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Prelinks Review!

When you’re strolling through London, you can get any kind of dodgy stranger come up to you with some pretty weird requests, and believe me, you don’t want to know any of the ones I’ve had. 604 more words

भारतीय परम्परा के अनुसार ईश्वर उपासना में सर्वप्रथम गुरू पूजन किया जाता है । हमारे संस्कृति में हमेशा से ही गुरु जी का एक विशिष्ट स्थान रहा है, हम जब अपने स्कूल जाते थे  तो सर्वप्रथम वहां ऊपस्थित  सभी गुरु जी का चरण स्पर्श करते थे, गुरु  भी  पुरे  निष्ठा से  हमें  आशीर्वचन देते  थे , परन्तु  दुर्भाग्यवश अब आधुनिकता के भेड चाल हम पाश्चात्य शिक्षण पद्धति को अपना चुके है और उसका  नतीजा  ये है की अब हमारे बच्चे  अपने माता पिता का अनादर करने लगे है तो भला हम किसी और के बच्चे से आदर का भाव कैसे उम्मीद कर सकते है । अतः अब यह नितांत आवश्यक है की हम अपने बच्चो को अपने अतीत से जागरूक करवाए, उन्हें बताये की वेद वंदना के साथ साथ राष्ट्रवंदना का स्वर भी दिशाओ में गूंजना आवश्यक है ।   मित्रो परमात्मा का साक्षात्कार तो इतना सरल नही है लेकिन वही परमात्मा इस संसार में साकार रूप में आपकी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में सहायता करता है। गुरूदेव के मार्गदर्शन से ही साधक ईश्वर को प्राप्त करता है। बिना गुरू के ईश्वर को पाना इतना सरल नही है। यदि ईश्वर को पाना इतना सरल हो जाये तो ईश्वर का महत्व ही इस संसार से समाप्त हो जायेगा। यदि ईश्वर की अनुभूति शीघ्र हो जाये तो साधक को इस बात का अंहकार हो जाता है एवं उसकी आध्यात्मिक प्रगति रूक जाती है, इसीलिए ईश्वर ही स्वप्न व ध्यान में संकेत द्वारा गुरू रूप में दर्शन देकर मार्ग प्रदर्शन करता है। इष्ट ही गुुरू रूप में दर्शन देता है। गुरू ईश्वर की महिमा का वर्णन करता है एवं इष्ट ही गुरू रूप में दर्शन देकर गुरू की महिमा बढ़ाता है । आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा कहते हैं। भारत भर में यह पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन गुरुपूजा का विधान है।वैसे तो दुनिया में कई विद्वान हुए हैं परंतु चारों वेदों के प्रथम व्याख्या कर्ता व्यास ऋषि थे, जिनकी आज के दिन पूजा की जाती है। हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यासजी ही हैं। अतः वे हमारे आदिगुरु हुए, इसीलिए गुरुपूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।उनकी स्मृति को ताजा रखने के लिए हमें अपने-अपने गुरुओं को व्यासजी का अंश मानकर उनकी पूजा करके उन्हें कुछ न कुछ दक्षिणा देते हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि महात्माओं का श्राप भी मोक्ष की प्राप्ति कराता है। यदि राजा परीक्षित को ऋषि का श्राप नहीं होता तो उनकी संसार के प्रति जो आसक्ति थी वह दूर नहीं होती। आसक्ति होने के कारण उन्हें वैराग्य नहीं होता और वैराग्य के बिना श्रीमद्भागवत के श्रवण का अधिकार प्राप्त नहीं होता। साधु के श्राप से ही उन्हें भगवान नारायण, शुकदेव के दर्शन और उनके द्वारा देव दुर्लभ श्रीमद्भागवत का श्रवण प्राप्त हुआ।इसके मूल में ही साधु का श्राप था। जब साधु का श्राप इतना मंगलकारी है तो साधु की कृपा न जाने क्या फल देने वाली होती होगी। अतः हमें गुरूपूर्णिमा के दिन अपने गुरु का स्मरण अवश्य करना चाहिए।

Interesting Facts

How to Master the Listening Test

For those hasn’t taken a listening test, it can be like playing chance, and probability sometimes. You need to prepare them by writing and organising notes from the lectures, tutorials, and readings. 1,518 more words

Studying

मानव जीवन में शिक्षा का अर्थ :-

मित्रो शिक्षा शब्द की उत्पति सभी भाषा की जननी संस्कृत भाषा के “शिक्ष” धातु से बना है। जिसका अर्थ है सीखना या सिखाना। “शिक्षा” शब्द का अंग्रेजी समानार्थक शब्द “Education” (एजुकेशन) जो की लेटिन भाषा के “Educatum”(एजुकेटम) शब्द से बना है तथा “Educatum”(एजुकेटम) शब्द स्वयं लैटिन भाषा के E (ए) तथा Duco (ड्यूको) शब्दों से मिलकर बना है। E (ए) शब्द का अर्थ है ‘अंदर से’ और Duco (ड्यूको) शब्द का अर्थ है ‘आगे बढ़ना’। अतः “Education” का शाब्दिक अर्थ ‘अंदर से आगे बढ़ना’ है।  इसी प्रकार लेकिन लैटिन भाषा के “Educare”(एजुकेयर) तथा “Educere” (एजुशियर) शब्दों को भी “Education”(एजुकेशन) शब्द के मूल के रूप में स्वीकार किया जाता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि “शिक्षा” शब्द का प्रयोग व्यक्ति या बालक की आन्तरिक शक्तियों को बाहर लाने अथवा विकसित करने की क्रिया से लिया जाता है।

मित्रो दुर्भाग्यवश आज की शिक्षा सिर्फ सुचना तक सिमित रह गयी है, हर माँ बाप अपने बच्चो को सिर्फ व्यावसायिक पाठ्यक्रम ही पढ़ा रहे है जिससे बच्चे जल्दी से जल्दी नोट छापने की मशीन बन सके । दोस्तों वर्तमान की शिक्षा व्यवस्था में अगर जरुरी बदलाव नही लाया गया तो वो दिन दूर नही जब आने वाली पीढ़ी अपने गौरवशाली स्वर्णिम भारत के इतिहास को भूलते हुवे अपना नैतिक उत्थान नही कर पाएंगे।

शिक्षा की परिभाषायें :-

पूज्य स्वामी विवेकानंद के अनुसार, “मनुष्य में अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है”

महात्मा गांधी के अनुसार, “शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक या मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क या आत्मा के

सर्वांगीण  एवं सर्वोत्तम विकास से है।”

दार्शनिक फ्रावेल के अनुसार, “शिक्षा एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक बालक अपनी शक्तियों का विकास करता है।”

अरस्तु के अनुसार, “स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण करना ही शिक्षा है।”

हरबर्ट स्पेन्सर के अनुसार, “शिक्षा से तात्पर्य है अन्तर्निहित शक्तियों तथा बाह्य जगत के मध्य समन्वय स्थापित करना है।”

पेस्टालाजी के अनुसार, “मानव की आंतरिक शक्तियों का स्वभाविक व सामंजस्यपूर्ण प्रगतिशील विकास

ही शिक्षा है।”  परन्तु आप अगर आज के वर्तमान शिक्षा पद्धति को देखे तो उपरोक्त महापुरुष के कथन से दूर दूर तक कोई रिश्ता नही है, और यही कारण है की आज के युवा बेरोजगार होते जा रहे है ।  अगर हर युवा अपने जन्मजात क्षमता और प्रतिभा को जानते हुवे अपने कौशल का विकाश करे तो कोई भी युवा बेरोजगार नही रहेगा, अतः आप चाहते है की हमारे देश के युवा बेरोजगार न  रहे तो आज ही संपर्क करे भाग्याशिला माइंड अकादमी & कंसल्टेंट्स प्रा० लि० और जाने अपना जन्मजात क्षमता एवं प्रतिभा , ज्यादा जानकारी के लिए संपर्क करे आनंद मोहन  – 09899483269

Interesting Facts

Budgeting FAQs for students

Budgeting FAQs

Hi everyone. I am truly enjoying the nice and warm weather we have been having lately. I like it when the weather is not too hot but warm enough to be wearing t-shirts and shorts outdoors. 1,164 more words

Student

RGU Student on a Budget: Eating out

I love food. As a student I think there’s this misconception that we can’t afford to do anything fun and our only indulgence is an upgrade from Asda’s own brand beans to Heinz. 358 more words

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Best College Freshman Tips!

So, June 8th marks the last day of my freshman college year. I study English language and Literature, and I really liked the courses and the teachers and everything. 1,031 more words

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