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हमराही

हर्र…हुट…हुट…. उस शाम झुंड से अलग हटकर दूसरे के खेत में फसल खाने घुस गई चार गायों को संभालने में उदित और मनोहर परेशान हुए जा रहे थे। दोनों दोस्त पढ़ाई में बेहद होशियार थे और अपने अपने किसान पिता की मदद भी उतनी ही किया करते थे। गर्मी के मौसम में स्कूल सुबह 10 बजे की जगह 7 बजे लगता था। रोज सुबह स्कूल जाने से पहले वे अपनी अपनी गायों को चारा डालकर जाते थे और दोपहर में घर आने के बाद उन्हें अपने हाथों से पानी भी पिलाते थे। करीब 3-4 बजे दोनों दोस्त अपनी अपनी गायों को लेकर पास के बहियार में चले जाते थे। शाम में घर आने के बाद भी दोनों साथ पढ़ाई करते थे। कभी उदित मनोहर के घर आ जाता था तो कभी मनोहर उदित के घर। उस शाम उन्हें घर वापस लौटने में थोड़ी देरी हो गई थी। गायों ने बड़ा परेशान किया था। पास के हरि काका के खेत में घुसकर थोड़ी फसल खराब कर दी थी। आज शाम उदित की बारी थी, उसे मनोहर के घर जाकर पढ़ाई करनी थी। उदित की मां सुषमा ने सांझ दिया और इसके बाद हल्का फुल्का नाश्ता करके उदित मनोहर के घर चला गया। उस शाम मनोहर के घर पर रौनक नहीं थी। थोड़ा सन्नाटा था। मनोहर अन्य दिनों की तरह लालटेन लेकर पढ़ने तो बैठ गया था, लेकिन उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। उदित को देखने के बावजूद भी उसमें उत्साह का संचार नहीं हुआ था। उदित ने पूछा तो पता चला कि मनोहर के मामा आए हैं और उसे लेकर धनबाद जाएंगे। मनोहर अब वहीं पढ़ेगा। उसके मामा धनबाद में शिक्षक थे और मनोहर को वहीं पढ़ाना चाहते थे। मनोहर के मां-पापा की भी इसमें सहमति थी। उन्हें पता था कि उनका बेटा पढ़ाई में होशियार है और गिरीडीह के उनके गांव पथरिया में पढ़ाई की कोई खास सुविधा उपलब्ध नहीं है। यह खबर सुनकर जितना मनोहर को सदमा लगा था, उतना ही उदित को। दोनों दोस्त कभी भी अलग नहीं रहते थे। मनोहर को कल सुबह ही धनबाद जाना था। यह सबकुछ पहले ही तय हो चुका था। मनोहर से यह बात छिपाई गई थी ताकि वो ज्यादा विरोध न कर पाए। उस रात उदित वहीं सो गया था। उदित के मां-पापा को भी इस बात की जानकारी हो गई थी। सुबह मनोहर की मां ने आकर दोनों को जगाया। दोनों आंखें मूंदकर लेटे रहे, जैसे आंख नहीं खोलेंगे तो सुबह नहीं होगी। उदित सोच रहा था कि आज मनोहर चला जाएगा, पता नहीं कितने महीने बाद आएगा और वो भी कुछ दिनों के लिए। वो मनोहर के बिना कैसे रह पाएगा। मनोहर की भी हालत कुछ ऐसी ही थी। खैर, मनोहर को आज जाना था और रिक्शावाला भी आज आधे घंटे पहले ही आ गया था। दोनों उस वक्त छठी कक्षा में पढ़ते थे और उन्हीं दोनों में से कोई एक कक्षा में अव्वल आता था। दिक्कत यही थी कि उनके गांव में जो स्कूल था उसमें सिर्फ आठवीं तक की पढ़ाई होती थी और गांव के ज्यादातर बच्चे उसके बाद पढ़ाई छोड़ देते थे। शुरू में मनोहर के मां-बाप भी उसे दूर नहीं करना चाहते थे, लेकिन मनोहर के मामा समझदार थे और बड़ी जिद करके अपनी बहन और बहनोई को मनाने में सफल हो पाए थे। उदित का कोई करीबी रिश्तेदार पढ़ा लिखा नहीं था और ज्यादातर रिश्तेदार ऐसे गांवों में ही रहते थे, जहां पथरिया की ही तरह पढ़ाई की सुविधा नहीं थी। देखते ही देखते वो पल भी आ गया था जब दोनों दोस्तों को अलग होना था। सुबह 11 बजे की बस पकड़नी थी और रिक्शे से पास के कस्बे के बस स्टैंड तक जाने में लगभग 1 घंटा लगता था। मनोहर रिक्शे पर तो बैठ गया था, लेकिन शायद उसकी आत्मा उदित के पास रह गई थी। कुछ उसी प्रकार उदित की आत्मा मानो मनोहर के साथ धनबाद चली जा रही थी। जीवन किसी के बिना नहीं ठहरता। धीरे धीरे तीन साल बीत गए मनोहर धनबाद के जिला स्कूल में नवीं कक्षा में पढ़ रहा था, जबकि उदित की पढ़ाई आठवीं के बाद ही छूट गई थी। मनोहर अब छुट्टियों में भी कम ही आता था। उदित ने घर का काम काज पूरी तरह से संभालना शुरू कर दिया था। उसकी बहन उमा की शादी इसी महीने होने वाली थी। उमा की शादी के लिए पैसे जुटाने थे। लड़के वालों ने एक लाख रुपए मांगे थे। उमा की शादी अच्छे लड़के से करानी थी। लड़का संपन्न था। दस बीघे जमीन थी और मां सरकारी स्कूल में चपरासी थी। अब उदित के पिता हरिवंश के पास गांव में रहने वाले कारू साहूकार के पास जाने के अलावा अब कोई रास्ता नहीं बचा था। कारू से 5 प्रतिशत मासिक ब्याज दर पर 50 हजार रुपए मिल गए। किसी तरह से शादी संपन्न हुई। मनोहर को उसके मामा ने शादी में नहीं आने दिया क्योंकि दस दिनों बाद उसकी परीक्षा थी। मनोहर उमा को अपनी बहन की तरह मानता था। मनोहर अकेला भाई था। उसके लिए उमा ही बहन थी और उदित ही उसका भाई था। उदित को यह बुरा लगा था कि उमा की शादी में मनोहर नहीं आया था। इधर, शादी तो ठीक से संपन्न हो गई, लेकिन उदित व उसके परिवार के लिए सूद की रकम चुकाना टेढ़ी खीर थी। पहले महीने ही सूद की रकम में 500 रुपए कम पड़ गए। कारू नाराज हो गया और गुस्से में उदित के पिता को गालियां देने लगा। उदित को गुस्सा आ गया और उसने पत्थर का एक टुकड़ा कारू की ओर दे मारा। इससे नाराज कारू ने अपने नौकरों से कहकर उदित की जमकर धुनाई करा दी। उन दिनों शहर से कोई शनत दा आए थे और लोगों को उनके अधिकारों की बात बताते थे। यह बात शनत दा को पता चली तो वे उदित के घर पहुंचे और उन्हें सूद की रकम देने से मना करने लगे। शनत दा ने कहा कि किसी प्रकार 50 हजार रुपए चुका दो, लेकिन सूद की रकम नहीं देनी है। उदित के पिता इससे सहमत नहीं थे, लेकिन उदित को शनत दा की बात जंच रही थी। वो दूसरी सुबह शनत दा के साथ कारू के घर गया और दो टूक शब्दों में कह दिया कि वो सूद की रकम अब नहीं भरेगा और दो साल के भीतर भीतर उसका मूल धन चुका देगा। कारू ने इसका विरोध किया तो शनत दा के साथ मौजूद कुछ लोगों ने कारू की धुनाई कर दी। कारू के नौकर लाठी लेकर निकले तो शनत दा के साथ मौजूद लोगों ने अपनी कमर में खोसा देसी कट्टा निकाल लिया और कहा कि अपना पैसा भूल जाओ। शनत दा नक्सली नेता थे। उदित को यह सब बातें नहीं पता थीं। उसे तो बस पता था कि शनत दा गरीबों के मसीहा हैं। घरवालों की नाराजगी के बावजूद अब उदित रोज शनत दा से मिलने लगा और उनके कहे के मुताबिक उसने ‘इंसाफ की मसाल’ अपने हाथों में थाम ली थी। उसे लगा था कि गांव में वो गरीबों की आवाज बन पाएगा। एक दिन अचानक शनत दा ने उसे रात को जगाया और गिरीडीह-धनबाद रोड पर साथ चलने को कहा। उदित उनकी टोली के साथ हो लिया। उदित आज भी उस खौफनाक रात को भूल नहीं पाया था। उस रात शनत दा व उनकी टोली ने सड़क पर गुजर रही एक बस में लूटपाट की थी और विरोध करने पर एक व्यक्ति की हत्या भी कर दी थी। इस घटना से दुखी उदित ने उस वक्त तो कुछ नहीं कहा था, लेकिन वापस आने के बाद शनत दा से सवाल पूछा था। उदित ने पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? शनत दा ने उदित से कहा कि अमीरों को लूटकर गरीबों में बांटना कोई गलत काम नहीं है और इसके रास्ते में आने वाले लोगों को हटाने में भी कोई बुराई नहीं है। आठवीं पास उदित के किशोर मन को शनत दा ने कुछ इस कदर अपने वश में कर लिया था कि उस दिन से उदित शनत दा का होकर रह गया। दस दिनों बाद फिर से लूटपाट की गई और उदित ने इसमें बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था। शनत दा उदित के काम से खुश हुए थे। गठीले बदन वाला, फुर्तीला उदित अकेले ही कई लोगों पर भारी पड़ा था। उदित को नहीं पता था कि शनत दा ने उन लूटे हुए पैसों का क्या किया। लेकिन उसे इतना पता था कि ये पैसे किसी गरीब की भलाई में लगेंगे। उदित अब न केवल शनत दा का खास हो गया था, बल्कि हथियार चलाने की ट्रेनिंग लेने पास के जंगल में चल रहे कैंप में भी जाया करता था। देखते देखते सात साल बीत गए। उदित अब एरिया कमांडर बन गया था और शनत दा के पास अब पूरे झारखंड की जिम्मेदारी थी। उधर, मनोहर स्टेट बैंक में पीओ बन गया था और वाराणसी में पोस्टेड था। उदित क्या कर रहा है, इसकी जानकारी उसके गांव में तो क्या उसके पिता को भी नहीं थी। उदित पिछले छह साल से गांव नहीं आया था। आखिरी बार वो तब गांव आया था, जब उसकी मां की मौत हुई थी। घर में पिता अकेले थे, लेकिन उदित को तो गरीबों की चिंता थी। एक बार कुछ पुलिसवाले आए थे और उदित के बारे में उसके पिता से पूछताछ की थी, लेकिन उदित के पिता को आज तक नहीं पता था कि आखिर पुलिस ने उदित के बारे में जानकारी क्यों मांगी थी। मनोहर को भी नहीं पता था कि उदित कहां है और क्या कर रहा है। पथरिया गांव में दशहरा बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता था। मनोहर कई सालों से दशहरा में अपने गांव नहीं गया था। इस बार उसने तय किया था कि वो छुट्टी लेकर दशहरा में अपने गांव जाएगा। उदित का तो पता नहीं था, लेकिन उदित की बहन उमा से उसकी फोन पर बात होती थी। उमा भी इस बार दशहरा में अपने मायके आ रही थी। उदित की मां को गुजरे छह साल बीत चुके थे लेकिन उसके बाद उदित कभी अपने पिता हरिवंश का हाल चाल जानने भी गांव नहीं आया था। हर महीने किसी न किसी नई जगह से एक हजार रुपए मनिऑर्डर भेज दिया करता था। उसके पिता उस एक हजार रुपए को अपने ऊपर खर्च नहीं करते थे, बल्कि गांव के चार बच्चों को पढ़ाई के लिए यही पैसे दे दिया करते थे। उन्हें इस बात का गुस्सा था कि उदित उनसे मिलने भी नहीं आता, लेकिन इस बात की खुशी भी थी कि उनका बेटा बढ़िया कमा रहा था और हर महीने उन्हें पैसे भेज दिया करता था। उनकी जीविका तो थोड़ी सी जमीन पर खेती करके चल जाया करती थी, सो वे उदित द्वारा भेजे गए पैसे को गरीब बच्चों की पढ़ाई में लगा दिया करते थे। उन्हें पता था कि उनका उदित होनहार छात्र रहा था और पैसों की कमी की वजह से आठवीं से आगे की पढ़ाई नहीं कर पाया था। उदित गरीबों की सेवा के लिए नक्सली बना था, लेकिन आज तक उसने गरीबों के लिए खुद कुछ नहीं किया था। सारे पैसे शनत दा को भेजे जाते थे। शनत दा न जाने कौन से गरीब की सेवा करते थे। पर उदित को उन पर पूरा भरोसा था। वहीं, मनोहर भी हरिवंश की ही तरह गांव के चार बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाता था। दुर्गा पूजा की अष्टमी तिथि को एक बार फिर से उदित ने लूटपाट की योजना बनाई थी। उसने शनत दा से सुन रखा था कि अष्टमी तिथि को अपना काम जरूर करना चाहिए, इससे काम सिद्ध होता है। पता नहीं यह कैसी मान्यता थी? अत्याचारी महिषासुर को मारने वाली मां दुर्गा भला ऐसे कामों का क्या कोई मीठा फल देती? उदित ने पिछले साल दुर्गा पूजा की अष्टमी तिथि को भी धनबाद-पटना पैसेंजर ट्रेन में लूटपाट की थी और विरोध करने पर एक महिला की भी हत्या कर दी थी। वो अपने गले से सोने की चेन निकालने नहीं दे रही थी। आज अष्टमी की रात थी। तय योजना के मुताबिक उदित अपने सशस्त्र सहयोगियों के साथ गिरीडीह-धनबाद सड़क पर एक सुनसान जगह पर खड़ा था। उन्होंने सड़क पर कोलतार के ड्रम रख दिए थे। रात के 11.30 बजे धनबाद से देवघर जा रही बस वहां से गुजर रही थी। इस बस में पिछले 12 सालों में 5 बार लूटपाट हो चुकी थी, लेकिन पता नहीं क्यों स्थानीय प्रशासन और बस मालिक ने इसे नियति मान लिया था और बस के समय में परिवर्तन कराने की भी जरूरत नहीं समझी थी। बस ड्राइवर हरमू ने जैसे ही बीच सड़क पर पड़े कोलतार के ड्रमों को देखा वो बस को रोकने के लिए ब्रेक पर लगभग चढ़ गया। उसे शक हो गया था कि कुछ गड़बड़ है। बस के रुकते ही कुछ हथियारबंद लोगों ने बस को घेर लिया। सभी के चेहरे काले कपड़े से ढंके हुए थे, सिर्फ आंखें नजर आ रही थीं। बस में बैठे सभी लोगों ने हथियारबंद लोगों के कहने पर अपने कीमती सामान देने शुरू कर दिए। उसमें से कुछ गरीब मजदूर भी थे, जिन्होंने बड़ी मुश्किल से साल भर बाहर रहकर कुछ पैसे इकट्ठा किए थे और अब त्योहार में अपने अपने गांव जा रहे थे। खैर नक्सलियों को इससे क्या? उन्हें तो ‘गरीबों’ की सेवा करनी थी। पता नहीं वो कौन से गरीब थे और इन गरीबों से कैसे अलग थे? बस में बैठे एक युवक ने अचानक इस लूटपाट का विरोध करना शुरू कर दिया। उस युवक को हथियारबंद नक्सलियों ने जमकर पीटा और घसीटते हुए बस के नीचे उतारकर उदित के सामने लाकर पटक दिया। उदित के सामने औंधे मुंह पड़ा वह युवक दर्द से कराह रहा था। उदित ने अपना पैर उस युवक की पीठ पर रख दिया और बंदूक की बट से उसके कंधे पर जोर से मारा। वह युवक भी डील डौल में उदित की ही तरह था, लेकिन वो अकेला था। उसकी सांसें तेज हो गई थीं। उसने टूटते हुए स्वरों में कहा कि यह काम ठीक नहीं है। मेहनत करके कमाओ, लूटकर नहीं। उदित ने उस युवक को डांटते हुए कहा कि हम पैसों के लिए तुम्हें नहीं लूटते। हम नक्सली हैं और तुम अमीरों को लूटकर गरीबों की सेवा करते हैं। उदित अब और ज्यादा बातचीत के मूड में नहीं था। उसने बंदूक की नाल उस युवक की पीठ की ओर मोड़ दी, लेकिन उदित किसी की पीठ पर वार नहीं करता था। वह खुद को बहादुर समझता था। लेकिन पता नहीं तब उसकी बहादुरी कहां चली जाती थी, जब वो एक निहत्थे पर वार करता था? आज शायद जमीन पर पड़े युवक से उसने दो दो हाथ किए होते तो मुंह की खाई होती। खैर, उसने उस युवक को जोर की लात मारी और धक्का देकर सीधा किया। बस की हेडलाइट ऑन थी और उसकी रोशनी अब सीधे उस युवक के चेहरे पर पड़ रही थी। उदित के हाथ अचानक कांपने लगे थे। बंदूक हाथ से छूटकर गिर गई। उदित नीचे बैठ गया और उस युवक का सिर अपनी गोद में ले लिया। उस युवक की आंखें बंद थीं। उदित के साथी अपने सरदार की इस हरकत पर हैरान थे। किसी को मारना उदित के बाएं हाथ का खेल था और आज पता नहीं उसे क्या हो गया था। क्यों वो उस युवक का सिर अपनी गोद में रखकर उसके चेहरे पर पानी छिड़क रहा था? ठंडी हवा चल रही थी, उदित न जाने कब का बेनकाब हो चुका था। इस मौसम में उदित के चेहरे पर इस कदर पसीना नजर आ रहा था, जैसे जेठ की दोपहरी हो। उस युवक को होश आ चुका था। इससे पहले वो उदित को देख पाता, उदित ने उसे सीने से लगा लिया और भर्राई आवाज में पुकारा मनोहर…..। मनोहर अगर पचास साल बाद भी उदित की आवाज सुनता तो उसे पहचान जाता। वो युवक मनोहर था। उदित के बचपन का दोस्त। उदित की ही तरह गरीब था वो, पढ़ाई तक के पैसे नहीं थे उसके पास। उसने मेहनत से ये मुकाम हासिल किया था। किसी को लूटकर अमीर नहीं बना था। मनोहर इसी बस में सवार होकर अपने गांव जा रहा था और आगे गिरीडीह में उसे उतरना था। मनोहर पढ़ा लिखा और समझदार था। पलक झपकते ही वो समझ गया कि उसका दोस्त उदित भटक चुका है। उदित के इस रूप को देखकर वो परेशान हो उठा था। उधर, उदित की आंखों के सामने मानो बीता हुआ पल जीवंत हो उठा था। वो ख्यालों में डूब गया था और वहीं रहना चाह रहा था। वो कहां से कहां आ गया था। उसे आज वो शाम याद आ गई थी…हुर्र….हट….हट….वो फिर से मनोहर के साथ गायें चराना चाहता था। मनोहर समझ गया था कि उदित व उसके साथ आए साथियों को कुछ लोगों ने बरगलाया है। उदित को भी समझ में आने लगा था कि उसने न जाने मनोहर जैसे कितने बेगुनाहों को ऐसा अमीर समझकर मौत के घाट उतार दिया था, जो गरीबों की छाती पर मूंग दलकर पैसा कमाते हैं। उदित को यकीन होने लगा था कि उसने न्याय के नाम पर घोर अन्याय किया था। उदित को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। मानो वो सीधे आसमान से जमीन पर गिर पड़ा था। उसके सारे सिद्धांत, मान्यता, विचार, आस्था मटियामेट हो चुके थे। मनोहर ने उदित को रास्ता दिखाया और आत्मसमर्पण के लिए राजी कर लिया। बड़ी मुश्किल से उदित अपने साथियों को मना पाया और अगले दिन पूरे दल के साथ गिरीडीह में एसपी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। उदित को अपने किए पर पछतावा था। उसके द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर शनत दा को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। उदित के सहयोग से पुलिस ने उस इलाके के पूरे नक्सली नेटवर्क को तोड़ दिया। 5 साल बाद सरकार की नीति के मुताबिक उदित व उसके कुछ साथियों को नया जीवन शुरू करने का मौका मिला। उदित अब गांव वापस आ गया था। अब पथरिया में बढ़िया स्कूल भी खुल गया था। मनोहर ने नौकरी छोड़ने के बाद यह स्कूल खोला था। स्कूल का नाम यूएम हाई स्कूल था। उदित मनोहर हाई स्कूल। उदित को सरकार की तरफ से पुनर्वास के लिए जो पैसे मिले थे, उससे वो अब गरीबों की मदद करता था। गांव में अब कारू की सूदखोरी का धंधा खत्म हो चुका था। हरिवंश को बुढ़ापे का सहारा मिल गया था। नक्सली बनकर उदित जो नहीं कर पाया था, वो अब कर रहा था। उसके दोस्त मनोहर ने उसे गांव व गरीबों की सेवा का मतलब समझा दिया था।

Caption Contest Winners

The Through The Looking Glass Caption Contest has now concluded.

Top Three Entries:
3. Afghan boys go a little too far when it comes to peeping in the girls locker room. 33 more words

Caption Contest

Weekend Caption Contest

Through The Looking Glass Caption Contest
(Source: EPA)

Caption this photo in the comments section. The winners will be posted Monday, April 14th. 29 more words

Caption Contest

The stone-pelters and Army 

​Yesterday, in a combat operation with a militant, the security forces were attacked with stones by locals in Kashmir. The Army chief had already warned the civilians in the past, and yesterday, security forces fired at the civilians, killing three of them. 392 more words

India

WSS Statement on Recent Blasts in Sukma

WSS Statement on Recent Blasts in Sukma 

 

14.3.2017

 

WSS condemns the IED blast in Sukma on 11.3.2017 in which 12 CRPF personnel lost their lives and several others, including members of a road-construction crew, were injured. 281 more words

Chhattisgarh

Afghanistan: IS Gunmen in lab coats storm military hospital, kill 30 people

Gunmen wearing white lab coats stormed a military hospital in Afghanistan’s capital on Wednesday, killing at least 30 people and wounding dozens in an attack claimed by the Islamic State group, 520 more words

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WSS Hindi Press Release on Kashmiri Women's Day of Resistance

कश्मीर हमारा पर कश्मीरी किसके? कश्मीरी महिलाओं के प्रतिरोध दिवस २३ फरवरी को एकजुटता की जरूरत

भारत के सेना प्रमुख जनरल रावत ने कश्मीर के नौजवानों को पिछले दिनों चेतावनी दी कि अगर वे किसी प्रकार से भी सेना के काम के रास्ते में आएंगे तो उन्हें भी राष्ट्र विरोधी मानकर उनके साथ सख्त कार्यवाही की जाएगी. पर इसमें तो कुछ भी नया नहीं है. कश्मीर पर हक़ जताने की भारत की मुहीम तो दशकों पुरानी है. वहां पर सेना और विभिन्न अर्धसैनिक दलों की भयंकर मौजूदगी भी उतनी ही पुरानी है. यही नहीं १९९० से सेना को यह अधिकार भी क़ानूनन रूप से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के तहत मिला हुआ है – सेना और अर्ध सैनिक बल किसी भी घर या जगह की तलाशी ले सकते हैं, मात्र शक की बिना पर किसी पर गोली चला सकते हैं और किसी को भी बगैर वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं. इस क़ानून के तहत की गयी कार्यवाई जवाबदेही से पूरी तरह से मुक्त है. साथ ही अगर सेना कोई ज्यादती करती है तो भी उसपर मुक़दमा चलाने से पहले सरकारी आज्ञा लेना पड़ती है.सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी बताती है कि भले ही कितना ही गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन रहा हो सेना पर केस चलाने की इजाजत एक बार भी नहीं मिली है.

मानो कानूनी छूट मिलते ही सशस्त्र बालों ने उसका दुरुपयोग करना शुरू कर दिया. २३ फरवरी १९९१ क़ी रात को राजपुताना राइफल्स रेजिमेंट ने कुपवाड़ा जिले के कुनान और पोशपोरा नाम के दो गांवों में तांडव मचाया. वहाँ ये टुकड़ियां तलाशी और पूछ–ताछ के लिए गयी थीं. आदमियों को पकड़ कर गांव से बाहर निकाला और उनके साथ हिंसा क़ी और उन्हें कठोर यातना भी दी. पर साथ ही गांव में घुसकर बच्चियों और हर उम्र क़ी औरतों के साथ बलात्कार भी किया.पत्रकारों, गांववालों और महिला संगठनों क़ी जद्दोजहद के बावजूद सेना के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई.

याद रखना होगा कि किसी भी हाल में कानून में किसी सैनिक को बलात्कार करने की कोई छूट नहीं मिली है. पर 1994 क़ी संयुक्त राष्ट्र संघ क़ी एक रिपोर्ट बताती है कि 1990-92 के बीच सुरक्षा बलों द्वारा ८८२ बलात्कार किये गए. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार १९९०–९९ के बीच सुरक्षा बलों को १०३९ केसों में मानवाधिकार के उल्लंघन का दोषी पाया गया. वारदातें तो अवश्य ज्यादा रही होंगी.

२० सालों से भारतीय सेना कुंण पोशपोरा क़ी सच्चाई से मुंह मोड़ती रही. प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए भी गांववालों को संघर्ष करना पड़ा. प्रशासनिक असमर्थता दिखाते हुए जांच भी कई बार टाली गयी. और जब जांच हुई तो बड़ी अनिच्छा से. और ८० औरतों क़ी गवाही और संचार माध्यमों क़ी फौरी रिपोटों के बावजूद भी इसे जांच ने एक फर्जी मामला बता दिया. बी जी वर्गीज क़ी अध्यक्षता में जो जांच समिति बनी उसने इस मामले को व्यापक धोखा कह दिया.

अंततः कहानी २०१३ में बदली जब वहां क़ी अदालत ने यह मामला फिर से खुलवाया. २२ साल तक भुक्तभोगियों के जख्म हरे ही रहे. २३ फरवरी का दिन यादगार बन गया उस संघर्ष का जो एक पीढ़ी से औरतें करती आ रही हैं और अब जाकर कुछ पाने क़ी उम्मीद रख सकती हैं. यह दिन कश्मीरी औरतों के प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाया जाता है.

कश्मीरियों के साथ इन २७ सालों में जो हुआ वह पूरे देश को शर्मसार करने के लिए काफी है. मात्र २०१६ में जन विरोध को इस तरह कुचला गया कि सुरक्षा बलों के हाथों १०० से अधिक लोग मारे गए और हजारों की तादाद में जख्मी हुए. इसी तरह से झूठी मुठभेड़ के खिलाफ २०१० में जन आंदोलन को कुचला गया था तब भी १०० से ज्यादा लोग मारे गए थे और हजारों घायल हुए थे. इसके पहले से वहां सेना इतने आदमियों को उठा चुकी है जो दशकों से गयब हैं कि वहां औरतों को संबोधित करने का एक नया नाम पैदा हो गया है – आधी विधवा – वे औरतें जो नहीं जानती कि उनके पति कहाँ हैं, जिन्दा कैद में हैं या मार दिए गए हैं. हज़ारों लोगों पर सेना का आक्रमण आतंकियों पर नहीं कश्मीरियों पर हमला है.

बलात्कार के मामले को रफा–दफा करने वाले श्री वर्गीस ने भी यह बात मानी कि कश्मीर में भारतीय सेना का व्यवहार एक कब्जेधारी सेना जैसा है जो कश्मीरियों को अपना दुश्मन मानती है और उन्हें घेरेबंदी में रखती है. कब्जाधारी सेना ने हर युद्ध में हारे हुए देश की औरतों का बलात्कार भी व्यापक पैमाने पर किया है और यही हकीकत कश्मीर की भी है. और आज भारत के सेना प्रमुख भी आम लोगों को देश विरोधी करार देकर उन्हें खुले आम धमकी दे रहे हैं.

सेना की मौजूदगी ने क्या हासिल किया वह कह पाना तो मुश्किल है पर वहां की आम जनता को इतना भड़का दिया कि वह अब खुले आम रावलजी की धमकी को धता बता रही है और दो दिन के भीतर ही उसने सुरक्षा बलों को बगैर कार्यवाही के लौटने पर मजबूर कर दिया.

शायद यह आतंरिक विरोध को दबाने का नया सैन्य तरीका हो पर यह स्पष्ट रूप से कश्मीर और कश्मीरियों को अलग–अलग मानता है और कश्मीरियों की कीमत पर भौगोलिक प्रभुत्व चाहता है. पर सच्चाई तो यह है की कश्मीरियों के बिना कश्मीर की कोई अहमियत नहीं ऐसे तो बर्बरता से दुनिया का कोई भी हिस्सा जीता जा सकता है. पर अगर कश्मीर और कश्मीरी दोनों चाहिए तो जवाब सैन्यीकरण में नहीं मिलेगा.

एक ही मार्ग खुला है जो वहां के लोगों के हक्कों की लड़ाई में साथ देने का है. तो धमकियों से परे हट कर कश्मीरी औरतों के प्रतिरोध में शामिल होकर उनके लिए भी देश को निर्भया जैसी एकजुटता दिखानी होगी.

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