नाकाम कोशिश है मुझे आजमाने की,
कि समंदर आज भी सोचता है मुझे डुबाने की,
हम पंख नहीं हौसलों से उड़ते हैं,
हवाएं लाख साजिश कर लें “रवि” को गिराने की,
तू अपना है जो मुझे दर्द देता है वरना,
क्या जरूरत है मुझे ग़म मे भी मुस्कराने की,…..