Tags » Ramdhari Singh 'Dinkar'

वसुधा का नेता कौन हुआ

सच है, विपत्ति जब आती है,हैं
कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,

Pragatiwadi Kavita

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

सदियों की ठंडी, बुझी राख सुगबुगा उठी,

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है ;

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। 17 more words

Pragatiwadi Kavita

समर शेष है

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस  का कस खोलो

किसने कहा, युद्ध की बेला गई, शान्ति से बोलो ?

किसने कहा, और मत बेधो ह्रदय वह्नि के शर से

भरो भुवन का अंग कुसुम से, कुंकुम से, केसर से ?

कुंकुम ? लेपूँ किसे ? सुनाऊँ किसको कोमल गान ?

तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान।

फूलों की रंगीन लहर पर ओ उतराने वाले !

ओ रेशमी नगर के वासी ! ओ छवि के मतवाले !

सकल देश में हलाहल है दिल्ली में हाला है,

दिल्ली में रौशनी शेष भारत में अंधियाला है।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,

ज्यों का त्यों है खड़ा आज भी मरघट सा संसार।

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है,

जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अम्बर तिमिर – वरण है।

देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्तःस्थल हिलता है,

माँ को लज्जा वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है।

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन – जन देख अकाज,

सात वर्ष हो गए राह में अटका कहाँ स्वराज ?

अटका कहाँ स्वराज ? बोल दिल्ली ! तू क्या कहती है ?

तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है ?

सबके भाग्य दबा रक्खे हैं किसने अपने कर में ?

उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी, बता किस घर में ?

समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा,

और नहीं तो तुझपर पापिनि ! महावज्र टूटेगा।

समर शेष है, इस स्वराज को सत्य बनाना होगा ।

जिसका है यह न्यास, उसे सत्वर पहुँचाना होगा।

धारा के मग में अनेक पर्वत जो खड़े हुए हैं,

गंगा का पथ रोक इंद्र के गज जो अड़े हुए हैं,

कह दो उनसे झुके अगर तो जग में यश पाएंगे,

अड़े रहे तो ऐरावत पत्तों – से बह जाएंगे।

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो,

शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो।

पथरीली, ऊंची जमीन है ? तो उसको तोड़ेंगे।

समतल पीटे बिना समर की भूमि नहीं छोड़ेंगे।

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर,

खंड – खंड हो गिरे विषमता की काली जंजीर।

समर शेष है, अभी मनुज – भक्षी हुंकार रहे हैं।

गांधी का पी रुधिर, जवाहर पर फुंकार रहे हैं।

समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है,

वृक को दंतहीन, अहि को र्निर्विष करना बाकी है।

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल

विचरें अभय देश में गांधी और जवाहर लाल।

तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्कांड रचें ना !

सावधान, हो खड़ी देशभर में गांधी की सेना।

बलि देकर भी बली ! स्नेह का यह मृदु वृत साधो रे

मंदिर औ मस्जिद दोनो पर एक तार बाँधो रे !

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

Pragatiwadi Kavita

चाँद का कुर्ता

हठ कर बैठा चाँद एक दिन माता से यह बोला

सिलवा दो ना मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला

सन – सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ

ठिठुर – ठिठुर कर किसी तरह से यात्रा पूरी करता हूँ

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का

न हो अगर तो ला दो कुरता ही कोई भाड़े का

बच्चे की सुन बात कहा माता ने अरे सलोने

कुशल करे भगवान लगें मत तुझको जादू टोने

जाड़े की तो बात ठीक है पर मैं तो डरती हूँ

एक नाप में कभी नहीं मैं तुझको देखा करती हूँ

कभी एक अंगुल भर चौड़ा कभी एक फुट मोटा

बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा

घटता बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है

नहीं किसी की आँखों को तू दिखलाई पड़ता है

अब तू ही यह बता नाप तेरी किस रोज लिवायें

सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आये ?

रामधारी सिंह दिनकर

Baal Kavita

अनिवार्य है बिहार का नवोत्थान - Development of Bihar and the Politics

यूं तो ऐसा कोई दिन नहीं, जब बिहार से सम्बंधित खबरें राष्ट्रीय सुर्खियां न बनती हों. बात चाहें राजनीति की हो, गरीबी की हो, पलायन की हो, जर्जर सड़कों की हो या स्कूल की चारदीवारियों पर चढ़े नक़ल कराते लोगों की हो, बिहार हर रोज राष्ट्रीय परिदृश्य पर चर्चा में बना रहता है.

कलम आज उनकी जय बोल

जला अस्थियाँ बारी – बारी

छिटकाई जिनने चिनगारी

जो चढ़ गए पुण्य वेदी पर

लिए बिना गर्दन का मोल

कलम, आज उनकी जय बोल ।

जो अगणित लघु दीप हमारे

तूफानों में एक किनारे

जल – जल कर बुझ गए किसी दिन

मांगा नहीं स्नेह मुख खोल

कलम, आज उनकी जय बोल ।

पीकर जिनकी लाल शिखाऐं

उगल रही लू – लपट दिशाऐं

जिनके सिंहनाद से सहमी

धरती रही अभी तक डोल

कलम, आज उनकी जय बोल ।

अंधा चकाचौंध का मारा

क्या जाने इतिहास बिचारा

साखी हैं उसकी महिमा के

सूर्य, चन्द्र, भूगोल, खगोल

कलम, आज उनकी जय बोल ।।

  • रामधारी सिंह ” दिनकर “
Pragatiwadi Kavita

"दिनकर" का स्वर और शब्द का संगीत

आवाज का अपना आकर्षण होता है। कसी व्यक्ति के न रहने पर हम उसका अस्तित्व उसकी तस्वीरो में अनुभव करते है, मगर आवाज…. उसका आकर्षण फिर भी अलग ही होता है । आवाज अगर किसी परिचित व्यक्ति की हो, तो उसकी आवाज की परतें खुलने के साथ ही,उसके साथ बिताए गए सुखद स्मृतियों के अलबम की परतें भी एक- एक कर खुलने लग जाती है । जहाँ तक दिनकर जी का प्रश्न है, तो उनके बहुत से अग्रज प्रशंसकों के लिए, जो पिछले पीढ़ी से ताल्लुक रखते है, उनकी वाणी ही थाती है और और उनकी सुखद स्मृतियाँ ही उनकी धरोहर है । जिन लोगो ने इस कवि की कविता को स्वयं उसके मुख से सुना है, और जिन्होंने आज तक उनकी ओजमयी वाणी की स्मृतियाँ संजोकर रखी है, उन्हें ये प्रस्तुति पुराने समय में खींच लाएगी, और हम में से कईयों के लिए, जिन्होंने दिनकर जी को परस्पर नहीं देखा, ये उनके लिए एक अनुभव का काम करेगी ।

विविध