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सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

सदियों की ठंढी, बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। 8 more words

FAMOUS HINDI POEM

Ramdhari Singh Dinkar-1

पंक झेलता हुआ भूमि का
त्रिविध ताप को सहता।
कभी खेलता हुआ ज्योति से
कभी तिमिर में बहता।
अगम अतल को फोड़ बहाता
धार मृत्ति के पय की।
रस पीता, दुन्दभि बजाता ,
मानवता की , जय की।
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फूलों पर आँसू के मोती
और अश्रु में आशा।
मिट्टी के जीवन की छोटी ,
नपी – तुली परिभाषा।।
———————रामधारी सिंह ‘दिनकर ‘

Poems

बालिका से वधू - रामधारी सिंह दिनकर(Balika se vadhu-Ramdhari Singh Dinkar)

माथे में सेंदूर पर छोटी
दो बिंदी चमचम-सी,
पपनी पर आँसू की बूँदें
मोती-सी, शबनम-सी।

लदी हुई कलियों में मादक
टहनी एक नरम-सी,
यौवन की विनती-सी भोली, 25 more words

GREAT POETS ( महा कवि )

शक्ति और क्षमा - रामधारी सिंह दिनकर(Shakti aur Shama-Ramdhari Singh Dinkar)

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा ?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो।

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे।

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से।

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।

सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन सम्पूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

Ramdhari Singh Dinkar