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Blue Revolution to dawn in Punjab

T

he government of Punjab is seriously pushing ahead its plan to bring Blue Revolution in the state of five rivers. The CM Mr. Parkash Singh Badal has given his nod to modernizing of 15 fish farms with a total cost of Rs. 129 more words

Punjab Current Affairs

The glorious Golden Temple and the pitfalls of Amritsar

We arrived early for our private bus to Delhi – an hour and a half early to be exact. So, as we have now become used to, we sat on the shop stairs of the bus company in the draining humidity and watched as our bus roof was loaded with parcels and packages destined to join us in the Indian capital. 2,683 more words

Travel

Animals | Red Munia

LG G4 Rated as the Best Camera Phone for Pictures @ Searchy.One Search

Description From Photographer if Any:

Red Munia


By FarhanYounus

Source: 500px.com

Beautiful

Ego of Girl Killers

There was a time when warriors needed to save women from corrupt society. That time has passed and the warriors have now changed themselves into Hyenas, living in Punjab, singing songs of hypocrisy. 662 more words

People

NOTES FROM COVERING GURDASPUR: Forget proactive, we aren't reacting enough

My queries began a few hours after the attack did. I didn’t want to irk people with questions when they would have been busy coordinating, attending meetings etc. 724 more words

Bsf

आईएसआईएस का आकर्षण

1980 के दशक से शुरू हुए भूमण्डलीकरण ने बहुत तेजी से असामनता को जन्म दिया है और साथ ही इस असामनता ने विद्रोह की बड़ी संभावनाओं को पैदा किया। अमेरिका और युरोप में मध्यम वर्ग तेजी से कमजोर हुआ और वैसी ही स्थिति फिर से पैदा हुई जिसने युरोप को पिछली सदी में पहले और दूसरे विश्व यु़द्ध की ओर डकेल दिया था।

दूसरी ओर भूमण्लीकरण ने दुनिया भर के देशों को आपस में अभूतपूर्व रूप से जोड़ दिया है। आज एक देश में होने वाली मामूली से मामूली घटना भी अन्य देशों में कहीं व्यापक रूप से असर डालती है। ऐसे में विश्व स्तर में जन उभार की संभावनाएं पूराने विद्रोहों से बहुत बड़ी हो जाती है। यह जरूरी हो जाता है कि विश्व स्तर में ही एक ऐसा महौल बनाया जाए जो यथास्थिति को ही बनाए रखने के लिए जनता को मानसिक रूप से तैयार रखे।

1990 के बाद अमेरिका और युरोप में तेजी से नए प्रकार के आंदोलनों का सिलसिला आरंभ हुआ। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की योजनाओं के खिलाफ लोग सड़को में उतर आए। युरोप, लातिनी अमेरिका और अन्य देशों में वे राजनीतिक दल मजबूत हुए जो भूमण्डलीकरण की खिलाफत कर रहे थे। साथ ही कई दलों ने अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए अपने कार्यक्रम में बदलाव किए और जनता को यह जताने की कोशिश की कि वे अमेरिका द्वारा प्रयोजित भूमण्डलीकृत अर्थव्यवस्था के खिलाफ हैं। रूस और चीन ने भूमण्डलीकरण के विकल्प के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

ऐसे में ये जरूरी था कि जनता को किसी ऐसे खतरे का एहसास कराया जाए जिससे वो इसी व्यवस्था और ‘लोकतंत्र’ को बनाए रखने के लिए ‘सहमत’ रहे। इसी योजना के तहत पहले अल कायदा और अब आईएसआईएस यानि इस्लामिक स्टेट आॅफ ईराक एण्ड सीरिया दुनिया के क्षितिज में उभर कर आएं।

इसका मतलब यह कहना नहीं है कि आईएस और अलकायदा पूरी तरह से सम्राज्यवादी देशों के षड़यत्र के परिणाम हैं। और यह भी नहीं कि इन संगठनों की अपनी कोई राजनीतिक समझ नहीं है। यदि ऐसा होता तो यह एक छोटे दायरे में ही सिमट कर रह जाते और जनता को अपनी ओर आकर्षित करने में असमर्थ हो जाते। बल्कि जहां ये समूह शुरू में सक्रिय हुए वहां ऐतिहासिक कारणों से ऐसे अंतरविरोध मौजूद थे जिनसे अमेरिका और युरोप के साम्राज्यवादी देशों को आंतरिक मामलों में हस्ताक्षेप का मौका दिया।

हांलाकि कि ये संगठन अपने सार में घोर प्रतिकृयावादी ही हैं जो इतिहास के चक्र को किसी ’सुनहरे’ अतीत की ओर मोड़ देना चाहते हैं लेकिन इन संगठनों ने खुद को अमेरिकी और युरोपीय साम्राज्यवाद के शत्रु की तरह दिखा पाने में सफलता प्राप्त की है। यही वह प्रमुख कारण भी है जिसने विश्व भर के युवाओं को इन संगठनों की ओर तेजी से आकर्षित भी किया है। हाल में जो खबरे आईं हैं उनसे यह साफ है कि जो लोग आईएस से जुड़े हैं उनका मकसद ऐसे समाज के निर्माण में अपनी भागीदारी देना है जो न्यायपूर्ण है। ऐसे युवाओं का बहुसंख्यक हिस्सा ऐसे देशों से है जहां वे अलगाव महसूस करते हैं।

आईएस की राजनीति के बारे में स्पष्ट सूचना का आभाव है। लेकिन यह बात अब बहुत साफ है कि अमेरिका और इजरायल ने अपने युरोपीय सहयोगी देशों की सहमति में ही आईएस को सीरिया की असद सरकार के खिलाफ युद्ध के लिए प्रोत्साहन दिया ताकि वे ईराक, सीरिया और आसपास के अन्य देशों में अपनी विरोधी शक्तियों को काबू में कर सकें।

दार्शनिक हिगेल ने बहुत पहले ही कहा था कि इतिहास का सबसे बड़ा सबक यह है कि इतिहास से कोई सबक नहीं लेता। साम्राज्यवाद की सबसे बड़ी कमजोरी होती है कि उसमें दूरदृष्टि का आभाव होता है। यही कारण है कि वह समय को अपने इर्दगिर्द रोके रखना चाहता है। अल कायदा और आईएस का गठन और विस्तार के पीछे छिपे कारण जो भी हों लेकिन दोनों ही संगठन खुद को अमेरिकी और युरापीय साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रस्तुत करते हैं। इसलिए वे तब तक तो साथ चल सकते हैं जब तक उनके और उनको समर्थन देने वाले देशों के आपसी हित में कोई टकराव नहीं होता। लेकिन जैसे ही साझा हित पूरा हो जाता है दोनों अलग अलग खेमों में विभाजित हो जाते हैं। यही इस प्रक्रिया की तार्किक परिणीती भी हैं।

हर संगठन अपने विकास में लगातार स्वायत्त होने की प्रक्रिया में रहता है। बिना स्वायत्ता के वह अपने अस्तित्व की आवश्यकता को स्थापित नहीं कर सकता है। स्वयं हमारे देश भारत में ही सत्ता कई बार अंतरविरोधों को हल करने के लिए जिन उपायों को प्रस्तुत करती है वे एक समय बाद स्वायत्त होने की प्रक्रिया में क्रमशः अपने ‘जन्मदाता’ के विरोध में खड़े होते जाते हैं। पंजाब में भिण्डरवाला के नेतृत्व में खालिस्तान आंदोलन अकालियों को कमजोर करने का एक उपाय था और श्री लंका में लिट्टे के नेतृत्व वाला आंदोलन भी ऐसे ही कारणों से आगे बढ़ा। लेकिन दोनों ही की कीमत अंततः भारत को चुकानी पड़ी थी। अमेरिका को भी देर सबेर अपने कृत की ऐसी ही कीमत चुकानी पड़ेगी और उसे अपनी राजनीति को बदलने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

दूसरी ओर आईएस और अलकायदा की राजनीति में जो प्रतिक्रियावादी तत्व आज प्रमुख हैं उनका एक प्रक्रिया में गौण होना भी उतना ही स्वभाविक है। आने वाले दिनों में इनके भीतर मौजूद साम्राज्यवाद विरोधी तत्व इसकी दिशा को आवश्यक रूप से प्रगतिशील राजनीति की ओर मोड़ेंगे। और इस बात की संभावना से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता कि यह क्षेत्र 21वीं सदी में समाजवादी आधार क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत नहीं होगा।

वि.श.

(दस्तक के जून-जुलाई अंक में प्रकाशित)

Vishnu Sharma

Is Punjab a 'country within a country' ?

Has Punjab always been a ‘country with a country’?  My take … Ranjit Singh , a one-time king – he lived only in his harem – never ruled, yet he was king.   114 more words

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