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My world with you

There are times I lose faith,
In the things I can do,
When my hands stop moving,
And my mind smothers my fire.

I lose faith in my skills, 111 more words

Poems

Good morning white ninja

Be a good white ninja… getting horny 24/7
เป็นนินจาขาวที่ดี ต้องเงี่ยนได้ทั้งวัน ทั้งคืน


#just a pic


meet the real one.

Gay

Armoured Skeletons

Armoured Skeletons: FVG314

  • COMPANY: North Star
  • Sculptor: Nick Eyre’s? (Frostgrave)
  • Painter: Devin B

November 2016 278 more words

Show Off

The Daily Prompt: Ostentatious

I envy those who are ostentatious

They get to think that showing a facade that doesn’t exist changes everything

But this applies to all of us, in a way… 80 more words

Give someone else the chance- don't always steal the spotlight

It is important to give someone else an chance to learn what you have learnt or to develop a skill that they may not be so confident in. 58 more words

Life

सवाल क्या है.....?

-संतोष कुमार

सवाल क्या है?…. ये सबसे विकट सवाल है आज का. और ये सवाल सबसे है- अपने आप से, आप से, शायद सब से.हम सब के मन में हर दिन जाने कितने विचार जन्म लेते है, कितने द्वन्द, कितने सवाल, कितने विचार, कितने ख्याल. खुद से सवाल पूछते है और खुद ही जवाब देने का प्रयास करते है. पर वो ज्ञान ही क्या, जो  आप तक सीमित रहे, वो ज्ञान ही क्या जो आप औरो को न बता सके. उस ज्ञान के क्या मायने जब तक लोग आपको ग्यानी न समझे. हमारे विचार, हमारे ख्याल, हमारा ज्ञान हमारे लिए नहीं, औरो के लिए है. एक प्रदर्शनी है विचारो की. सिर्फ अनुभूति काफी नहीं, अभिव्यक्ति आवश्यक है.  हेगल ने जब स्वामी-दास द्वन्द के विचार का प्रतिपादन किया था तब उस विचार का आधारभूत बिंदु यही था कि व्यक्ति तब तक अपनी स्वतंत्रता के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकता है जब तक कि कोई अन्य व्यक्ति उसे स्वीकृति न दे. दास का होना और दास का व्यक्ति को अपना स्वामी समझना, व्यक्ति की स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है.

कहीं न कहीं हम भी कमोबेश ऐसे ही है. हमें भी तलाश है लोगों की जो हमारे विचारो को न केवल  सुने अपितु उसे निर्विवाद समर्थन भी दे. हम लोगों में अपने प्रशंसक व अनुयायी ढूंढते है. हम बहस करते है, चर्चा करते है न केवल इसलिए कि हमको लोगों से कुछ सीखना है, अपितु अपने विचार लोगों तक पहुचाने के लिए, और लोगों को अपना बुद्धिमता का स्तर बतलाने के लिए. इसी कारण हम ये भी मान लेते है अपने आप ही कि सामने वाला व्यक्ति हमसे कम बुद्धिमान है, उसका बौद्धिक  स्तर हमसे नीचे है. इससे दो विचार उभरते है हमारे मन में- एक कि सामने वाले व्यक्ति को ज्ञान देना हमारा नैतिक दायित्व है, और दूसरा क्यूंकि सामने वाला व्यक्ति हमसे कम बुद्धिमान है, ये हमारे विचारों को काटने में असक्षम है. समस्या तब होती है जब सामने वाला व्यक्ति भी आपके विषय में यही सोच रहा होता है. ऐसे में स्थिति कुछ ऐसी हो जाती है जहां दो व्यक्ति आपस में चर्चा तो करते है, लेकिन वो चर्चा ज्ञान की अभिव्यक्ति न होकर अहं की अभिव्यक्ति बन जाती है. कैसी होंगी वो सभा जहां सबके मुंह खुले हो, कान बंद, बुद्धि शिथिल और आत्मा मृत!!

प्रश्न उठाया ये था मैंने कि आखिर सवाल क्या है. किसी क्लास में, किसी सेमिनार में, किसी चर्चा में, किसी बहस में, हम सवाल तो पूछते है, और अच्छे सवाल पूछते है. पर क्या हम वास्तव में सवाल ही पूछते है? क्या हम वास्तव में जवाब ही जानना चाहते है? जब हम किसी से उसकी राय मांगते है तो क्या हम वास्तव में उसकी राय जानना चाहते है?  लगता तो नहीं है. जिस तरह सवाल पूछे जाते है, वो सिर्फ सवाल नहीं होते है, प्रश्न में लिपटा प्रदर्शन होता है. अपने ज्ञान का प्रदर्शन. सवाल तो सिर्फ एक लाइन का होता है, पर उसकी व्याख्या करने में ५ मिनट लगा देते है. मतलब साफ़ है, जवाब नहीं चाहिए बस ये कह दो कि जो हम कह रहे है वो सही है या वो ही सही है. सवाल पूछने के लिए व्यक्ति को ये  स्वीकार करना आवश्यक है जवाब देने वाला उस विषय में कम से कम उससे ज्यादा जानता है. पर अपने ही दोस्तों, निकट संबंधो के बीच इस बात को स्वीकार कर लेना मुश्किल है. हमारा अहं इस प्रक्रिया में आड़े आ जाता है. हम चाहे भी कितने भी अच्छे दोस्त हो ये स्वीकार करना बड़ा कष्टदायक होता है कि मेरा दोस्त मुझसे ज्यादा जानता है. तो हमारे सवाल वास्तव में सामने वाले के तर्क को काटना व उसका प्रत्युत्तर देकर सामने वाले को आपके प्रभुत्व को स्वीकार करने की परिपाटी बन जाती है. और जब हम किसी को अपने से अधिक ज्ञानी मान भी लेता है तब भी हमारा औचित्य ज्ञान अर्जित करने से अधिक उनकी नज़र में अपने लिए इज्ज़त पाना होता है. आप उनको ये एहसास कराना चाहते है कि आप भी कम ज्ञानी नहीं है. उनको भी, दूसरो को भी और सबसे बढ़कर खुद को भी.

क्लास में एक प्रतिद्वंदिता का माहौल बन जाता है, जहां जब कोई एक सवाल पूछता है (दूसरे अर्थो में अपने ज्ञान का प्रदर्शन करता है) तो दिल में एक बेचैनी घर करने लगती है, दिमाग सवालों का निर्माण करने का भीषण प्रयास करने लगता है, आँखों से इर्षा टपकती है, मुंह से अहंकार. और सवाल भाषा की चाशनी में लिपटी अहं की तृप्ति बन जाती है. और इस प्रयास से जब इंसान बाहर  निकलता है तो खुद ही से सवाल करता है. भाई ये बताओ कि सवाल क्या था….?

सवाल क्या है…..? ये ऐसा सवाल है जिसका जवाब मेरे पास तो नहीं है. आपके पास हो तो बताये.