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No person, no problem

We had a lovely meeting in Kingston at the Druids’s Head Pub yesterday, and it’s amazing how a spontaneous teaching can apparently arise through interactions with others. 451 more words

Non-duality

हम दिल के दिवाने, पंडित मस्ताने चले हैं, चले हैं, स्नान हो-हो

वार्ता
प्रेमियो मेले में सभी तरह के लोग जा रहे थे। एक टोली औरतो की गीत गाती जा रही थी। कुछ मस्ताने कह रहे थे। अरे भाई तुम कुछ गाते बजाते चलो कुछ लोग कहने लगे, ऐसा गाना गाओ कि दिल खुश हो जावे। अच्छा सुनिये गाना मस्ती में चूर हो जाओगे, कुछ साधु जन गुरू रविदास के पास बैठे देख रहे थे और कहने लगे।
गुरू जी आप भी चलो स्नान करने। रविदास ने कहा अरे भाई मैंने तो गंगा के नाम का प्रसाद भी एक पंडित के हाथ भेज दिया है। आप चले जाओ। अजी नहीं आपको चलना पडेगा। आपकी अति कृपा होगी। रविदास ने कहा अच्छा भाई चलो, तो साधू इस गाने की चैथी कली गाते हैं।
तर्ज-दो दिवाने दिल के
टेक-हम दिल के दिवाने, पंडित मस्ताने चले हैं, चले हैं, स्नान हो-हो
1. ओम नाम का ध्यान लगाके, माथे पै चन्दन लिपटा के
ले पुष्पो का थाल, और कन्धे जनेऊ डाल- चले हैं चले हैं
2. लोटा धोती हाथ में लेके, पतरा पोथी साथ में लेके (पतरा पोथी)
चले हैं गाना गाते और मन में खुशी मनाते, चले हैं चले हैं
3. गंगा का मेला लगा बड़ा भारी, नहाने जाते हैं नर नारी-(नहाने जाते)
चले हैं सभी जन, साहुकार निर्धन – चले हैं चले है।
4. बाबा जी चले ढोंग मिटाने, संग बिहारी गंगा नहाने – संग
चला सन्तों का लारा, ले ढोलक इकतारा, चले हैं चले हैं स्नान

गंगा में पत्थर वगाया, सतगुरू का ध्यान लगाया।

वार्ता
तो प्रेमियो पंडित लोग गंगा माई में अपने फूल तैराते हैं। ईश्वर की माया पंडितों के फूल डूब जाते हैं तो मंत्री कहता है, संत जी आप भी तैराओ अपने फूल। संत रविदास कहने लगे फूल तो पंडितों ने तैराए हैं। यहां गंगा के किनारे ये पत्थर की शीला पड़ी है अब कहां जाऊं और तैराने की क्या लाऊं, एक पत्थर का टुकडा उठा कर सतगुरू का नाम लेता है और गंगा माई को याद करता है। माता करिये सहाई तो सुनियो भजन के द्वारे।
तर्ज – कंकरया मार के जगाया

टेक- गंगा में पत्थर वगाया, सतगुरू का ध्यान लगाया।
स्वामी तू हरी ओम है।
1. कोई तुझे राम कैहे, कोई तुझे श्याम कैहे।
कहे ईसामसीह कोई इस्लाम कैहे हो।
स्वामी तूने, प्रभू तूने ये जहान बनाया, स्वामी तू हरी ओम।

2. बाल्मीकि को दरश दिखाए, सावित्री के पति जिवाए।
ध्रुव भगत को तार दिया प्रहलाद के प्राण बचाए हो।
अब के नम्बर, अबके नम्बर, हमारा भी आया,स्वामी तू

3. भगत तेरा सत्कार करे, तेरे नाम से प्यार करे।
समनदास के चरण कमल मैं श्रीचन्द प्रचार करे हो।
है गाना देशी है गाना देशी रंग फिलमी चढाया, स्वामी।

आने से इसके आए बहार, पाने से छाई खुशी अपार।

वार्ता : पे्रमियो मिसरानी कहती है कि आप कंगन को राजा को दे दो। राजा काफी माल देगा कोई ठग चोर नहीं पहनने देगा। ये पंडित की समझ में आ जाती है तो कंगन को राजा के पहुंचा देता है। राजा रानी को दे देता है रानी कंगन को पहन कर बड़ी खुश होती है और कहती है गाने के द्वारा
तर्ज -बडी मसतानी है मेरी महबूबा

टेक-आने से इसके आए बहार, पाने से छाई खुशी अपार।
बडा ही निराला है ये मेरा कंगना।
अमृत का प्याला है ये मेरा कंगना
1. चमके ये कंगन ऐसे जैेसे चमके गगन में सितारे
गम के ये बादल चले जाते हैं झुक झुक सारे नैनों का तारा ये कंगना।

2. दुनिया की कोई दौलत बदले ना इसको मैं लूंगी,
संखिया जो कोई मांगे, मांगा न उसको मैं दूूंगी।
प्राणों से प्यारा, दिल का सहारा, बड़ा ही निराला है ये मेरा कंगना

3. बन जांऊ रति से सुन्दर जब पहनंुगी इसको मैं नहाके,
राजा बिहारी मेरे जब देखेंगे मुझको वे आके।
मुस्कराऊंगी, शरमाऊंगी, बडा ही निराला है ये मेरा कंगना।

ठन्डी फुवार आई, बुन्दो की बौछार आई

तर्ज – मेरी प्यारी बहिनया

टेक- ठन्डी फुवार आई, बुन्दो की बौछार आई।
गऊं माता अन्दर आइए, खाइए खाइए तू दाना घास खाइए

1. भेस बदल कर गंगा माई, गऊं के रूप में रवि घर आई
दाना घास खिलाया,गर्म शाल उढ़ाया,माता शर्दी दूर भगाइए।

2. आराम से बैठ गई गऊ माता, रविदास उसको समझाता
न्यू बोले ब्रह्म ज्ञानी,गंगा महारानी तु असली रूप में आइए, खाइए
3. झटपट पलट गई थी काया, देव रानी का रूप दिखाया
न्यु बोली गंगे माई, तू मांग मेरे भाई, जो वस्तु तुझको चाहिए

4. समनदास कहे काम ये मेरा, उठके गंगा रोज सबेरा
करूं पूजा तुम्हारी, श्रीचन्द प्रचारी, जब याद करूं जभी आइए,
खाइए, खाइए, तू दाना घास खाइए

लगी रहानदे लगी रहानदे, ध्यान जमावन दे

वार्ता
संत कबीर गुरू रविदास के सतसंग मे आता है। कुछ देर बाद कबीर को प्यास लग जाती है तो वे पानी मांगते हैं रविदास कठोती से लोटा भर कर दे देता है। तो संत कबीर उस जल को गंदा समझ कर अपने कर मंडल में लेते हैं। सत्संग समाप्त होते ही कबीर अपने घर आते हैं और कमाली से पानी मांगते हैं। कमाली कहती है। पिता जी गुरू जी के सत्संग का प्रसाद मुझे दे दो। कबीर कहता है प्रसाद बटने से पहले चला आया । मुझे प्यास लगी थी पानी मांगा रविदास ने कठोती से गंदा पानी दे दिया। कमाली कहती है वो पानी कहां हैं कबीर ने कर मंडल में लिया था। रास्ते में मुंधा दिया तो प्रेमियो कर मंडल से तीन बूूंदे कमाली को मिली। वे तीन बूंद चाटने से कपाट खुल गए और तीन लोक का ज्ञान कमाली को हो गया। देखती है मुलतान शहर में आग लगी है तो कमाली डोल भर भर आग बुझाती है। कबीर इन्तजार करके कुंए पर आता है। और कमाली को धमकाता है कमाली इस गाने द्वारा कहती है।
तर्ज -देहाती

टेक-लगी रहानदे लगी रहानदे, ध्यान जमावन दे।
मुलतान शहर मैं आग लगी है मैने बुझावन दे।।

1. मतना समझ मखोल, मेरे तो हुई पेट में होल।
भर भर के कुंए से डोल, तू मैंने बगावन दे।।

2. मुझे पल पल होती देर, ऐसा वक्त मिलेना फेर।
जल के होजा छाई के ढेर, तू महल बचावन दे।।

3. और किसान भाग रहे जंगल मंे, छोड छोड के अपने हल से
रविदास के अमृत जल से प्यास बुझावन दे।।

4. अग्नि बनी गजब गोला, इसमें झूठ नहीं एक तोला
कहे श्रीचन्द मत कर रोला, सुर में गावन दे।
मुलतान शहर में आग लगी है मैने बुझावन दे।।