्धान्तो पर आधारित था। हिदू महासभा, मुस्लिम लीग और आरएसएस, जिन्होंने किसी न किसी समय अंग्रेजो के साथ गठबंधन किया, के जन्म के साथ ही आन्दोलन की उस धारा का जन्म हुआ, जो वृहत् राष्ट्रीय आन्दोलन के विरोध में थी। यह किताब उन महत्वपूर्ण संदर्भो का भी उल्लेख करती है, जहां यह दक्षिणपंथी आन्दोलन साम्राज्यवादी राज्य के साथ गठबंधन में दिखतें हैं। गाँधी के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा के समानान्तर, 1930 की शुरुआत से जाति और जनता के वृहत आर्थिक अधिकारों पर राष्ट्रीय नेतृत्व की स्पष्ट विचारधारा भी सामने आने लगी। सन 1933 की शुरुआत से ही “धर्मनिरपेक्ष” शब्द के उल्लेख गाँधी जी के लेखो और भाषणों में बार बार आता है”

गाँधी जी की जिंदगी पर हुए हमलों की शुरुआत को समझने के इस समय के राजनैतिक सन्दर्भ को व्यापक रूप में समझना बहुत महत्वपूर्ण है जो इन हमलों के पीछे थे। जैसा कि पहले भी जिक्र किया गया है कि इस समय दो प्रस्तावित कानून, जिनमें से एक अस्पृश्यता पर था, केंद्र के सामने थे। गाँधी की भर्त्सना  करने वाले इस विषय पर गाँधी की बहुत आलोचना करते है कि उन्होंने जाति के  प्रश्न पर समझौता किया लेकिन गाँधी इस बात पर बहुत स्पष्ट थे कि ऐसी प्रथा, जो मानवीय मूल्यों के विरुद्ध है, का एक धर्मनिरपेक्ष कानून द्वारा जड़ से खात्मा होना चाहिए। नवम्बर 1933 में गाँधी ने  इस कानून के खिलाफ लगाये जा रहे उन आरोपों का विरोध किया जो कह रहे थे कि यह कानून लोगों के धार्मिक मामलों में अवांछित हस्तक्षेप है। गाँधी जी ने कहा कई बार ऐसी परिस्थितयां होती हैं जहां राज्य को धार्मिक मामलो में दखलंदाजी करनी पड़ती है, हालांकि राज्य को अवांछित हस्तक्षेप से बचना चाहिए। इस कानून के समर्थन में केंद्रीय विधायिका में दिये गए भाषण के एक साल बाद उनकी जिन्दगी पर पहला हमला हुआ। उस समय देश के बंटवारे या पकिस्तान को 55 करोड़ दिए जाने का कोई मसला ही नहीं था। यह एक तथ्य है कि गाँधी जी एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के प्रखर समर्थक थे और धर्म के नाम पर किसी भी तरह के भेदभाव के विरुद्ध थे, इस बात ने इन्हें हिन्दू तानाशाही ताकतों के बीच काफी अलोकप्रिय बना दिया था“

 

गाँधी और अम्बेडकर के मतभेदों के बारे तीस्ता सीतलवाड़ के विचार :

 “सन 1925 में गाँधी जी ने व्य्कोम आन्दोलन, तथाकथित “अस्पृश्य” लोगों के व्यम्कोम मदिर के आसपास की सडकों पर प्रवेश पर प्रतिबन्ध के विरोध में  त्रावणकोर( आज का केरल) के स्थानीय नेताओं द्वारा चलाए गए आन्दोलन का पूर्ण समर्थन किया। गाँधी जी ने यंग इंडिया के माध्यम से इस आन्दोलन के सन्देश को पूरे देश में पहुँचाया, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय मीडिया ने इस मुद्दे को उठाया। मार्च 1925 में गाँधी जी स्वयं व्यकोम गए और न केवल इस आन्दोलन के समर्थन में जनसभा को संबोधित किया बल्कि साथ ही उन कट्टरपंथी नेताओं से बातचीत भी की, जो इस आन्दोलन का विरोध कर रहे थे। अंततः जनवरी 1926  में त्रावणकोर सरकार को सत्याग्रहियों के सामने झुकना पड़ा और व्यकोम मंदिर के आसपास की सडकें “अस्पृश्य“ लोगों के लिए खोल दी गयी। गाँधी जी ने इस मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए मांग रखी की सभी सार्वजनिक जगहें , जिसमे मंदिर भी शामिल हों, सभी लोगों के प्रवेश के लिए खुलें हों। इसके कुछ साल बाद, 20 सितबर 1962  में, इन्होने “कम्युनल अवार्ड “ कानून को क्रियान्वयित करने के लिए आमरण अनशन किया। इसके बाद ही पूना या  येरवाडा समझौता अस्तित्व में आया, जो अस्पृश्यता के खिलाफ आन्दोलन के लिए एक बड़ा प्रेरणास्रोत बना.”

“इस विषय पर गाँधी और अम्बेडकर के बीच मतभेदों का काफी विस्तार से प्रलेखन और विश्लेषण हुआ है। अम्बेडकर द्वारा अखिल भारतीय अस्पृश्यता लीग (जो बाद में हरिजन सेवक संघ के नाम से जाना गया) की आलोचना निसंदेह सटीक, बेहद प्रोग्रेसिव और प्रेरणादायक आलोचना थी । उनका मानना था कि लीग के लक्ष्य और सिद्धांत व्यक्तिवादी और सुधारवादी थे और यह दलितों की राजनैतिकक और सामाजिक मुक्ति के लिए नहीं बने थे। इस विषय पर इनके मतभेद विभिन्न उल्लेखों के अलावा इन महान नेताओं के बीच हुए पत्राचार में भी देखे जा सकते हैं। सन 1933 में केंदीय विधायिका के समक्ष पेश किये गए दोनों बिलों पर भी काफी बहस हुई और दोनों एक दूसरे से सहमत नहीं थे। फिर भी इस बात को मानना होगा कि चाहे गाँधी जी की नैतिक ताकत का स्त्रोत उनका धर्म था लेकिन वह इसमें मूलभूत बदलाव के समर्थक थे और इसमें निहित संरचनात्मक जातिगत गैरबराबरी में बदलाव चाहते थे, जो उन ताकतों के लिए खतरा थी जो हिदू धर्म के नाम पर कठमुल्लावाद को बढ़ावा देना चाहते थे।”

वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब एक संगठन  मात्र नहीं, एक विचारधारा है जो समाज के हर वर्ग और हर राजनैतिक पार्टी में व्याप्त है। केतकर आगे कहते हैं कि मोदी की इस जीत में दस प्रतिशत कारक तो वह प्रचार है जो तथाकथित विकास के मुद्दे पर किया गया लेकिन बड़ा कारण सन 2000 गुजरात में हुए दंगे हैं। वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार संघ, बंगाल में भी घुसपैठ करने में सफल हुआ है। अगले चुनावों में चाहे यह सबसे महत्वपूर्ण दल के रूप में न आये लेकिन दूसरे बड़े दल के रूप में उभर सकता है।

महात्मा गाँधी के पोते  तुषार गाँधी  ने तीस्ता सीतलवाड़ ने किताब की तरफ इंगित करते हुए कहा कि “यह किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कपूर कमीशन की रिपोर्ट भी शामिल है। कपूर कमीशन रिपोर्ट में ऐसे कई ऐसे साक्ष्य शामिल हैं जो उस क्रम को उजागर करते हैं, जिनकी परिणिति गाँधी की हत्या में हुई और यह साक्ष्य उस समय उपलब्ध नहीं थे, जब उनकी हत्या का केस चल रहा था”।

1960 में जब गाँधी की हत्या के कुछ दोषी जब अपनी सजा काट कर जेल से बाहर आये, तब उन्होंने उस साजिश के बारे में खुल के बोलना शुरू किया जिसका अंजाम गाँधी की हत्या के तौर पर हुआ। इसी के बाद केन्द्र सरकार ने इस साजिश के अन्य पहलुओं को जांचने के लिए कपूर कमीशन का गठन किया।

सिटी लाइट्स और शाहिद के निर्देशक और साथ ही आज के समय में घृणा पर आधारित प्रचार के बारीक़ अवलोकक हंसल मेहता ने धर्मनिरपेक्षता पर तीस्ता सीतलवाड़ की किताब का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि हिंदुत्ववादी ताक़तों द्वारा जिस मनगढ़ंत का इतिहास का निर्माण कर किया जा रहा है वह हिन्दुस्तान को नेस्तनाबूद कर देगा।

गाँधी की हत्या की साजिश विषय पर आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत कामरेड पानेसर और गाँधी वादी नेता नारायण भाई देसाई को याद  करने के साथ हुई और इसके बाद प्रसिद्ध सूफी गायक रागिनी रेणु ने “वैष्णव जन तो तेने कहिये ’’ का खूबसूरत गायन किया.

इस किताब के प्राक्कथन में तीस्ता सीतलवाड़ लिखती हैं –

तीस  जनवरी 1948 को गाँधी जी की हत्या मात्र एक दुर्घटना नहीं थी बल्कि कट्टरपंथी ताकतों के आशय की अभियक्ति और जंग का एलन था। जिन ताक़तों ने गाँधी की हत्या की साजिश रची थी वह लोग धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक भारत के खिलाफ एक जंग का एलान करना चाहते थे और उन लोगों के खिलाफ भी जो इन मूल्यों का समर्थन करते हैं। साथ ही यह घोषणा थी उस मंशा की भी जो हिन्दुस्तान को हिन्दू राष्ट्र के रूप में देखना चाहती थी। यह कृत्य उन मूल्यों पर हमले का संकेत था, जिनके लिए भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन ने साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। यह किताब उन महतवपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों का संकलन है, जो उस राजनीति, परिस्थितियों और कारणों को उचित सन्दर्भ में देखने में मदद करतें हैं। गाँधी की हत्यां को न्योयोचित ठहराने और उनके हत्यारों को शहीद के तौर पर महिमामंडित करने के प्रयास मई 2014 में नई सरकार के केंद्र में आने के बाद अचानक बढ़ गए हैं। इसलिए जरूरी हो जाता है कि इससे सम्बंधित परिस्थितयों और संदर्भो को सही-सही अवाम के सामने रखा जाये।

गाँधी के सिद्धांतो , मूल्यों और उनके खिलाफ फैलाई जा रही असंगत घृणा और मिथ्याप्रचार को अगर  समझना है, तो उस नृशंस कृत्य की राजनैतिक प्रकृति को समझना होगा। यह किताब एक प्रयास है उनकी हत्या के घटनाक्रम तथा उसके बाद के तमाम सरकारी दस्तावेजो को संकलित रूप में एक साथ पेश करने का। साथ ही गुजराती, मराठी और हिंदी में दस्तावेजो का अनुवाद उस विचारधारा को बारीकी से समझाने में मदद करता है, जो इस हत्या के लिए जिम्मेदार थी। हालाँकि उनकी हत्या से  सम्बन्धित कई दस्तावेज ‘कम्युनल कॉम्बैट’ के कई अंको में आ चुके हैं पर यह संकलन इस  विषय में नई सामग्री प्रस्तुत करता है। पहली बार “महात्मयाचे आखेर“ का प्रथम अंग्रेजी अनुवाद इस किताब का हिस्सा है। साथ ही वाई डी फाड़के द्वारा इस हत्या को न्यायोचित ठहराने के प्रयासों का विश्लेषण और गोडसे पर लिखे प्रदीप दलवी के नाटक का विश्लेषण भी इस किताब का हिस्सा है। इस किताब में हाल ही में भारत सरकार द्वारा  गाँधी की हत्या से जुड़े दस्तावेजो को नष्ट करने से उठे विवादों पर भी नज़र डाली गयी है।

Hillele.org

Straight-Jacket Sakshi Maharaj and drop him into the Arabian Sea!

Why do we even tolerate such mindless people? Perhaps, the voters of Unnao should realise that they cannot continue to make the mistake of electing someone like Sakshi Maharaj, again. 19 more words

पाकिस्तान को धनराशि देना गाँधी की हत्या का कारण नहीं...इससे पहले भी हो चुके थे उनकी हत्या के पांच प्रयास – रुक्मिणी सेन

16 मार्च को हंसल मेहता, तुषार गाँधी और कुमार केतकर एक साथ तीस्ता सीतलवाड़ की किताब “संदेह से परे – गाँधी की हत्या के दस्तावेज: संकलन एवं प्राक्कथन” के अनावरण के लिए एक मंच पर साथ साथ देखे गए।

तीस्ता सीतलवाड़ ने अतिथियों और पत्रकारों को संक्षिप्त संबोधन में कहा :

“गाँधी की हत्या कोई स्वतःस्फूर्त घटना नहीं थी बल्कि उससे पहले भी उनकी हत्या के पांच प्रयास किये जा चुके थे। इनमें से दो में तो गोडसे खुद शामिल था। गाँधी का अस्पृश्यता विरोधी नजरिया और एकजुट राष्ट्र का संकल्प उनके प्रति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की घृणा का मुख्य कारण था।“

संघ के टिर-परिचित अंदाज़ में गोडसे का यह दावा सरासर झूठ था कि उसने गाँधी जी की हत्या इसलिए की थी क्योंकि वह देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार थे और उनके चलते पाकिस्तान को 55 करोड़ की राशि हस्तांतरित की गयी थी। तीस्ता सीतलवाड़ अपने संकलन के परिचय में लिखती हैं, “गाँधी जी की हत्या का प्रयास पहली बार सन 1934 में ही किया गया था जब उन्होंने राष्ट्रीयता, जाति, अर्थव्यवस्था और लोकतान्त्रिक अधिकारों की उस समय की प्रचलित अवधारणाओं के विरोध में आवाज उठाई थी, जो संघ के हिन्दू राष्ट्र की तानाशाही सोच को  सीधे-सीधे चुनौती थी। 1933 में, गाँधी जी की हत्या के पहले प्रयास के ठीक एक  साल पहले, गाँधी जी ने अस्पृश्यता जैसी वीभत्स प्रथा के खिलाफ बिल का मुखर समर्थन किया था, जिसका जिक्र संघ ने अपने मिथ्या प्रचार में कभी नहीं किया।”

तीस्ता सीतलवाड़ अपनी किताब के परिचय में आगे लिखती हैं, “स्वतंत्रता आन्दोलन और देश के बंटवारे का इतिहास राष्ट्रीयता के सिद्धांत की दो मुख्तलिफ़ विचारधाराओं के द्वन्द का भी इतिहास है। जहाँ लगभग सौ सालों से अधिक समय तक सभी भारतीयों ने विदेशी शासन और ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होकर संघर्ष किया वहीँ बीसवीं सदी की शुरुआत से लेकर इसके मध्य तक ऐसी शक्तियों का जन्म हुआ जो हिंदुस्तान और पाकिस्तान राष्ट्रीयता के संकीर्ण और सांप्रदायिक सिद्धान्तो पर आधारित था। हिदू महासभा, मुस्लिम लीग और आरएसएस, जिन्होंने किसी न किसी समय अंग्रेजो के साथ गठबंधन किया, के जन्म के साथ ही आन्दोलन की उस धारा का जन्म हुआ, जो वृहत् राष्ट्रीय आन्दोलन के विरोध में थी। यह किताब उन महत्वपूर्ण संदर्भो का भी उल्लेख करती है, जहां यह दक्षिणपंथी आन्दोलन साम्राज्यवादी राज्य के साथ गठबंधन में दिखतें हैं। गाँधी के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा के समानान्तर, 1930 की शुरुआत से जाति और जनता के वृहत आर्थिक अधिकारों पर राष्ट्रीय नेतृत्व की स्पष्ट विचारधारा भी सामने आने लगी। सन 1933 की शुरुआत से ही “धर्मनिरपेक्ष” शब्द के उल्लेख गाँधी जी के लेखो और भाषणों में बार बार आता है”

गाँधी जी की जिंदगी पर हुए हमलों की शुरुआत को समझने के इस समय के राजनैतिक सन्दर्भ को व्यापक रूप में समझना बहुत महत्वपूर्ण है जो इन हमलों के पीछे थे। जैसा कि पहले भी जिक्र किया गया है कि इस समय दो प्रस्तावित कानून, जिनमें से एक अस्पृश्यता पर था, केंद्र के सामने थे। गाँधी की भर्त्सना  करने वाले इस विषय पर गाँधी की बहुत आलोचना करते है कि उन्होंने जाति के  प्रश्न पर समझौता किया लेकिन गाँधी इस बात पर बहुत स्पष्ट थे कि ऐसी प्रथा, जो मानवीय मूल्यों के विरुद्ध है, का एक धर्मनिरपेक्ष कानून द्वारा जड़ से खात्मा होना चाहिए। नवम्बर 1933 में गाँधी ने  इस कानून के खिलाफ लगाये जा रहे उन आरोपों का विरोध किया जो कह रहे थे कि यह कानून लोगों के धार्मिक मामलों में अवांछित हस्तक्षेप है। गाँधी जी ने कहा कई बार ऐसी परिस्थितयां होती हैं जहां राज्य को धार्मिक मामलो में दखलंदाजी करनी पड़ती है, हालांकि राज्य को अवांछित हस्तक्षेप से बचना चाहिए। इस कानून के समर्थन में केंद्रीय विधायिका में दिये गए भाषण के एक साल बाद उनकी जिन्दगी पर पहला हमला हुआ। उस समय देश के बंटवारे या पकिस्तान को 55 करोड़ दिए जाने का कोई मसला ही नहीं था। यह एक तथ्य है कि गाँधी जी एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के प्रखर समर्थक थे और धर्म के नाम पर किसी भी तरह के भेदभाव के विरुद्ध थे, इस बात ने इन्हें हिन्दू तानाशाही ताकतों के बीच काफी अलोकप्रिय बना दिया था“

 

गाँधी और अम्बेडकर के मतभेदों के बारे तीस्ता सीतलवाड़ के विचार :

 

सन 1925 में गाँधी जी ने व्य्कोम आन्दोलन, तथाकथित “अस्पृश्य” लोगों के व्यम्कोम मदिर के आसपास की सडकों पर प्रवेश पर प्रतिबन्ध के विरोध में  त्रावणकोर( आज का केरल) के स्थानीय नेताओं द्वारा चलाए गए आन्दोलन का पूर्ण समर्थन किया। गाँधी जी ने यंग इंडिया के माध्यम से इस आन्दोलन के सन्देश को पूरे देश में पहुँचाया, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय मीडिया ने इस मुद्दे को उठाया। मार्च 1925 में गाँधी जी स्वयं व्यकोम गए और न केवल इस आन्दोलन के समर्थन में जनसभा को संबोधित किया बल्कि साथ ही उन कट्टरपंथी नेताओं से बातचीत भी की, जो इस आन्दोलन का विरोध कर रहे थे। अंततः जनवरी 1926  में त्रावणकोर सरकार को सत्याग्रहियों के सामने झुकना पड़ा और व्यकोम मंदिर के आसपास की सडकें “अस्पृश्य“ लोगों के लिए खोल दी गयी। गाँधी जी ने इस मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए मांग रखी की सभी सार्वजनिक जगहें , जिसमे मंदिर भी शामिल हों, सभी लोगों के प्रवेश के लिए खुलें हों। इसके कुछ साल बाद, 20 सितबर 1962  में, इन्होने “कम्युनल अवार्ड “ कानून को क्रियान्वयित करने के लिए आमरण अनशन किया। इसके बाद ही पूना या  येरवाडा समझौता अस्तित्व में आया, जो अस्पृश्यता के खिलाफ आन्दोलन के लिए एक बड़ा प्रेरणास्रोत बना.

इस विषय पर गाँधी और अम्बेडकर के बीच मतभेदों का काफी विस्तार से प्रलेखन और विश्लेषण हुआ है। अम्बेडकर द्वारा अखिल भारतीय अस्पृश्यता लीग (जो बाद में हरिजन सेवक संघ के नाम से जाना गया) की आलोचना निसंदेह सटीक, बेहद प्रोग्रेसिव और प्रेरणादायक आलोचना थी । उनका मानना था कि लीग के लक्ष्य और सिद्धांत व्यक्तिवादी और सुधारवादी थे और यह दलितों की राजनैतिकक और सामाजिक मुक्ति के लिए नहीं बने थे। इस विषय पर इनके मतभेद विभिन्न उल्लेखों के अलावा इन महान नेताओं के बीच हुए पत्राचार में भी देखे जा सकते हैं। सन 1933 में केंदीय विधायिका के समक्ष पेश किये गए दोनों बिलों पर भी काफी बहस हुई और दोनों एक दूसरे से सहमत नहीं थे। फिर भी इस बात को मानना होगा कि चाहे गाँधी जी की नैतिक ताकत का स्त्रोत उनका धर्म था लेकिन वह इसमें मूलभूत बदलाव के समर्थक थे और इसमें निहित संरचनात्मक जातिगत गैरबराबरी में बदलाव चाहते थे, जो उन ताकतों के लिए खतरा थी जो हिदू धर्म के नाम पर कठमुल्लावाद को बढ़ावा देना चाहते थे।

वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब एक संगठन  मात्र नहीं, एक विचारधारा है जो समाज के हर वर्ग और हर राजनैतिक पार्टी में व्याप्त है। केतकर आगे कहते हैं कि मोदी की इस जीत में दस प्रतिशत कारक तो वह प्रचार है जो तथाकथित विकास के मुद्दे पर किया गया लेकिन बड़ा कारण सन 2000 गुजरात में हुए दंगे हैं। वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार संघ, बंगाल में भी घुसपैठ करने में सफल हुआ है। अगले चुनावों में चाहे यह सबसे महत्वपूर्ण दल के रूप में न आये लेकिन दूसरे बड़े दल के रूप में उभर सकता है।

महात्मा गाँधी के पोते  तुषार गाँधी  ने तीस्ता सीतलवाड़ ने किताब की तरफ इंगित करते हुए कहा कि “यह किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कपूर कमीशन की रिपोर्ट भी शामिल है। कपूर कमीशन रिपोर्ट में ऐसे कई ऐसे साक्ष्य शामिल हैं जो उस क्रम को उजागर करते हैं, जिनकी परिणिति गाँधी की हत्या में हुई और यह साक्ष्य उस समय उपलब्ध नहीं थे, जब उनकी हत्या का केस चल रहा था”।

1960 में जब गाँधी की हत्या के कुछ दोषी जब अपनी सजा काट कर जेल से बाहर आये, तब उन्होंने उस साजिश के बारे में खुल के बोलना शुरू किया जिसका अंजाम गाँधी की हत्या के तौर पर हुआ। इसी के बाद केन्द्र सरकार ने इस साजिश के अन्य पहलुओं को जांचने के लिए कपूर कमीशन का गठन किया।

सिटी लाइट्स और शाहिद के निर्देशक और साथ ही आज के समय में घृणा पर आधारित प्रचार के बारीक़ अवलोकक हंसल मेहता ने धर्मनिरपेक्षता पर तीस्ता सीतलवाड़ की किताब का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि हिंदुत्ववादी ताक़तों द्वारा जिस मनगढ़ंत का इतिहास का निर्माण कर किया जा रहा है वह हिन्दुस्तान को नेस्तनाबूद कर देगा।

गाँधी की हत्या की साजिश विषय पर आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत कामरेड पानेसर और गाँधी वादी नेता नारायण भाई देसाई को याद  करने के साथ हुई और इसके बाद प्रसिद्ध सूफी गायक रागिनी रेणु ने “वैष्णव जन तो तेने कहिये ’’ का खूबसूरत गायन किया.

इस किताब के प्राक्कथन में तीस्ता सीतलवाड़ लिखती हैं –

तीस  जनवरी 1948 को गाँधी जी की हत्या मात्र एक दुर्घटना नहीं थी बल्कि कट्टरपंथी ताकतों के आशय की अभियक्ति और जंग का एलन था। जिन ताक़तों ने गाँधी की हत्या की साजिश रची थी वह लोग धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक भारत के खिलाफ एक जंग का एलान करना चाहते थे और उन लोगों के खिलाफ भी जो इन मूल्यों का समर्थन करते हैं। साथ ही यह घोषणा थी उस मंशा की भी जो हिन्दुस्तान को हिन्दू राष्ट्र के रूप में देखना चाहती थी। यह कृत्य उन मूल्यों पर हमले का संकेत था, जिनके लिए भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन ने साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। यह किताब उन महतवपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों का संकलन है, जो उस राजनीति, परिस्थितियों और कारणों को उचित सन्दर्भ में देखने में मदद करतें हैं। गाँधी की हत्यां को न्योयोचित ठहराने और उनके हत्यारों को शहीद के तौर पर महिमामंडित करने के प्रयास मई 2014 में नई सरकार के केंद्र में आने के बाद अचानक बढ़ गए हैं। इसलिए जरूरी हो जाता है कि इससे सम्बंधित परिस्थितयों और संदर्भो को सही-सही अवाम के सामने रखा जाये।

गाँधी के सिद्धांतो , मूल्यों और उनके खिलाफ फैलाई जा रही असंगत घृणा और मिथ्याप्रचार को अगर  समझना है, तो उस नृशंस कृत्य की राजनैतिक प्रकृति को समझना होगा। यह किताब एक प्रयास है उनकी हत्या के घटनाक्रम तथा उसके बाद के तमाम सरकारी दस्तावेजो को संकलित रूप में एक साथ पेश करने का। साथ ही गुजराती, मराठी और हिंदी में दस्तावेजो का अनुवाद उस विचारधारा

Hilleletv

*Vaishnava Janato: Gandhi and Narsi Mehta's Conception of the Ideal Person

Vaishnava janato

A recent trip to Porbandar and Rajkot, where Gandhi spent his adolescent years, set me thinking yet once again about his religiosity.  Much like nearly everything else in his life, Gandhi’s religion defies easy description. 1,277 more words

The Politics Of Indian Culture