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WSS Hindi Press Release on Kashmiri Women's Day of Resistance

कश्मीर हमारा पर कश्मीरी किसके? कश्मीरी महिलाओं के प्रतिरोध दिवस २३ फरवरी को एकजुटता की जरूरत

भारत के सेना प्रमुख जनरल रावत ने कश्मीर के नौजवानों को पिछले दिनों चेतावनी दी कि अगर वे किसी प्रकार से भी सेना के काम के रास्ते में आएंगे तो उन्हें भी राष्ट्र विरोधी मानकर उनके साथ सख्त कार्यवाही की जाएगी. पर इसमें तो कुछ भी नया नहीं है. कश्मीर पर हक़ जताने की भारत की मुहीम तो दशकों पुरानी है. वहां पर सेना और विभिन्न अर्धसैनिक दलों की भयंकर मौजूदगी भी उतनी ही पुरानी है. यही नहीं १९९० से सेना को यह अधिकार भी क़ानूनन रूप से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के तहत मिला हुआ है – सेना और अर्ध सैनिक बल किसी भी घर या जगह की तलाशी ले सकते हैं, मात्र शक की बिना पर किसी पर गोली चला सकते हैं और किसी को भी बगैर वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं. इस क़ानून के तहत की गयी कार्यवाई जवाबदेही से पूरी तरह से मुक्त है. साथ ही अगर सेना कोई ज्यादती करती है तो भी उसपर मुक़दमा चलाने से पहले सरकारी आज्ञा लेना पड़ती है.सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी बताती है कि भले ही कितना ही गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन रहा हो सेना पर केस चलाने की इजाजत एक बार भी नहीं मिली है.

मानो कानूनी छूट मिलते ही सशस्त्र बालों ने उसका दुरुपयोग करना शुरू कर दिया. २३ फरवरी १९९१ क़ी रात को राजपुताना राइफल्स रेजिमेंट ने कुपवाड़ा जिले के कुनान और पोशपोरा नाम के दो गांवों में तांडव मचाया. वहाँ ये टुकड़ियां तलाशी और पूछ–ताछ के लिए गयी थीं. आदमियों को पकड़ कर गांव से बाहर निकाला और उनके साथ हिंसा क़ी और उन्हें कठोर यातना भी दी. पर साथ ही गांव में घुसकर बच्चियों और हर उम्र क़ी औरतों के साथ बलात्कार भी किया.पत्रकारों, गांववालों और महिला संगठनों क़ी जद्दोजहद के बावजूद सेना के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई.

याद रखना होगा कि किसी भी हाल में कानून में किसी सैनिक को बलात्कार करने की कोई छूट नहीं मिली है. पर 1994 क़ी संयुक्त राष्ट्र संघ क़ी एक रिपोर्ट बताती है कि 1990-92 के बीच सुरक्षा बलों द्वारा ८८२ बलात्कार किये गए. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार १९९०–९९ के बीच सुरक्षा बलों को १०३९ केसों में मानवाधिकार के उल्लंघन का दोषी पाया गया. वारदातें तो अवश्य ज्यादा रही होंगी.

२० सालों से भारतीय सेना कुंण पोशपोरा क़ी सच्चाई से मुंह मोड़ती रही. प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए भी गांववालों को संघर्ष करना पड़ा. प्रशासनिक असमर्थता दिखाते हुए जांच भी कई बार टाली गयी. और जब जांच हुई तो बड़ी अनिच्छा से. और ८० औरतों क़ी गवाही और संचार माध्यमों क़ी फौरी रिपोटों के बावजूद भी इसे जांच ने एक फर्जी मामला बता दिया. बी जी वर्गीज क़ी अध्यक्षता में जो जांच समिति बनी उसने इस मामले को व्यापक धोखा कह दिया.

अंततः कहानी २०१३ में बदली जब वहां क़ी अदालत ने यह मामला फिर से खुलवाया. २२ साल तक भुक्तभोगियों के जख्म हरे ही रहे. २३ फरवरी का दिन यादगार बन गया उस संघर्ष का जो एक पीढ़ी से औरतें करती आ रही हैं और अब जाकर कुछ पाने क़ी उम्मीद रख सकती हैं. यह दिन कश्मीरी औरतों के प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाया जाता है.

कश्मीरियों के साथ इन २७ सालों में जो हुआ वह पूरे देश को शर्मसार करने के लिए काफी है. मात्र २०१६ में जन विरोध को इस तरह कुचला गया कि सुरक्षा बलों के हाथों १०० से अधिक लोग मारे गए और हजारों की तादाद में जख्मी हुए. इसी तरह से झूठी मुठभेड़ के खिलाफ २०१० में जन आंदोलन को कुचला गया था तब भी १०० से ज्यादा लोग मारे गए थे और हजारों घायल हुए थे. इसके पहले से वहां सेना इतने आदमियों को उठा चुकी है जो दशकों से गयब हैं कि वहां औरतों को संबोधित करने का एक नया नाम पैदा हो गया है – आधी विधवा – वे औरतें जो नहीं जानती कि उनके पति कहाँ हैं, जिन्दा कैद में हैं या मार दिए गए हैं. हज़ारों लोगों पर सेना का आक्रमण आतंकियों पर नहीं कश्मीरियों पर हमला है.

बलात्कार के मामले को रफा–दफा करने वाले श्री वर्गीस ने भी यह बात मानी कि कश्मीर में भारतीय सेना का व्यवहार एक कब्जेधारी सेना जैसा है जो कश्मीरियों को अपना दुश्मन मानती है और उन्हें घेरेबंदी में रखती है. कब्जाधारी सेना ने हर युद्ध में हारे हुए देश की औरतों का बलात्कार भी व्यापक पैमाने पर किया है और यही हकीकत कश्मीर की भी है. और आज भारत के सेना प्रमुख भी आम लोगों को देश विरोधी करार देकर उन्हें खुले आम धमकी दे रहे हैं.

सेना की मौजूदगी ने क्या हासिल किया वह कह पाना तो मुश्किल है पर वहां की आम जनता को इतना भड़का दिया कि वह अब खुले आम रावलजी की धमकी को धता बता रही है और दो दिन के भीतर ही उसने सुरक्षा बलों को बगैर कार्यवाही के लौटने पर मजबूर कर दिया.

शायद यह आतंरिक विरोध को दबाने का नया सैन्य तरीका हो पर यह स्पष्ट रूप से कश्मीर और कश्मीरियों को अलग–अलग मानता है और कश्मीरियों की कीमत पर भौगोलिक प्रभुत्व चाहता है. पर सच्चाई तो यह है की कश्मीरियों के बिना कश्मीर की कोई अहमियत नहीं ऐसे तो बर्बरता से दुनिया का कोई भी हिस्सा जीता जा सकता है. पर अगर कश्मीर और कश्मीरी दोनों चाहिए तो जवाब सैन्यीकरण में नहीं मिलेगा.

एक ही मार्ग खुला है जो वहां के लोगों के हक्कों की लड़ाई में साथ देने का है. तो धमकियों से परे हट कर कश्मीरी औरतों के प्रतिरोध में शामिल होकर उनके लिए भी देश को निर्भया जैसी एकजुटता दिखानी होगी.

Security Forces

AUD & WSS event to Commemorate Kashmiri Women's Day of Resistance

Ambedkar University, Delhi and Women Against Sexual Violence and State Repression invite you to observe and commemorate the Kashmiri Women’s Day of Resistance and the horrific mass sexual violence unleashed by the Indian Army against the villagers of Kunan and Poshpora, Kashmir. 1,097 more words

'Bearing Witness' - A WSS Book on Sexual Violence in South Chhattisgarh

This book is a comprehensive compilation of the incidents of sexual violence in South Chhattisgarh, drawing on independent investigations or joint fact findings by WSS. 40 more words

Chhattisgarh

WSS Press Note on Impact of NHRC & Action Taken by the Government of Chhattisgarh

Women Against Sexual Violence and State Repression
PRESS NOTE
2 February 2017

WSS applauds the “NHRC Effect”
Government of Chattisgarh takes action to restore rule of law in Bastar… 1,055 more words

Chhattisgarh

WSS Press Note on the Attack on Bela Bhatia

Women Against Sexual Violence and State Repression condemns the recent attack against Bela Bhatia, a researcher and activist, based in Bastar, Chhattisgarh. On the 23rd of January, 2017, a group of 30-odd men attacked Bela near her house. 648 more words

Chhattisgarh

Press Release on Emergency in Bastar by WSS & Citizens For Peace And Justice in Chhattisgarh

WSS and Citizens for Peace and Justice in Chhattisgarh had organized a press meet in Delhi on 12th January 2017 to highlight the emergency-like situation in Chhattisgarh and the brazen attacks on human rights defenders demanding accountability from the state and police department. 71 more words

Chhattisgarh

German troops continue to train Peshmerga and Iraqi forces to fight IS

Germany has extended its Bundeswehr troops in northern Iraq for one more year, continually training the Peshmerga security forces and the armed forces of Iraq in a move to step up the fight against the notorious terrorist organization Islamic State (IS). 360 more words

Defense & Disasters