Tags » Save Girl Child

Day 41 of #100HappyDays

When you kill a girl child, You kill many others.

Happy to support #BeWithBeti movement!

Beti in Hindi means Daughter. It is a movement against female foeticide which is rampant across India.

17 more words
My #100HappyDays

"Beti bachao Beti padhao"

Beti bachao beti padhao this is what the news channels and dailies in the nation are covering these days for the nation realized it, though, too late that we need to save our girl child the nation which was otherwise busy in saving ‘Tigers’ 285 more words

लड़कियां बराबर नहीं ज्यादा ताकतवर हैं @NanhiKali @savegirlchildin @BetiPadhao @femalefoeticide @HappyFeminist @deepikapadukone

वो तमाम लोग जो वक्त वक्त पर बेटी-बचाओ आंदोलन से जुड़े हुए हैं । उनसे कुछ अनुभव शेयर कर रहा हूं । देश में टाइगर बड़ गया तो हो हल्ला हो रहा है । लेकिन बेटियों के नाम पर सामूहिक हत्या का जो प्रपंच चलाया जा रहा है , उसके लिये सरकार से ज्यादा जिम्मेदार हमारे परिवार हैं । सरकार सिर्फ जनसंख्या के नाम पर विज्ञापन कर सकती है,वो कंन्डोम पहनाने खुद नहीं आ सकती है ।

मुझे आज भी हमारी ज्योग्राफी की टीचर की वो बात नहीं भूलती है कि अगर घर की पहली संतान लड़का हुआ तो हो सकता है कि वहां दूसरा बच्चा ना हो । लेकिन अगर वो लड़की है तो उसके छोटे भाई का पैदा होना उस पर और उसकी मां पर ज़ुल्म बनकर फूट पड़ता है । मेरे कई जानकारों के 5 से 7 बच्चे हैं और छह लड़कियों के बाद एक लड़का हुआ है ।

बच्चा जनना जैसे एस.एम.एस करने जैसा हो गया है । उस औरत के बारे में सोचकर भी डर लगता है जो सात या आठ सालों तक सिर्फ बच्चे ही पैदा करती रहती है । कितना कुछ टूटता होगा उसके मन में इसकी कल्पना भी शायद दुस्वप्न से ज्यादा खतरनाक होगा। और फिर ऐसे परिवारों का हश्र ये होता है कि जिस बेटी को बेटे की चाह में सिर्फ पैदा कर दिया गया वही 10 लोगों के परिवार का टयुशन पढ़ा कर पेट पालती है , वही रोज़गार कमा कर सबकी हसरतें पूरी करती है और खुद टूटती जाती है ।

विज्ञापनों मे एक तरफ कामकाजी महिलाओं का चेहरा उभारा जा रहा है , वहीं गर्भनिरोधकों के विज्ञापनों मे अभी भी बिकनी पहन कर लड़कियो को परोसा जा रहा है ।

दरअसल उन्हें फर्क नहीं पड़ता , उन्हें लोगों की मैमोरी में घर करना है , ऐसे में विज्ञापनों का समाजशास्त्र भी बेहद नकली है क्योंकि सब कुछ खरीद-बेचने तक ही सीमित है ।

घरोें मे छुट्टी  ना लेने वाली मांओं , मामियों, बुआओं इत्यादि की हालत तो उससे भी गंभीर है । जो लेबर लॉ के दायरों का भी हनन करती हैं । रोज़ उठकर तीन वक्त का खाना छह वक्त की चाय और फर्माइशों के बीच इनकी जिंदगी कब गुज़र जाती है ये पता भी नहीं चलता है । बच्चे भी बड़े होकर जब कमाने लग जाते हैं तब मां के लिये नौकरानी ला देते हैं , वॉशिंग मशीन ला देते हैं लेकिन खुद हाथ बंटाने में हिचकिचाते हैं ।

मैंने जब से खुद खाना बनाना सीखा है , जिसमें मेरी मां और एक महिला मित्र का खास योगदान है तब से मेरी सोच अपने आप ये समझ गई है कि खाना बनाना किसी मैनेजेरियल टास्क से कम नहीं है , मल्टीटास्किंग , प्यार , सम्मान के बाद जाकर एक बेहतर डिश तैयार होती है । ऊपर से अगर आप अपने हिस्से के बर्तन भी धो दें तो कितनी राहत की बात है ।

अब ऐसे में भी लड़कियों के खिलाफ होती हिंसा के लिये हम सरकारों को ही जिम्मेदार ठहराएंगे तो ये बेहद दुखद बात है । सरकारें सिर्फ अभियान चला सकती हैं । बदलना हमें पड़ता है । कोख में बेटी मारने वालों ज़रा इस बात को गौर करें कि वो एक वक्त पर तीन औरतों की हत्या करते हैं जिसमें मां की आत्मा,कोख की बच्ची और आसपास काम करते हुए ये देखकर चुप रहती उस ‘एक महिला’ के मन की हत्या है जो इस बर्बरता को होते देखती है ।

ऐसे में सिर्फ चिता को आग देने के लिये बेटा जनने वाले पिता के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही होनी चाहिए । कई बार मुझे ये बात सच में नहीं आती है कि अगर कोई मर गया तो उसे क्या फिक्र है कि उसे जलाया गया या नहीं , उसे गाड़ा गया या नहीं क्योंकि लाशें धर्म नहीं जानती हैं , ये तो जीवित लोगों का ढ़कोसला है । जो जीते जी मरने की सोच रहा है वो कैसा जीवित है ?

हमेंं बाज़ार केंद्रित मडर्स डे से ज्यादा जरुरत एक ऐसे दिन की है जब सच में हम इस बात पर गौर करेंगे कि जितनी बेटियां हमारे देश में जन्म से पहले या बाद में सामाजिक शोषणों का शिकार होकर मारी गई हैं उनके नाम अगर देश के मकानों की ईंटों पर लिखने शुरु किये जायें तो शहीदों की शहादत के बाद बना इंडिया गेट बेहद बौना हो जाएगा ।

तमाम लड़कियां जिन्हें ढ़कोसलों , विज्ञापनों , राजनीतियों और परिवारवाद के नाम पर बहलाया जाता है वो ये बात अच्छे से जानती हैं कि वो ज्यादा ताकतवर हैं , वो बराबरी के कीर्तीमानों से काफा आगे हैं ।

एक ऐसा दिन मनाया जाना चाहिए जब देश की हर महिला स्ट्राइक पर जाये चाहे वो ग्रहणी हो या कामकाजी और कहे कि देखो हमारे बिना एक दिन राष्ट्र तो क्या घर नहीं चल सकता तो तुम दुनिया क्या चलाओगे !

India

Female foeticide: Save the Girl Child!

Female foeticide is suicide, Save the girl child and insure the future.
Save girl child else your son will be forced to be a gay. 40 more words

Stayaware

अजन्मी कन्या की पुकार

माँ मुझे मत मार तेरी अजन्मी कन्या करे पुकार
तू जननी है करुणामयी होने देगी कैसे अत्याचार
यह बात हूँ जानकर मै अत्यंत बेहाल
जाने वाली है छुटकारा पाने तू अस्पताल
यह कैसे मेरी माँ तू होने देगी
मेरी नाजुक शारीर में नश्तर चुभोने देगी
लिख नहीं सकती नहीं सकती हूँ मै बोल
रहने दे मुझे अपने में मन की आंखे खोल
एक गोली लेने से मै जाउंगी तुमसे निकल
गिले हांथो से जिस तरह साबुन जाती है फिशल
तेरे आँगन में छम छम खेलु यही अरमान
देखूं मै भी अपनी आँखों से धरती और आसमान
न मांगूंगी नए पायल नए वसन
खाके रह लुंगी पड़ी भैया दीदी के जूठन
तुझ पर न बोझ बनूँगी न बढ़ाउंगी तेरा खर्चा
खुद से करुँगी पढाई अच्छा बनाउंगी पर्चा
दहेज़ की तू चिंता न कर कुछ बन कर दिखाउंगी
मिल जायेगा अच्छा वर खर्च तेरा न बढ़ाउंगी
उड़ जाउंगी तेरे आंगन से पराई होकर
याद करेगी मुझे तब तू रो रोकर
माँ मुझे आने दे दुनिया में बसने दे घर संसार
Like us on Facebook

The other side of my country!

The first cry of a newborn baby, the opening of innocent but curious little eyes, aren’t these sights of extreme joy and excitement! So why is this overwhelming experience snatched from many? 312 more words

Articles

Breaking Free

It was the same day, the same me, the same earth, the same sky, but I felt like a bird, a bird who could fly high up in the sky, who could soar up and down with the wind, it was my first flight, my first step out of the cage. 365 more words

Writings