आवाज का अपना आकर्षण होता है। कसी व्यक्ति के न रहने पर हम उसका अस्तित्व उसकी तस्वीरो में अनुभव करते है, मगर आवाज…. उसका आकर्षण फिर भी अलग ही होता है । आवाज अगर किसी परिचित व्यक्ति की हो, तो उसकी आवाज की परतें खुलने के साथ ही,उसके साथ बिताए गए सुखद स्मृतियों के अलबम की परतें भी एक- एक कर खुलने लग जाती है । जहाँ तक दिनकर जी का प्रश्न है, तो उनके बहुत से अग्रज प्रशंसकों के लिए, जो पिछले पीढ़ी से ताल्लुक रखते है, उनकी वाणी ही थाती है और और उनकी सुखद स्मृतियाँ ही उनकी धरोहर है । जिन लोगो ने इस कवि की कविता को स्वयं उसके मुख से सुना है, और जिन्होंने आज तक उनकी ओजमयी वाणी की स्मृतियाँ संजोकर रखी है, उन्हें ये प्रस्तुति पुराने समय में खींच लाएगी, और हम में से कईयों के लिए, जिन्होंने दिनकर जी को परस्पर नहीं देखा, ये उनके लिए एक अनुभव का काम करेगी ।