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WIRED Endorses Optimism

WIRED has never ever been neutral.

For almost a quarter of a century, this company has actually promoted a particular method of considering tomorrow. If its real, as the author William Gibson when had it, that the future is currently here, simply unevenly dispersed, then our job has actually been to find the locations where numerous futures break through to our present and determine which one we wish for. 2,096 more words

News

भारतीय मुसलमान: डर के साये में?

पूर्व उपराष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी के एक हालिया बयान से जिस प्रकार मीडिया ट्रायल हुआ और उसको राजनितिक मोड़ दिया गया वो गिरते वैचारिक मानसिकता और मुद्दों को संवेदनशील बनाकर राजनीति करने के नए तरीके का परिणाम है। हामिद अंसारी के कथन को समझने के लिए सिर्फ बीजेपी के इस तीन साल का ही विश्लेषण नहीं होना चाहिए वरना ये राजनितिक विश्लेषण होकर रह जाएगा। इसको समझने के लिए हमें कम से कम एक सदी और उसके बाद के मुसलमानो के हालत को नज़र में रखना होगा।

स्वतंत्रता संग्राम में हिंदुस्तानी मुसलमानो की भागीदारी और बलिदान को किसी के सनद की आवश्यकता नहीं। मुसलमानो ने अपनी आबादी और हिस्सेदारी से अधिक बढ़-चढ़ कर इस लड़ाई को लड़ा और जीता। लेकिन पाकिस्तान के बंटवारे ने जिस प्रकार भारतीय मुसलमानो को मानसिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक रूप से तोड़ा उससे हम दशकों निकल नहीं पाये। शिक्षित, आर्थिक रूप से संपन्न, सरकारी नौकरियों के बड़े ओहदेदार भारत छोड़कर एक नए देश में अपना सुख तलाशने जा चुके थे। बचा था दबा, कुचला , पिछड़ा और अशिक्षित मुसलमान जिसको अपने पुरखों की विरासत को छोड़ना किसी हाल में गवारा नहीं था।

पकिस्तान बनने की आत्मग्लानि, जातीय राजनीति के बढ़ते ज़ोर में बिना नेतृत्व के खौफ के माहौल से मुसलमानो को उबरने में एक लंबा समय लगा। जब उबरने लगे तो पाकिस्तान की भाँती ‘धर्मांधता’ की राजनीति भारत में भी शुरू हो चुकी थी। हमें इस बात को महसूस करना होगा की पाकिस्तान में बचे अल्पसंख्यक भी इसी पीड़ा से गुज़रे होंगे। फ़र्क़ इतना ज़रूर है की भारतीय मुसलमानो के अधिकार की बड़ी बड़ी लड़ाई यहाँ के बहुसंख्यक समाज ने लड़ा और आज भी वो लड़ते हैं।

मुझे हामिद अंसारी साहेब की बातों को समर्थन करने में कोई हिचक नहीं। आज भारतीय मुसलमान डर में है। वो पाकिस्तान बंटवारे के बाद भी डर में थे और आज भी डर के माहौल में जी रहे।

इन सब चीजों में जो एक चीज़ छूटी वो है मुसलमानो की समाज निर्माण में हिस्सेदारी की कमी। उसके कई कारण हैं जिसपर एक लंबी चर्चा की आवश्यकता है। 70 साल का अंतराल किसी समाज को सम्भलने और अपने हालात को सुधारने के लिए कम नहीं होता। आप सिर्फ दूसरों पर इलज़ाम लगाकर अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकते। मुसलमानो में शिक्षा के प्रति रुझान बढ़ा है। ज़रुरत है अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों के प्रति सोचने, इसपर निरंतर चर्चा कर एक दिशा देने की। मैं आओ सबको आमंत्रित करता हूँ इसपर एक बहस शुरू हो और मुख्यधारा से जुड़कर काम आगे बढे।

National Affairs

Identity Politics Come Home to Roost

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People will often fight to the death for their god if their god commands them to.  When the people become their own god, who can stay their hand? 3,710 more words

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Justice Department Commits Itself to Injustice by Thomas Martin Saturday

Jeffrey Beauregard Sessions III, Attorney General of the United States, is undertaking an initiative to systematically, over time, remove large numbers of people of color from heretofore diverse college campuses nationwide. 986 more words

National Affairs

A Share of Writing: Black Lives Matter

By Kerwin Holmes, Jr.

There are too many sneetches on these beaches.

I wrote this back in 2015 on March 21.  Yes, I’m still busy, but I have something being cooked up right now.   2,024 more words

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There is a big argument going on at the moment about whether the Federal Government is going to replace the current law on health insurance with something else.   1,408 more words

Life

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As we celebrate the 241st anniversary of the independence of the United States from Great Britain, a glorious birth of freedom for the world to copy, the Constitutional protection afforded by the First Amendment of a free press has never been, in modern times, under such assault. 1,113 more words

National Affairs