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गुरुदेव का भजन....

ईश ते अधिक गुरु में धारे भक्ति सुजान

ईश्वर का भजन करने से केवल भाव शुद्ध होंगे, हृदय शुद्ध होगा गुरुदेव का भजन करने से क्रिया और ज्ञान शुद्ध होगा । गुरु का दैवी कार्य करना भी गुरुदेव का भजन है । गुरु का चिन्तन करना भी गुरु का भजन है । जो काम करने से गुरु प्रसन्न हों वह सारा काम भजन हो जाता है । हनुमानजी ने रावण की लंका जलाई फिर भी वह भजन हो गया । ताड़का वध भी राम जी का भजन हो गया । राक्षसों का संहार करना भी राम जी का विश्वामित्र के प्रति भजन हो गया । क्रिया तुम कैसी कर रहे हो, अच्छी या बुरी, यह नहीं परन्तु क्रिया करने के पीछे तुम्हारा भाव क्या है यह महत्व रखता है । जैसे माँ बच्चे को कभी कटु दवा पिलाती है कभी मिठाई खिलाती है मगर उसका भाव तो बच्चे की तन्दरुस्ती का है । ऐसे ही गुरु में हमारा भाव अगर शुद्ध है तो कभी कुछ करना पड़े तो कोई दोष नहीं लगता । कभी किसी से स्नेह से चलना हो या रोष करके चलना पड़े फिर भी भगवान के, गुरु के मार्ग पर चलते हैं, गुरुकार्य में लगे हैं तो वह भजन, पूजा, साधना हो जाती है । उस समय तुम्हारी क्रिया के पीछे जो भाव है उसका मूल्य है । जब तक ऐसा भाव नहीं जगा तब तक क्रिया मुख्य रहती है । भाव जग गया तब क्रिया गौण हो जाती है ।

Asaramji