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book review: Taunt by Claire Farrell

The second in this series, we find Ava still struggling to understand what has happened to her. Getting a reprieve from the council, did not make her life any easier. 124 more words

Book Review

Corners

Waking up to fear that I can’t make a decision spins my head. The world is full of versions, subjections we throw at objects and history. 336 more words

Writing

B’S POETRY CHALLENGE #18

(Wednesday 31st May – Tuesday 6th June)

TAUNT

Rules:

  1. Each week I will post one word that will serve as an inspiration for a poem.
  2. 68 more words
Poetry

Sacred Petals

Come, objectify me,
Put your finger on my petal,
Unlace me
And unchain your demons-
For they need these,
The petals,
My petals,
Her petals, 53 more words

Poetry

मतलब

उसके स्वर की मृदुलता मिठाई पर लगे वरक की तरह अलग दिखती थी.
” खाना खा लिया आपने?”
इस सवाल में चाहे सुनने वाले को अपनापन दिखे, पर विभा को रोज़ इसका नुकीला सिरा चुभता था. उसने कभी प्रियम से पहले खाना नहीं खाया, वह जानता था. इस सवाल का सीधा मतलब था मेरा खाना परोस दो, तुम्हारी तुम जानो.
“मेरी ब्लू शर्ट में बटन लगा दिया?”
विभा जानती थी इस सवाल में कील कहाँ है. प्रियम को पक्का पता है दो बार याद दिलाने के बाद भी रमा ने अभी तक बटन नहीं लगाया है. ब्लू शर्ट शायद उसे पहनना भी नहीं हो, पर रमा को अहसास दिलाना है; तुम्हें मेरा बिल्कुल ख़याल नहीं है.
” यह मनोज ( रमा का भाई) को बोल दो ना कि जब भी आए कुछ ना कुछ लाना ज़रूरी नहीं है.”
इस सीधी सी बात में कितने दांते है, वह जानती थी. प्रियम का मतलब था मैं जानता हूँ मनोज यहाँ कुछ ना कुछ लेने के लिए आता है, तो ये बेमतलब की चीज़े लाने का दिखावा किसलिए करता है.
” मैं जो हॉंगकोंग से टी-शर्ट लाया था, वो दे दी उसको?”
यह सवाल कम और प्रहार ज़्यादा था. जब उसके लिए लाए थे दे ही दी होगी. कहो ना यह जानना है कि और क्या क्या दे दिया टी-शर्ट के साथ. या तो मुझे बताओ, या फिर भाई के हेज़ के गुनाह को महसूस करो.
कांताबाई पोंचा लगाते हुए बोली,” कितने अच्छे हैं साब. हर बात कितने प्यार से पूछते हैं. और कितना ध्यान रखते हैं आपका, है ना? मेरा मर्द तो हर बात पे ऐसे चिल्लाता है कि दिल करता है कुछ उठा के उसके सर पे मार दूं.”
विभा बोली,” कांता उधर हवा आ रही है?”
“नहीं तो मेडम, बिल्कुल भी नहीं.”
“ज़रा इधर आओ तो.” विभा का स्वर भारी था.
“….. मैं यहाँ खिड़की के पास बैठी हूँ, यहाँ भी बिल्कुल हवा नहीं है. है ना?
कांता मुँह बिचका कर वापस पोंचा लगाने चली गयी. सोच रही थी, ‘मर्द डाँटता पीटता रहे ना तो ही औरत का दिमाग़ ठीक रहता है रे बाबा. नहीं तो खिसक जाता है थोडा. खिड़की के पास हवा नही आ रही तो मैं क्या करूँ. उन्ह!’

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