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Live what YOU like about yourself, irrespective

7th Oct 2013 – 3:45 AM – Imperial Castle 205

People are the same wherever you go

Irrespective of their cultures, Irrespective of their creed, Irrespective of their religion, Irrespective of their color… 115 more words

Poems

Ascent

Resplendent in regal white,
Notwithstanding
the inconsolable tears
Of those near and dear-
She took to the skies,
Beginning the ultimate flight-
That was but destined… 78 more words

Poetry

कहते हैं तारे गाते हैं !

सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का
यह राग नहीं हम सुन पाते हैं !
कहते हैं तारे गाते हैं !

स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथ्वी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस कणों में
तारों के नीरव आँसू आते हैं !
कहते हैं तारे गाते हैं !

ऊपर देव तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा ऊपर को उठता
आँसू नीचे झर जाते हैं !
कहते हैं तारे गाते हैं !

हरिवंश राय बच्चन

Harivansh Rai Bachchan

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

हो जाय न पथ में रात कहीं,

मंज़िल भी तो है दूर नहीं-

यह सोच थका दिन का पंथी भी

जल्दी-जल्दी चलता है !

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है। 6 more words

Harivansh Rai Bachchan

साथी, सब कुछ सहना होगा !

मानव पर जगती का शासन,
जगती पर संसृति का बंधन,
संसृति को भी और किसी के
प्रतिबंधों में रहना होगा !
साथी, सब कुछ सहना होगा !

हम क्या हैं जगती के सर में !
जगती क्या, संसृति सागर में !
एक प्रबल धारा में हमको
लघु तिनके-सा बहना होगा !
साथी, सब कुछ सहना होगा !

आओ, अपनी लघुता जानें,
अपनी निर्बलता पहचानें,
जैसे जग रहता आया है
उसी तरह से रहना होगा !
साथी, सब कुछ सहना होगा !

हरिवंश राय बच्चन

Harivansh Rai Bachchan

जो बीत गई सो बात गई

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आँगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई।

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुबन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाईं कितनी वल्लरियाँ
जो मुरझाईं फिर कहाँ खिलीं
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई।

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई।

मृदु मिट्टी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अंदर
मधु के घट हैं, मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई।

हरिवंश राय बच्चन

Harivansh Rai Bachchan

छाया मत छूना मन

छाया मत छूना मन,

होगा दुख दूना मन।

जीवन में हैं सुरंग, सुधियाँ, सुहावनी

छवियों की चित्र गंध फैली मनभावनी।

तन सुगंध शेष रही बीत गई यामिनी,

कुंतल के फूलों की याद बनी चांदनी।

भूली से एक छुअन बनता हर जीवित क्षण –

छाया मत छूना मन,

होगा दुख दूना मन।

यश है, न वैभव है, मान है, न सरमाया ;

जितना भी दौड़ा तू उतना ही भरमाया।

प्रभुता का शरण बिम्ब केवल मृगतृष्णा है,

हर चन्द्रिका में छिपी एक रात कृष्णा है

जो है यथार्थ कठिन उसका तू कर पूजन –

छाया मत छूना मन,

होगा दुख दूना मन।

दुविधा हत साहस है दिखता है पंथ नहीं

देही सुख हो, पर मन के दुख का कुछ अंत नहीं।

दुख है न चाँद खिला शरद रात आने पर,

क्या हुआ जो खिला फूल रस बसंत जाने पर ?

जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण,

छाया मत छूना मन,

होगा दुख दूना मन।

गिरिजा कुमार माथुर

Philosophical Poems