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सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

सदियों की ठंढी, बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। 8 more words

FAMOUS HINDI POEM

Ramdhari Singh Dinkar-1

पंक झेलता हुआ भूमि का
त्रिविध ताप को सहता।
कभी खेलता हुआ ज्योति से
कभी तिमिर में बहता।
अगम अतल को फोड़ बहाता
धार मृत्ति के पय की।
रस पीता, दुन्दभि बजाता ,
मानवता की , जय की।
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फूलों पर आँसू के मोती
और अश्रु में आशा।
मिट्टी के जीवन की छोटी ,
नपी – तुली परिभाषा।।
———————रामधारी सिंह ‘दिनकर ‘

Poems