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Air Force veteran visits Disneyland 2,000 times in a row

(WTNH) — Some people do interesting things in their daily routines. Some go to the same restaurant, some go down the same highway and then there’s Jeff Reitz. 119 more words

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नीतीश ! ऐसी क्या है मजबूरी

नीतीश कुमार के बारे में तय है कि वे एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देने का अपना फैसला नहीं बदलेंगे। आरजेडी अध्यक्ष लालूप्रसाद यादव के घर आयोजित इफ्तार पार्टी में भाग लेने के बाद पत्रकारों के इस बारे में सवालों के जवाब में एक बार फिर उन्होने दृढ़ता से अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। नीतीश कुमार के फैसले के पीछे बिहार की जटिल राजनीतिक परिस्थितियां हैं। उनका फैसला जताता है कि सामाजिक न्याय और धर्म निरपेक्षता के नाम पर ब्लैकमेल होकर जनहित की बलि चढ़ाने की कोई तुक नहीं है।

1989 में जनता दल को जब बिहार में बहुमत हासिल हुआ तो मुख्यमंत्री की दौड़ में एक नाम लालू का भी था लेकिन उऩका नाम बहुत पीछे था। विश्वनाथ प्रताप सिंह उस समय प्रधानमंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे थे लेकिन वे ऐसे चक्रव्यूह में घिरे थे कि उनके लिए स्वतंत्र रूप से कोई फैसला करना आसान नहीं था। वीपी सिंह की इच्छा थी कि एक बड़े राज्य में मुख्यमंत्री के लिए ओबीसी के नेता का चुनाव हो चुका है, जो कि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह थे तो बिहार में दलित मुख्यमंत्री का चुनाव होना चाहिए, जिसके लिए उन्होंने रामसुंदर दास का नाम तय कर रखा था।

लेकिन जनता दल के ओबीसी नेताओं को सामाजिक न्याय के सिद्धांत की राजनीति से ज्यादा अपने एकछत्र वर्चस्व से सरोकार था, इसलिए पर्यवेक्षक बनकर बिहार पहुंचे मुलायम सिंह यादव ने शरद यादव के सहयोग से लालू का राजतिलक बिहार में करा दिया। मंडल और मंदिर के मुद्दे पर जनता दल के अंतःसंघर्ष में जब लालू से इस मेहरबानी की कीमत मुलायम सिंह ने वसूलनी चाही तो लालू ने यह मंजूर नहीं किया और उन्होंने एक सैद्धांतिक स्टैंड ले लिया, जिसकी वजह से वे वीपी सिंह के साथ खड़े रहे। यहां तक कि बाद में जब शरद यादव ने भी पाला बदल दिया, जो शुरुआत में उनके गॉडफादर की तरह थे, तो भी लालू ने वीपी सिंह का साथ नहीं छोड़ा। हालांकि आखिरी में व्यक्तिगत कारणों से उनके और वीपी सिंह के बीच दूरी हो गई थी, जिसके बाद उन्होंने वीपी सिंह के नाम की चर्चा भले ही बंद कर दी हो, लेकिन आलोचना आज तक नहीं की है।

इसी तरह लालू सोनिया गांधी से जुड़े तो आज तक उनके साथ हैं। कई बार उन्हें सोनिया से बेआबरू किए जाने का सिला मिला तो भी लालू ने उनके प्रति अपनी पक्षधरता नहीं बदली। दरअसल लालू राजनीति दिमाग से नहीं दिल से करते हैं। वीपी सिंह और सोनिया गांधी से वफादारी निभाने के पीछे सैद्धांतिक औचित्य रहा, जिसके लिए उन्होंने अपनों से भी बैर लेने में संकोच नहीं किया।

उनकी छवि प्रतिगामी शक्तियों से लड़ाई में अंत तक मजबूती से डटे रहने वाले नेता की है। बिहार में गत विधानसभा चुनाव में आरजेडी और जेडीयू गठबंधन को बहुमत दिलाने के पीछे उनके राजनैतिक मामलों में स्टैंड के प्रति मतदाताओं का समर्पण और आस्था मुख्य कारक रहा। प्रशांत किशोर में कोई जादूगरी होती तो लालू की पार्टी से ज्यादा सीटें जेडीयू को मिलतीं। यूपी के चुनाव में कांग्रेस को संजीवनी देने के प्रशांत किशोर के टोटके भी कोई काम नहीं आ सके। ऐसा नहीं है कि नीतीश में लालू के राजनैतिक साहस को लेकर कद्र न रही हो लेकिन लालू के बारे में ऊपर जो सच बताया गया वो अधूरा है। एक ओर इस अर्द्धसत्य के कारण बिहार से लेकर पूरे उत्तर भारत में सामाजिक न्याय का आकांक्षी तबका उनका कायल है, लेकिन लालू का दूसरा पक्ष बेहद विद्रूप है। मनमाने शासन, भ्रष्टाचार और परिवारवाद की इंतहा की वजह से लालू ने सारे पुण्य गंवा दिये। लेकिन कई ठोकरें खाने के बावजूद उऩका रवैया नहीं बदल पा रहा है।

बिहार में नीतीश का मूड उन्हें लेकर तब उखड़ा जब उन्होंने हम तो डूबेंगे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे का खेल शुरू कर दिया। अपने नालायक पुत्रों तेजस्वी और तेजप्रताप को जबरन नीतीश के साथ उप मुख्यमंत्री बनवा दिया। जिनके पास आठ मलाईदार विभाग हैं। इन विभागों में जो गुल खिलाये जा रहे हैं उनके चलते नीतीश की सुशासन बाबू की छवि मटियामेट होने में कोई कसर नहीं रही है। शहाबुद्दीन प्रकरण में भी नीतीश को बदनामी झेलने के साथ-साथ अपमानित तक होना पड़ा। लालू के तमाम नवरत्न विधायक आये दिन कोई न कोई बखेड़ा खड़ा करते रहते हैं। नीतीश का मिजाज अलग है, उऩके लिए लालू की संगत में सांस लेना तक दुश्वार हो चुका है।

ऊपर आय से अधिक संपत्ति और भ्रष्टाचार के मामलों में लालू का पूरा कुनबा केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई की चपेट में आ चुका है। चूंकि आरजेडी सहयोगी पार्टी है इसलिए लालू कुनबे पर लगे दागों का जवाब नीतीश को भी देना पड़ेगा जो कि सहज नहीं है। नीतीश आजिज आ चुके हैं। उनकी पार्टी में भी कई मंथराएं सक्रिय हैं। नीतीश ने जब पद छोड़ने की नौबत आने पर महादलित जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनवाया था तो उसके पीछे एक सकारात्मक सोच थी। सामाजिक न्याय का पूर्ण व्रत उनकी पार्टी में वंचित, शोषित अवाम को दिखाई पड़े, इस दृष्टि से उनकी यह पहल शानदार थी। उस समय शरद यादव जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे जिन्हें शुरू से ही स्काईलैब नेता माना जाता है इसलिए उनकी कुटिलता से नीतीश के लिए जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला गले की हड्डी बन गया। एक बार तो लगा कि जीतनराम मांझी जैसे भस्मासुर को वरदान देकर नीतीश ने बहुत आत्मघाती कदम उठा लिया है। लेकिन संयोग अच्छे रहे जिससे नीतीश के दिन बहुरे। इस बीच शरद यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाकर उन्होंने पैदल कर दिया है। लेकिन शरद अभी भी लकड़ी लगाने में नहीं चूक रहे हैं और लालू यादव इस समय कुछ हद तक उनकी मुट्ठी में फिर आ गये हैं।

राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में भाजपा में रामनाथ कोविंद के नाम का फैसला बहुत कुछ नीतीश कुमार की सुविधा को ध्यान में रखकर किया गया है और यह बात अब रहस्य नहीं रह गई है। विपक्षी दलों की बैठक में नीतीश जानबूझ कर गोल हो गये थे और उन्होंने व्यस्तता बताकर शरद यादव को भिजवा दिया था। जबकि अगले दिन वे नेपाली राष्ट्रपति के सम्मान में दिए गए भोज में शामिल होने के बहाने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मुद्दे पर गुफ्तगू करने पटना से दिल्ली पहुंचे थे। इसी बैठक में बिहार के राज्यपाल का नाम मोदी ने अपने दिमाग में राष्ट्रपति पद के लिए नख्श कर लिया ताकि नीतीश को उनका समर्थन करने में नीतीश को सहूलियत रहे और दूसरे कई महत्वपूर्ण मतलब साधे जा सकें।

निश्चित रूप से नीतीश कुमार भी महत्वाकांक्षी हैं और उनके इरादे दूरंदेशी हैं। लेकिन सामाजिक न्याय की राजनीति से उपजे उन पुरोधाओं के दिन लद चुके हैं जो पहचान की राजनीति के कंधे पर सवार होकर राजप्रासाद तक पहुंचने के बाद समाज, कानून, सिद्धांत हर चीज की जवाबदेही से परे होकर नंगनाच करते रहे हैं। वंचित तबके से आने वाले नेताओं को मूलपरकता, मान-मर्यादा के ख्याल से लेकर विकासपरक सोच तक में रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्था की वजह से सत्ता पर अपने पेटेंट समझने वाले सवर्ण नेताओं से अपने को बहुत आगे साबित करना चाहिए तभी बाबा साहब अंबेडकर और डा. लोहिया का सपना साकार हो सकेगा। जिन्होंने परिवर्तनगामी राजनीति के लिए समाज के सभी वर्गों को इस आधार पर जोड़ने की कल्पना की थी कि सताये हुए लोगों को सत्ता मिलेगी तो ज्यादा न्यायपूर्ण व्यवस्था कायम होगी क्योंकि उन्होंने मनमानी व्यवस्था का दंश भोगा है जिसे वे प्रोत्साहित नहीं कर सकते। लेकिन हुआ इसके ठीक उलट इसलिए सामाजिक न्याय की राजनीति के प्रति वितृष्णा का दौर शुरू हो गया था। और ऐसे समय स्थिति संभालने के लिए जो नये किरदार आये वे अवतार की तरह हैं।

इन किरदारों में दो नाम मुख्य हैं नीतीश कुमार और अखिलेश यादव। नीतीश ने शराबबंदी जैसे कदमों से राजनीतिक एजेंडे को नई दिशा देकर राष्ट्रीय राजनीति में छलांग लगाने का अवसर खोजा है। जैसा कि अखिलेश ने उत्तर प्रदेश में किया। जब उत्तर प्रदेश के सीएम के रूप में अपने परिवार के बुजुर्गों की सामंतवादी राजनीति को झटक कर वे नये एजेंडे के साथ सामने आये। 2017 का विधानसभा चुनाव अखिलेश भले ही हार गये हों लेकिन सुशासन के अपने एजेंडे की वजह से आज वे राष्ट्रीय राजनीति के भावी सितारे के रूप में देखे जा रहे हैं। नीतीश भी सामाजिक न्याय की राजनीति में ऐसे ही चमकदार नक्षत्र बनकर जगमगाने में सफल रहे हैं। इसलिए उनकी महत्वाकांक्षा सकारात्मक मानी जाएगी। तात्कालिक परिस्थितियों के हिसाब से अपने लिए अऩुकूल फैसले लेने का उनको हक है और कोई नहीं मानेगा कि राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को सपोर्ट देने की वजह से उनके समर्थकों में किसी तरह उनकी नीयत को लेकर भ्रम पैदा हो पाएगा।

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