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The Battle of Algiers

Which side would I choose in a revolution? Let me finish this bag of chips first. 777 more words

Three Reels

भारत की हत्या । कल्लोल मुख़र्जी

“कभी कभी लगता है… लगता है कि वो है ही नहीं।”

“देखो उसके घर देर है अंधेर नहीं।”

“हुह!!”

एक महीने पहले बापू “हुह!!” को अपना आखरी शब्द बनाकर दिल्ली रवाना हुए थे। उनके इस “हुह!!” में निराशा छिपी हुई थी या नाराज़गी मेरी समझ से बाहर है। उस दिन अचानक गुस्से में घर आये, खाट के नीचे से संदूक निकाला, एक बैग में दो चार कपड़े डाले और कह दिए साथियों के साथ दिल्ली जा रहा हूँ अपनी मांग मनवाने। वो बहुत ज़िद्दी हैं, अल्हड़ बिलकुल। उन्होंने किसी की नहीं सुनी थी।

मुझे याद है जब मैं सातवीं कक्षा में लाल बहादुर शास्त्री का पाठ पढ़ रही थी तब बापू बोल उठे थे, “यह जय, जवान जय किसान नारा बस किताबों में ही लोगों की छाती फुलाता है, मगर वास्तविकता बिलकुल उलटी है। इस देश में ना जवान की पीड़ा कोई समझता है और ना किसान की। हमारी बस तब याद आती है जब इन रहीस बाबुओं के पेट नहीं भरते है, जब जंग लड़नी होती हैं।”

आज रेडियो पर खबर सुनी, पता लगा उनकी हड़ताल ख़त्म हो गई है। अब वे घर आ जायंगे। पूरे तीस दिन बाद आज बापू को देखूंगी, उनकी गोदी में सिर रखकर कहानियाँ सुनूंगी, उनके साथ खेलूंगी। आज माँ के चेहरे पर भी हँसी है, वर्ना दस किलोमीटर दूर से पानी ढो कर लाने के बाद कौन हँसता दिखता है? माँ आज अच्छा खाना भी बनाएगी।

सुना है, नदी के किनारे सरकार दुनिया की सबसे ऊँची भगवान की मूर्ती बनवा रही है। मूर्ती बनवाने में कोई बाधा ना आये इसलिए नदी का मुख फेर दिया गया है। नदी जिस रास्ते पहले आती थी वो रास्ता सीधे हमारे गाँव और आस पास के गाँवों का मुख्य पानी का स्त्रोत था। मुख बदलने के बाद यहाँ नदी का रास्ता सूखकर एक गहरी खाई बनकर रह गई है।

कुदरत की क्रूरता देखिये, जब मानव आपदा आई ठीक उसका पीछा करते करते प्राकृतिक आपदा भी आ गई। पिछले 140 सालों में आया सबसे बड़ा सूखा पड़ा। जैसे गर्मी में होंठ फंटते है, वैसे हमारे यहाँ की ज़मीन फट चुकी थी। प्रभाव उतना नहीं पड़ता अगर नदी का रास्ता बदला नहीं जाता।

बापू और साथी किसानों ने मिलकर पहले राज्य सरकार के सामने आवाज़ उठाई, कुछ फायदा नहीं हुआ। फिर निश्चय किया, अपने प्यार को मरने नहीं देंगे और अचानक दिल्ली को निकल गए, केंद्र में अपनी बात रखने, हड़ताल करने और मनवाने।

दोपहर का वक़्त है। दरवाज़े पर दस्तक हुई। दरवाज़ा खुला। धूप को छुपाते हमने एक देह देखा। बापू थे। पहले खेत से आते ही मुझे गोद में उठा लिया करते थे मगर आज ऐसा कुछ नहीं हुआ। वो चुप हैं। होंठ सूखे, सफ़ेद कपड़े मटमैले हो चुके हैं। शरीर का मांस सूखकर हड्डियों से चिपक गया है, जैसे कुपोषित हो। शरीर का रंग जल कर राख हो चुका है। माँ की हँसी रुक गई है।

बापू पानी-खाना खाने के बाद भी कुछ नहीं बोल रहे हैं। माँ का तो उनसे सवाल पूछ-पूछ कर मुँह थक गया मगर बापू के लब ना हिले। बापू किसी बात से निराश हैं।

“सरकार ने हम से बात तक नहीं की।” इतना कहकर वे खाट पर लेट गए।

मेरी पढ़ाई छूट चुकी है। हमारे सारे खेत बंज़र हो चुके हैं। खाने को घर में राशन नहीं बचा है। माँ परेशान है और बापू के कंधे टूट चुके हैं। क्या वो सच में नहीं है? अगर है तो हमारी क्यों नहीं सुनता? गरीबों की आवाज़ नहीं पहुँचती क्या उस तक? हम मेहनत नहीं करते क्या? हम इंसान नहीं हैं क्या? हमसे फिर इतना भेदभाव क्यों? हमने कोई बड़ी मांग तो रखी नहीं है, हमें तो बस दो वक़्त की रोटी और एक खुशहाल ज़िन्दगी चाहिए वो भी उससे नहीं दी जाती है। तुझे मानने, तेरी पूजा करने से मुझे क्या मिला? कुछ नहीं। जा, आज से मैं नास्तिक।

मन ही मन मैंने फैसला लिया और बापू के पास जाकर उनकी गोद में लेट गई। पहले ऐसे लेटने पर वे कहानियाँ सुनाते थे, कभी भूत की तो कभी राजा की मगर आज कुछ नहीं बोले। उनकी कोई प्रतिक्रिया ना मिलने पर मैंने आँखे बंद ली और बाज़ू में लेट गई। कुछ ही देर में एक हाथ मेरे बालों में फिरने लगा। बापू का हाथ था। मैं मुस्कुराई। कुछ इसी तरह वे मुझे पहले नींद तक छोड़ने आते थे।

कुछ घंटों बाद मेरी नींद माँ के रोने की चीख से खुली। मैंने इधर उधर देखा तो बापू नहीं थे। मैं भागकर माँ में पास गई मगर उनके रोने की आवाज़ ने मेरे शब्दों को दबा दिया। एक भीड़ वहीं बगल में कोलाहल कर रही थी। मैंने वहां जाकर जगमोहन चाचा से पूछा तो उनका जवाब सुनकर मेरी रूह कांप गई।

माँ ने कहा था कि उसके घर देर है मगर अंधेर नहीं। शायद यही उसके अँधेरे के बाद का उजाला है। शायद सच में बापू ने खेत में हल जोतकर कोई गुनाह कर दिया था। अपना खून पसीना बहाकर दूसरों का पेट भरना शायद उसके लिए गुनाह है। वो नहीं चाहता कि किसान रहे, ज़िंदा और आबाद जियें।

बापू और उनके साथी किसानो ने विरोध में आज शाम उस दुनिया के सबसे ऊँची, भव्य भगवान की मूर्ति से कूदकर अपनी जान दे दी। आत्महत्या कहकर कायर कह रहे हैं शहरी लोग मगर मेरे लिए वे शहीद हुए हैं, किसी जवान की तरह जो अपनी मिट्टी की रक्षा के लिए छाती पर गोली खा लेता है।

कल सुबह मूर्ती का उद्घाटन है। सुना है प्रधानमंत्री आयेंगे। बड़ा सारा नाच-गाना भी होगा। इसलिए चुपके से किसानों की लाशें हटा दी गई हैं और खून को उसी मिट्टी में मिला दिया गया है जहाँ से वो आया था। शायद बापू सही कहते थे, “जय जवान, जय किसान सिर्फ एक नारा मात्र है। ना नेताओं को हमसे हमदर्दी है और ना भगवान को कोई चिंता है।”

Hindi

The Bicycle Thief (1948)

The original title in Italian is Ladri di biclette and I’ve seen it translated different ways namely Bicycle Thieves or The Bicycle Thief. Personally, the latter seems more powerful because it develops the ambiguity of the film right in the title. 831 more words

Drama

The dadaistic version of “Oedipus Rex”: “Funeral Parade of Roses” (1969)

This film will essentially throw you back to the age of hippy, fluxus and postwar art era, the late 60’s. Art and self-expression were a counterattack by disappointed society and the intelligentsia on the wasted age of WWII and its aftermath. 737 more words

Film

#854 The Tree of Wooden Clogs (1978)

#854 The Tree of Wooden Clogs

1978 // Italy // Ermanno Olmi

Criterion Collection (LINK)

Ermanno Olmi’s 1978 Palme d’or winning film The Tree of Wooden Clogs is a three hour epic masterpiece that have been largely sidelined in the discussion of Italian cinema. 752 more words

Criterion Collection

The Process Genre in Videogames: Cart Life

Ian here—

This post is part of a series that borrows the term process genre from Salomé Aguilera Skvirsky’s work in cinema studies, and explores its utility for videogame analysis. 1,785 more words

Posts By Ian

Tree of the Wooden Clogs

Seeing The Tree of the Wooden Clogs (L’Albero degli Zoccoli) in a cinema this week was a neorealist sacrament.

Ermanno Olmi wrote and directed it, in 1978, using both actors and non-actors, in the Bergamo dialect. 511 more words