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"दिनकर" का स्वर और शब्द का संगीत

आवाज का अपना आकर्षण होता है। कसी व्यक्ति के न रहने पर हम उसका अस्तित्व उसकी तस्वीरो में अनुभव करते है, मगर आवाज…. उसका आकर्षण फिर भी अलग ही होता है । आवाज अगर किसी परिचित व्यक्ति की हो, तो उसकी आवाज की परतें खुलने के साथ ही,उसके साथ बिताए गए सुखद स्मृतियों के अलबम की परतें भी एक- एक कर खुलने लग जाती है । जहाँ तक दिनकर जी का प्रश्न है, तो उनके बहुत से अग्रज प्रशंसकों के लिए, जो पिछले पीढ़ी से ताल्लुक रखते है, उनकी वाणी ही थाती है और और उनकी सुखद स्मृतियाँ ही उनकी धरोहर है । जिन लोगो ने इस कवि की कविता को स्वयं उसके मुख से सुना है, और जिन्होंने आज तक उनकी ओजमयी वाणी की स्मृतियाँ संजोकर रखी है, उन्हें ये प्रस्तुति पुराने समय में खींच लाएगी, और हम में से कईयों के लिए, जिन्होंने दिनकर जी को परस्पर नहीं देखा, ये उनके लिए एक अनुभव का काम करेगी ।

विविध

शक्ति और क्षमा

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ सुयोधन तुमसे
कहो कहाँ कब हारा?
क्षमाशील हो रिपु-सक्षम
तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसका क्या जो दंतहीन
विषरहित विनीत सरल हो

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिंधु किनारे
बैठे पढते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे प्यारे

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नही सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से

सिंधु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता गृहण की
बंधा मूढ़ बन्धन में

सच पूछो तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
संधिवचन सम्पूज्य उसी का
जिसमे शक्ति विजय की

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है

~~~
रामधारी सिंह दिनकर

Poem

Asha ka deepak (आशा का दीपक)-Ramdhari singh dinkar

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है;
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।
चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से;
चमक रहे पीछे मुड़ देखो चरण-चिह्न जगमग से।
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है;
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।

अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का;
सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश का।
एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ;
वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा;
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही;
अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

Ramdhari Singh Dinkar

Aag ki bheek (Ramdhari singh dinkar)

धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा, 
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा। 
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है; 
मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?  9 more words

Ramdhari Singh Dinkar

रश्मिरथी

कवि: रामधारी सिंह ‘दिनकर’


जीवन के परम ध्येय सुख को, सारा समाज अपनाता है
देखना यही है, कौन वहां तक, किस प्रकार से जाता है|

है धर्म पहुंचना नहीं, धर्म तो जीवन भर चलने में है,
फैला कर पथ पर स्निग्ध ज्योति, दीपक समान जलने में है|

यदि कहें विजय, तो विजय प्राप्त हो जाती परतापी को भी,
सत्य ही पुत्र, दारा, धन, मिल जाते हैं पापी को भी|

हो इसे धर्म से प्रेम कभी, वो कुत्सित कर्म करेगा क्या?
बर्बर कराल, दंष्ट्री बन कर, मारेगा और मरेगा क्या?

पर हाय मनुज के भाग्य, अभी तक, खोटे के खोटे हैं,
हम बड़े बहुत बाहर, भीतर लेकिन छोटे के छोटे हैं|

साधन की मूल सिद्धि पर जब, टकटकी हमारी लगती है,
फिर विजय छोड़, भावना और कोई न युद्ध में जगती है|

जब लोभ सिद्धि का आँखों पर, माँडी बन कर छा जाता है,
तब वह मनुष्य से बड़े-बड़े, दुश्चित्य कृत्य करवाता है|

फिर क्या विस्मय, कौरव-पांडव भी नहीं धर्म के साथ रहे,
जो रंग युद्ध का है उससे, उनके भी अलग न हाथ रहे|

दोनों ने कालिख धूमी, शीश पर जय का तिलक लगाने को,
सत्पथ से दोनों डिगे, दौड़ कर विजय-विंद तक जाने को|

परशुराम की प्रतीक्षा

कवि: रामधारी सिंह ‘दिनकर’

वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है,
वीरता जहाँ पर नहीं,स्वार्थ की जय है।

तलवार पुण्य की सखी, धर्मपालक है,
लालच पर अंकुश कठिन, लोभ-सालक है।
असि छोड़, भीरु जहाँ धर्म सोता है,
पातक प्रचंडतम वहीँ प्रकट होता है।

तलवारें सोतीं जहाँ बंद मयानों में,
किस्मतें वहीँ सड़ती हैं तहखानों में ।
बलिवेदी पर बालियें-नथें चढ़तीं हैं,
सोने की ईंटें, मगर, नहीं कढ़ती हैं।

पूछो कुबेर से कब सुवर्ण वे देंगें?
यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगें ?
तूफ़ान उठेगा, प्रलय बाण छूटेगा,
है जहाँ स्वर्ण, बम वहीँ, स्यात् फूटेगा।

जो करें, किंतु, कंचन यह नहीं बचेगा,
शायद, सुवर्ण पर ही संहार मचेगा|
हम पर अपने पापों का बोझ ना डालें,
कह दो सबसे, अपना दायित्व संभालें|

कह दो प्रपंचकारी, कपटी, जाली से,
आलसी, अकर्मठ, काहिल, हडताली से,
सी लें जबान, चुपचाप काम कर जायें,
हम यहाँ रक्त, वे घर पे स्वेद बहायें|

हम दें दें उसको विजय, हमें तुम बल दो,
दो शास्त्र और अपना संकल्प अटल दो|
हों खड़े लोग कटिबद्ध अगर वहाँ घर में,
है कौन हमें जीते यहाँ समर में?