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One future - many possibilities

The grandeur of quantum mechanics is the attempt of a century’s worth of scientific intellect directed towards divining the workings of the universe. The scientists have been poring into their telescopes looking into our past, physicists have been toiling over whiteboard and notepads, working out the mathematics to imagine the mind boggling beauty of the universe. 878 more words

Musings

Does a new social revolution stand from kitchens?

Published on ISPI Energy Watch – March 9, 2015

Appendix with statistical analysis

Do dishwashers are a symptom of women emancipation? According to a recent report of the Italian Institute of Statistics ( 522 more words

Retail Electricity Markets

Ring For Jeeves

It is difficult to imagine Jeeves without Bertie and one would be within rights to wonder what would be results of such an adventure. Well Wodehouse is a master plotter and the madness in ‘Ring For Jeeves’ is indeed a corker.

734 more words
Review

The Fourth Monday

Picking the Card: 

As I have been going through this blogging process, I have also had the joy of using social media as an advertisement thread. 635 more words

BoomBoom Cards

#mustread : The 6 Grand Illusions That Keep Us Enslaved

By: Sigmund FraudWaking Times

“In prison, illusions can offer comfort.” Nelson Mandela

For a magician to fool his audience his deceit must go unseen, and to this end he crafts an illusion to avert attention from reality.  1,509 more words

FEEL

सामाजिक क्रांति और भारतीय संविधान : एक अद्वितीय प्रयोग

This post was first published on The Logos Blog.

असंख्य सामाजिक कुरीतियों पर अंकुश लगाने की ज़िम्मेदारी संविधान के लिए एक कठोर परीक्षा है

आम तौर पर ‘क्रांति’ और ‘संविधान’ को विरोधार्थी सन्दर्भों में समझा जाता है । क्रन्तिकारी बदलाव के बारे में सोचते हुए अक़्सर हमारे मन में आंदोलन, जोश-ख़रोश, हिंसा और विशाल जनसमूहों के चित्र सामने आ जाते हैं । वहीं संवैधानिक बदलाव के साथ हम अक़्सर समझौते, धीमें बदलाव, विचार-विमर्श वगैरह जैसी मंद क्रियाएँ जोड़ देते हैं । केवल भारतीय संविधान ही एक ऐसा प्रयोग है जो इन दोनों भिन्न धारणाओं को व्यापक तौर पर साथ ला सका है ।

संविधान को सामजिक बदलाव का मुख्य एजेंट बनाना न केवल एक साहसिक प्रयोग था, यह एक अद्वितीय कदम भी था । साहसिक इसलिए क्यूंकि १९४७ तक भारतीय समाज नाना प्रकार की कुरीतियों की वजह से खोखला हो चूका था । जातिवाद, साम्प्रदायिकता, भूखमरी और गरीबी ने समाज को कमज़ोर बना दिया था । ऐसे वक़्त पर हमारे संविधान के रचयिताओं ने इन समस्याओं का ख़ात्मा करने का बीड़ा उठाया । साथ ही यह कदम अद्वितीय इसलिए था क्यूंकि उस वक़्त तक किसी भी संविधान ने क्रान्ति लाने का जिम्मा नहीं उठाया था । उदराहणार्थ , अगर हम अमरीकी संविधान पर नज़र डाले तो पता चलता है कि वह एक कन्सर्वेटिव रचना है । उसमें  केवल उस समय के मानदंडों की रक्षा करने का भाव है ।

संविधान रचयिताओं की यह असाधारण पहल ज़रूरी भी थी और शायद सही भी थी , किन्तु इस प्रयोग के कुछ साइड इफेक्ट्स भी हुए जो आज तक चले आ रहें हैं और जिन्हें समझना ज्ञानवर्धक होगा ।

एक, इस क्रांतिकारी बदलाव की कोशिश ने पूरे संविधान की वैधता पर सवालिया निशान लगा दिए । जो लोग सदियों से जात-पात या दहेजप्रथा जैसी दक़ियानूसी बातों में विश्वास रखते थे , वे यह पूछने लगे कि चंद लोगों के कल लिखे हुए कुछ  पन्नें आखिर किस रूप से प्राचीन रीति रिवाजों से बेहतर हैं ? ऐसा सोचने वाले आज भी मौजूद हैं खाप पंचायतों के रूप में जो गोत्र और जाति जैसी मनघड़ंत बातों पर आँख मूँद कर विश्वास रखने पर आमादा हैं । और जब कुछ लोग संविधान के एक क्षेत्र को नकारने लगें तो इस अवैधता का डर संविधान के अन्य क्षेत्रों को भी सताने लगा । उदाहरणार्थ, जो संविधान की छुआछूत उन्मूलन के सविचार के विरोध में थे, वह संविधान के धर्मनिरपेक्ष प्रावधानों को भी धिक्कारने लगे ।

दूसरा, सामाजिक परिवर्तन का जिम्मा उठाने की वजह से भारत गणराज्य का काम कई गुना बढ़ गया । कौटिल्य अर्थशास्त्र में कहा गया है कि राज्य के अभाव में मत्स्यन्याय की अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति अपने बल के आधार पर अपने से कमज़ोर व्यक्तियों के साथ जैसा चाहे व्यवहार कर सकता है । अतः राज्य का स्थापन मत्स्यन्याय की स्थिति का अंत करने के लिए हुआ। चाहे राजतंत्र हो या लोकतंत्र, राज्य की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है हर व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना, चाहे वह कितना ही कमज़ोर क्यों न हो । इस धारणा को rule of law कहा जाता है और हम अपनी ओर ही देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि हमारा गणराज्य इस मुख्य उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाया है । ऐसी नाज़ुक अवस्था में भारतीय गणराज्य ने सामाजिक परिवर्तन का एक और महाकार्य अपने कन्धों पर ले लिया जिससे राज्य की कठिनाईयाँ और बढ़ गयी । उदाहरणार्थ, एक पुलिस अफसर का कार्य सिर्फ कानून की रक्षा करने तक सीमित नहीं है – उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि दहेज, छुआछुत जैसे प्रकरण समाज में ना हो पाए ।

इन दोनों नकारात्मक पहलुओं का तात्पर्य यह नहीं कि हमें अपने संवैधानिक मार्ग त्याग दे, बल्कि हमें इस बोल्ड प्रयोग को सफल बनाने की और दृढ़ता से मेहनत करनी चाहिए । शायद हमारा गणराज्य निर्दोष नहीं , लेकिन यह हमारा सर्वश्रेष्ठ विकल्प हैं । इसके सारे पहलुओं पर रोशनी डालने से हम इसको बेहतर समझ पाएंगे । आख़िर इसकी सफलता में ही हम सबकी कामयाबी है ।