Tags » Social Responsibility

How to Change Banks: My Changing Banks Checklist

If you follow my blog or my social media accounts, you’re aware that I recently changed banks. The process took me five months and I ended up paying about $50 in fees to do it. 755 more words

Essay

Open your eyes and SEE

As a member of the Diversity Service and Inclusion LEAD team we were encouraged to volunteer at the local rotating homeless shelter in Mt. Pleasant. The shelter is put on by the… 475 more words

Community

Sorry for Shaming

When I started out as a parent I didn’t realise that parents grow through their parenting as much as their children grow through being parented. I now understand that a little more. 528 more words

Life

How to Bless Our Cops?

I’m a strong supporter of cops. I have a sister, Amor, who is a police officer right now and some relatives who serve the uniform service. 566 more words

Real Life Heroes

Michigan in the Vaccination Toilet

This is a follow-up to a prior post on the anti-vaccination movement.  Recent surveys show that Michigan is now 46th in the nation in vaccinating our children and teenagers.   64 more words

Politics

कल शहीद दिवस था

कल शहीद दिवस था । मेरा फेसबुक एकाउंट भी बाकी देशवासियों के फेसबुक एकाउंट की तरह भावभीनी श्रद्धांजलि के संदेशों से भर गया । कुछ सन्देश थे जिनमें प्रेमपूर्वक शहीदों को याद किया गया और उनकी शहादत के लिए उनका शुक्रियादा किया गया । कुछ सन्देश ऐसे थे जो न जाने किन भावनाओं के उफ़ान से उपजे थे ।

उनमें बातें थी कि यदि हम भारत को पुनः विश्व गुरु बना सके तभी हमारे शहीदों की कुर्बानी को सही मायने मिलेंगे ।

क्या वाकई ? वाक़ई ! और … पुनः !

सबसे पहले तो मुझे यह नहीं यादआता कि भारत विश्व गुरु कब था ? किसने दी यह पदवी भारत को ?

और यदि यह एक सेल्फ़-प्रोक्लैमेड पदवी है तो भाई आपको किसने रोका है ? आप फ़िर से ले लीजिये यह पदवी । अपनी इन अजीब सी इच्छाओं और विचित्र से ऐतिहासिक ज्ञान के लिए अपने लाखों की शहादत के मायने पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया । यह कैसी श्रद्धांजलि है ? बड़ा मन होता है मेरा यह मानने को कि ऐसे लोग भी अपने ही किस्म के देशभक्त हैं और उन्होंने इसी पवित्र भाव के चलते ऐसी बात सोच डाली । अब कुसूर तो इस सोशल मीडिया का है जिसने उन्हें ताक़त दी है कि जो सोचो लिख डालो और शेयर कर दो । जिनके सर पर यह मटका फूटेगा वो खुद ही जाने ‘भागे हम या भीगे हम …..गीला हुआ जो सुखाना होगा ..चाहे जनाना या मर्दाना होगा…अटेंशन !

कुछ सन्देश ऐसे थे कि आज का युवा कैसा सुप्त और पथभ्रष्ट है । उसे २३ वर्षीय भगत सिंह को देखना चाहिए जिसने देश के लिए फांसी चूम ली ।

वाकई ! सुप्त ? पथभ्रष्ट ?

जिसके दिमाग की यह उपज है न जाने वो कौन ब्रीड का कुम्भकरण है ! आये दिन JNU और देश की बाकी यूनिवर्सिटीज के युवा अपनी जागृति का संकेत नए नए धमाकों से देते ही रहते हैं । कौन कहता है कि आज के युवा रक्त में जोश और बारूद नहीं है ? अगर आज के युवा को परिपक्व मार्गदर्शक नहीं मिलते तो क्या यह भी उसका ही दोष है ?

उस समय के भगत सिंह को राह दिखने वाले गाँधी जी, सुभाषचंद्र बोस, वल्लभभाई पटेल और भी कई परिपक्व लोग थे । उस जवानी के जोश को सही दिशा में इस्तेमाल करने वाले काबिल लोग थे । देश को एकजुट करके एक महाभियान छेड़ने वाले जुझारू लोग थे । जो लोग आज देश के युवा को यह ताना दे रहे हैं वो स्वयं किस आयुवर्ग में आते हैं ? दिशा देने वाले या दिखाई हुई दिशा पर चलने वाले ?

थोड़ा उत्तरदायित्व तो उनका भी बनता ही होगा इस पूरे समीकरण में । दुःख होता है जब लोग किसी की शहादत को सम्मानित करने के लिए दूसरों को अपमानित करके तुच्छ बताने लगते हैं । न जाने ऐसे लोग वाक़ई श्रद्धांजलि देना चाहते हैं या बस मौके की तलाश में होते हैं, अपने अन्दर के जहर को उगलने के लिए । इस तरह के संदेशों से अनजाने में ही लोग शहीदों और उनकी शहादत को मैला करने की कोशिश करते हैं ।

यदि ऐसे दिवस मनाने से आपकी देशभक्ति जगती है तो अपने गिरेबाँ में झांकिए और एक छोटा सा ही सही मगर सही दिशा कदम बढ़ाकर अपनी श्रद्धांजलि दें । अन्यथा ऐसे निपट मूर्खता भरे सन्देश न लिखें बस प्रेमपूर्वक उन्हें याद करें । दूसरों पर कीचड़ उछालने को तो बहुत दिन मिल जाते हैं सबको । यह शहीद आपके श्रद्धांजलि संदेशों के लिए शहीद नहीं हुए थे न ही इसलिए शहीद हुए थे कि उनकी शहादत की आड़ में आपअपने गंदे खेल खेलें । हो सके तो थोड़ा सा अपने विवेक का प्रयोग करें और समाज में खिन्नता बढ़ाने का प्रयास रोकें ।

Evaluation

Social Responsibility in the New Age

Since the invention of media, there have been plenty of changes in its usage. In contrast to the classic mass media like television or radio, todays use is not only about receiving but producing information as well. 488 more words