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बालिका से वधू - रामधारी सिंह दिनकर(Balika se vadhu-Ramdhari Singh Dinkar)

माथे में सेंदूर पर छोटी
दो बिंदी चमचम-सी,
पपनी पर आँसू की बूँदें
मोती-सी, शबनम-सी।

लदी हुई कलियों में मादक
टहनी एक नरम-सी,
यौवन की विनती-सी भोली, 25 more words

GREAT POETS ( महा कवि )

शक्ति और क्षमा - रामधारी सिंह दिनकर(Shakti aur Shama-Ramdhari Singh Dinkar)

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा ?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो।

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे।

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से।

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।

सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन सम्पूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

Ramdhari Singh Dinkar

बिहार की राजनीति और जातिवाद: दिनकर की कलम से

जाति-नाम का शोषण करके मौज मारनेवाले चन्द लोग, जो कुछ करते हैं, उसकी कुत्सा उस जातिभर को झेलनी पड़ती है. भूमिहार होकर भी हम गुण केवल भूमिहारों में ही नहीं देखें. 6 more words

वसुधा का नेता कौन हुआ

सच है, विपत्ति जब आती है,हैं
कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,

Pragatiwadi Kavita

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

सदियों की ठंडी, बुझी राख सुगबुगा उठी,

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है ;

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। 17 more words

Pragatiwadi Kavita

समर शेष है

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस  का कस खोलो

किसने कहा, युद्ध की बेला गई, शान्ति से बोलो ?

किसने कहा, और मत बेधो ह्रदय वह्नि के शर से

भरो भुवन का अंग कुसुम से, कुंकुम से, केसर से ?

कुंकुम ? लेपूँ किसे ? सुनाऊँ किसको कोमल गान ?

तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान।

फूलों की रंगीन लहर पर ओ उतराने वाले !

ओ रेशमी नगर के वासी ! ओ छवि के मतवाले !

सकल देश में हलाहल है दिल्ली में हाला है,

दिल्ली में रौशनी शेष भारत में अंधियाला है।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,

ज्यों का त्यों है खड़ा आज भी मरघट सा संसार।

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है,

जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अम्बर तिमिर – वरण है।

देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्तःस्थल हिलता है,

माँ को लज्जा वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है।

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन – जन देख अकाज,

सात वर्ष हो गए राह में अटका कहाँ स्वराज ?

अटका कहाँ स्वराज ? बोल दिल्ली ! तू क्या कहती है ?

तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है ?

सबके भाग्य दबा रक्खे हैं किसने अपने कर में ?

उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी, बता किस घर में ?

समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा,

और नहीं तो तुझपर पापिनि ! महावज्र टूटेगा।

समर शेष है, इस स्वराज को सत्य बनाना होगा ।

जिसका है यह न्यास, उसे सत्वर पहुँचाना होगा।

धारा के मग में अनेक पर्वत जो खड़े हुए हैं,

गंगा का पथ रोक इंद्र के गज जो अड़े हुए हैं,

कह दो उनसे झुके अगर तो जग में यश पाएंगे,

अड़े रहे तो ऐरावत पत्तों – से बह जाएंगे।

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो,

शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो।

पथरीली, ऊंची जमीन है ? तो उसको तोड़ेंगे।

समतल पीटे बिना समर की भूमि नहीं छोड़ेंगे।

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर,

खंड – खंड हो गिरे विषमता की काली जंजीर।

समर शेष है, अभी मनुज – भक्षी हुंकार रहे हैं।

गांधी का पी रुधिर, जवाहर पर फुंकार रहे हैं।

समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है,

वृक को दंतहीन, अहि को र्निर्विष करना बाकी है।

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल

विचरें अभय देश में गांधी और जवाहर लाल।

तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्कांड रचें ना !

सावधान, हो खड़ी देशभर में गांधी की सेना।

बलि देकर भी बली ! स्नेह का यह मृदु वृत साधो रे

मंदिर औ मस्जिद दोनो पर एक तार बाँधो रे !

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

Pragatiwadi Kavita

चाँद का कुर्ता

हठ कर बैठा चाँद एक दिन माता से यह बोला

सिलवा दो ना मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला

सन – सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ

ठिठुर – ठिठुर कर किसी तरह से यात्रा पूरी करता हूँ

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का

न हो अगर तो ला दो कुरता ही कोई भाड़े का

बच्चे की सुन बात कहा माता ने अरे सलोने

कुशल करे भगवान लगें मत तुझको जादू टोने

जाड़े की तो बात ठीक है पर मैं तो डरती हूँ

एक नाप में कभी नहीं मैं तुझको देखा करती हूँ

कभी एक अंगुल भर चौड़ा कभी एक फुट मोटा

बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा

घटता बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है

नहीं किसी की आँखों को तू दिखलाई पड़ता है

अब तू ही यह बता नाप तेरी किस रोज लिवायें

सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आये ?

रामधारी सिंह दिनकर

Baal Kavita