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शंका प्रश्न :- यदि किसी के माता - पिता भूखे हो,वे दिखाई देकर कहें तो वह पुत्र नही जो उनकी इच्छा पूरी न करे ।

शंका समाधान : – यदि किसी का बच्चा कुएं में गिर गया होतो वह चिल्लायेगा की मुजे बचा लो । पिताजी आ जाओ । में मर रहा हूँ । वह पिता मूर्ख होगा जो भावुक होकर कुएं में छलांग लगाकर बच्चे को बचाने की कोशिश करके स्वयं भी डूबकर मर जायेगा । बच्चे को भी नही बचा पायेगा । उसको चाहिए कि लम्बी रस्सी का प्रबंध करें । फिर उस कुएं में छोड़े । बच्चा उसे पकड़ ले । फिर बाहर खीचकर बच्चे को कुएं से बाहर निकालें । इसीप्रकार पूर्वज तो शास्त्रविधि त्यागकर मनमाना आचरण (पूजा) करके पितर बन चुके है । संतान को भी पितर बनाने के लिए पुकार रहे है । तत्वज्ञान को समझकर अपना कल्याण कराएं तथा मेरे गुरु जी (रामपाल दास) के पास परमेश्वर कबीर बन्दी छोड़ जी की प्रदान की हुई वह विधि है जो साधक का तो कल्याण करेगी ही ,उसके पितरो की भी पितर योनि छूटकर मानव जन्म प्राप्त होगा ।

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भगवान के संविधान का ज्ञान

कबीर साहब

वेदों में प्रमाण है कबीर साहेब भगवान है।

प्रेत शिला पर जाय विराजे,पितरो पिंड भराई । बहुर श्राद्ध खान कूं आया,काग भये कलि माही।।

भावार्थ : – मृत्यु के उपरान्त जीव के कल्याण अर्थात गति कराने के लिए जो शास्त्रविरुद्ध क्रियायें की जाती है वह क्रियायें व्यर्थ है । जैसे गरुण पुराण का पाठ करवाया उस मरने वाले कि गति के लिए अर्थात मोक्ष के लिए । फिर अस्थियां गंगा में प्रवाहित की गति के लिए ।फिर तेरहवी या सत्रहवीं को हवन व भंडारा किया उसकी गति कराने के लिए ।पहले प्रत्येक महीने एक वर्ष तक क्रियायें करते थे उसकी गति कराने के लिए ,फिर छठे महीने छ:माही किया करते थे उसकी गति कराने के लिए, फिर वर्षी क्रिया करते थे ,फिर उसकी पिण्डोदक क्रिया कराते है ।उसकी गति कराने के लिए श्राद्ध निकालते है अर्थात श्राद्ध क्रिया कराते है ।श्राद्ध वाले दिन पुरोहित भोजन स्वयं बनाता है और कहता है कि कुछ भोजन मकान की छत पर रखो , कहीं आपका पिता कौआ (काग) न बन गया हो । जब कौआ भोजन खा जाता है तो कहते है कि तेरे पिता या माता आदि जो मृत्यु को प्राप्त हो चुका है जिसके लिए ये सब क्रियायें की गई है । वह कौआ बना है ,इसका श्राद्ध सफल हो गया ।स्पष्ट हुआ कि वह व्यक्ति जिसका क्रिया कर्म किया था वह कौआ बन चुका है ।

श्राद्ध करने वाले पुरोहित कहते है कि श्राद्ध करने से वह जीव एक वर्ष तक तृप्त हो जाता है ।फिर एक वर्ष में श्राद्ध फिर करना है ।

विचार करें: –जीवित व्यक्ति दिन में तीन बार भोजन करता था । अब एक दिन भोजन करने से एक वर्ष तक कैसे तृप्त हो सकता है ? यदि प्रतिदिन छत पर भोजन रखा जाय तो वह कौआ प्रतिदिन ही भोजन खायेगा ।

दूसरी बात : –मृत्यु के पश्चात सर्व क्रियाएं गति (मोक्ष) कराने के उद्देश्य से की गई थी।उन अज्ञानी गुरुओं ने कौआ बनाकर छोड़ा । वह प्रेत शिला पर प्रेत योनि भोग रहा है। पीछे से गुरु और कौआ मौज से भोजन कर रहे है । पिंड भराने का लाभ बताया है कि प्रेत योनि छूट जाती है । मान लें प्रेत योनि छूट गई ।फिर वह गधा या बैल बन गया तो क्या गति कराई ।

नर से फिर पशुवा कीजै,गधा,बैल बनाई । छप्पन भोग कहां मन बौरे, कहीं कुरड़ी चरने जाई ।।

मनुष्य जीवन मे हम कितने अच्छे अर्थात 56 प्रकार के भोजन खाते है ।भक्ति न करने से या शास्त्रविरुद्ध साधना करने से गधा बनेगा ,फिर ये छप्पन प्रकार के भोजन कहां प्राप्त होंगे ,कहीं कुरड़ियो पर पेट भरने के लिए घास खाने जाएगा ।इसी प्रकार बैल आदि आदि पशुओं की योनियो में कष्ट पर कष्ट उठाएगा ।

Satsaheb

Vijay dubey

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"गुरु बिन मोक्ष नही"

गुरु के बिना भक्ति करना व्यर्थ प्रयत्न होगा । परमात्मा का विधान है जो सूक्ष्म वेद में कहा है :-

कबीर,गुरु बिन माला फेरते ,गुरु बिन देते दान।

दोनो ही निष्फल है चाहे पूछो वेद पुराण ।।

कबीर,राम कृष्ण से कोंन बड़ा ,उन्हों भी गुरु कीन्ह ।

तीन लोक के वे धनी ,गुरु आगे आधीन।।

भावार्थ :- गुरु धारण किये बिना राम नाम की माला फिराते (जपते)है और दान भी करते है । वे दोनों व्यर्थ है ।आपको किसी प्रकार का संदेह है तो अपने वेदों तथा पुराणों में प्रमाण देखें ।श्रीमद भागवत गीता चारो वेदों का  सारांश है। गीता अध्याय 2 श्लोक 7 में अर्जुन ने कहा है कि हे श्री कृष्ण ! में आपका शिष्य हूँ , आपकी शरण मे हूँ ।गीता अध्याय 4 श्लोक 3 मे श्री कृष्ण जी मे प्रवेश करके काल व्रह्म ने  अर्जुुुन   से कहा कि तू मेरा  भगत है । पुराणों में  प्रमाण है कि श्री रामचंद्र जी ने  ऋषि वशिष्ठ  जी से नाम  दीक्षा ली थी   और अपने घर व राज -काज मेंं गुरु  वशिष्ठ जी की आज्ञा लेकर कार्य करते थे ।श्री   कृष्ण जी  ने  ऋषि  संदीपनी जी से अक्षर  ज्ञान प्राप्त किया । तथा श्री कृष्ण जी के आध्यात्मिक गुरु  श्री दुर्वासा ऋषि जी थे ।

कबीर परमेश्वर जी हमे समझाना चाहते है आप जी तो श्री राम तथा श्री कृष्ण जी से तो किसी को बड़ा  अर्थात समर्थ नही मानते हो । वे तीन लोक के मालिक थे,   उन्होंने भी गुरु बनाकर अपनी भक्ति की ,मानव जीवन सार्थक किया । इससे सहज में ज्ञान हो जाना चाहिए कि अन्य व्यक्ति यदि गुरु के बिना भक्ति करता है तो कितना सही है ? अर्थात व्यर्थ है ।

गुरु के बिना देखा देखी कही सुनी भक्ति को लोकवेद के अनुसार भक्ति कहते है ।लोकवेद का अर्थ है ,किसी क्षेत्र में प्रचलित भक्ति का ज्ञान जो तत्व ज्ञान के विपरीत होता है । लोकवेद के आधार से यह दास श्री हनुमान जी, श्री राम जी ,श्री शिव जी, तथा देवी देवताओं की भक्ति करता था अतः आप जी से हाथ जोड़कर विनती करता हूँ कि तत्वज्ञान को आधार बनाकर भक्ति करो ।

सतसाहेब

विजय दुबे

Satsang

Song

There comes a time
when outer teachers are no more needed.
Your inner teacher takes over
And there is a sweet ongoing mantra or satsang or prayer taking over. 72 more words

Consciousness