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Toilet, an intelligent spot...!!

नमस्ते,

इस लेख़ में हम चर्चा करेंगे की व्यक्ति बुद्धिमान कैसे बनता है ;

बहूत समय पहले ऐसा कहा जाता था की बुद्धिमान लोग पैदा होते है, बनाए ऩही जा सकते और यह एक हद तक सही भी था  पर थॉमस एडिसन, न्यूटन, शेक्स्पीयर और इनकी तरह कई लोगो ने सिद्ध कर दिया की बुद्धिमान बना जा सकता है, इसके लिए आपको पैदाइशी अच्छे चलने वाले दिमाग़ की आवश्यकता नही होती है.

अब हम पिछले कुछ सौ वर्षो के इतिहास को देखे तो बुद्धिमान बनने वालो की संख्या पश्चिम देशो में सर्वाधिक रही है, और पिछले कुछ एक-दो दशक से भारत में भी अचानक बुद्धिमानो की बाड़ सी आई हुई है, जिसमे एक प्रजाति सॉफ्टवेअर इंजिनीयर्स की है, वैसे व्यक्ति सॉफ्टवेअर इंजिनियर बनने के बाद अपने आप को पैदाइश बुद्धिमान समझने लगता है वो एक अलग चर्चा का विषय है.

सो ऐसा पिछले कुछ वर्षो में क्या हुआ कि हमारे यहा भी बुद्धिजीवी बनने लगे और फॅक्टरी से एक के बाद एक निकलने लगे, इसके लिए कुछ रिसर्च की गयी और वर्षो की रिसर्च के बाद कुछ चौकाने वाले तथ्य और आँकड़े सामने आए जो की काफ़ी असामान्य थे और अविश्वसनीय भी, पर गहन पड़ताल के बाद यह साबित हो गया की बुद्धिमान बनने के लिए जो प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से अपनाई गई थी वो एकदम सटीक थी और आगे आने वाले कई वर्षो तक उसका कोई विकल्प नही मिलेगा बल्कि इसमे और उन्नति होने की आशा है.

अब आपके मन मे भी तीव्र ईच्छा जाग्रत हो रही होगी की आप भी और बुद्धिमान कैसे बन सकते है, क्योंकि बुद्धिमान कहलाना तो सबको पसंद होता है फिर चाहे आप गधे को भी बुद्धिमान कह दे तो वो एक वास्तविक बुद्धिमान से ज़्यादा अच्छा पर्फॉर्मेन्स देकर दिखाने की कोशिश करेगा और वैसे आजकल जमाना भी स्मार्ट का ही तो है जैसे स्मार्ट फ़ोन, स्मार्ट सिटी, स्मार्ट वर्क, स्मार्ट होम और ना जाने क्या क्या ……..!!

तो आइये अब जानते है कि वो फॅक्टरी कौन सी है जॅहा से बुद्धिमानी में इज़ाफा होता है और मनुष्य दिन प्रतिदिन ज़्यादा बुद्धिमान होता चला जाता है, तो वो कोई खाने की वस्तु, दवाई या रसायन मिश्रण नही है वो है आपका गुसलखाना , जी हाँ जिसे आप वॉश रूम या बाथरूम के नाम से भी जानते है, शायद आप चौंक गये होंगे वैसे आप इसे अलग अलग नाम से अपनी सुविधनुसार पुकार सकते है पर काम अंदर जाकर हर मनुष्य एक ही करता है,

अब आप सोच रहे होंगे की टॉयलेट तो हर किसी के घर में होता है तो सभी बुद्धिमान क्यों नहीं है सो आप एकदम सही सोच रहे है इसके जवाब में आपका टॉयलेट कूछ विशेषताओ के साथ होना आवश्यक है जैसे की टॉयलेट पाश्चात्य शैली का हो, हवादार हो,प्रकाश की व्यव्सथा हो, उसके साथ थोड़ा बड़ा भी हो जैसे कुछ अन्य आवश्यक वस्तुए भी रखी जा सके और हाँ, घर में सदस्य भी ज़्यादा नही होने चाहिए ना तो समय की पाबंदी की वजह से आप अपने इच्छित समय पर और इच्छित समय तक नही बैठ सकते जिससे बेहतरीन विचारो को पनपने के लिए माकूल मौसम नही मिल पाता , अब थोड़ी देर सीट पर सुकून से बैठेगा बंदा तभी तो सोचेगा कुछ वर्ना आजकल सोचने का समय किसके पास है, सभी लोगो को सोच से भी ज़्यादा काम है.

कृपया यहाँ अवगत (इनफॉर्म्ड) रहे कि शौच क्रिया को भावनात्मक स्वास्थ्य की वजह से उस क्रिया से संबोधित किया गया है.

आएँ अब इस प्रक्रिया को बारीकी से समझते है कि कैसे धीरे धीरे व्यक्ति बुद्धिमान होता है , सर्वप्रथम जाने अनजाने जब व्यक्ति उस क्रिया (पाश्चात्य) को अपनाता है तो उसका सुबह का ब्रश तकरीबन वही हो जाता है एक पंथ दो काज की तरह और फिर व्यक्ति काफ़ी सहज होता है बैठने में और उसे पता होता है की वो क्या कर रहा है परंतु दिखता नही है और यह स्तिथि काफ़ी अनुकूल हो जाती है कि वह गर्दन को 360 डिग्री भी घूमा ले तो भी दिखता नही की क्या कर रहा है बजाए की भारतीय शैली के क्योंकि भारतीय शैली में गर्दन ज़्यादा देर तक उपर नही रख सकते और जब जब 90 डिग्री गर्दन नीचे की तरफ घूमती है तब आप सॉफ देख पाते है कि क्या हो रहा है और यह स्तिथि कई सौम्य और ब्रांडेड लोगो के लिए काफ़ी असहजता उत्पन्न कर देती है इसीलिए भौतिक और वैचारिक स्वछ्ता को ध्यान में रखते हुए लोगो ने पश्चात्य शैली की बैठक उस क्रिया के लिए अपनाना शुरू कर दी, वैसे महानगरॉ के बाद द्वितीय व तृतीय श्रेणी के शहरो में इसका तेज़ी से अनुसरण हुआ और अब बैठे बैठे क्या करे? क्योंकि जो काम वहाँ बैठकर किया जाता है वह तो अपने आप हो जाता है, सो कुछ तत्कालीन विदेश से लौटे और नवधनाड्य वर्ग के लोगो ने उस वक़्त पर अपने समय की बचत के लिए अख़बार पढ़ना शुरू किया और यहा से इस प्रक्रिया को बेहतरीन मोड़ मिलते ही यह प्रक्रिया अपने चरम पर पहुँच गयी, एक वक़्त पर समय बचाने के लिए अख़बार पढ़ा जाता था और अब समय निकलकर अंदर बैठकर बहूत कुछ पढ़ा और गढ़ा जाता है,

जैसे अपनी नौकरी या व्यवसाय की योजना, अपने गर्ल / बॉय फ़्रेंड से सेटिंग की योजना या फिर चेटिंग वग़ैरह, वग़ैरह; इस तरह यह से यह प्रक्रिया सभी वर्गो में काफ़ी संक्रमित हो चुकी है और हर व्यक्ति विशेष अपनी आयु , लिंग, औहदा और तत्कालीन समझ के हिसाब से इस सुविधा का उपयोग कर रहा है, अब यहा हम उस क्रिया की दोनो पद्धतियो के कुछ मुख्य अंतर पर चर्चा करेंगे, जैसे यह अति आवश्यक हो जाता है की जब आप उस क्रिया के लिए जाए तो कोई भी व्यवधान ना हो और आप अपने इच्छित समय पर और इच्छित समय तक बैठ सके यहाँ भारतीय पद्धति में कमर और घूटने हमारी जीवन शैली की वजह से एक उम्र के बाद जवाब दे जाते है सो ज़्यादा देर तक बैठना संभव नही हो पाता और विचारो के पनपने का माकूल मौसम तैयार नहीं हो पाता यहाँ एक बात गौर करने लायक है की कब्ज और बवासीर जैसी बीमारियाँ भी एक अभिशाप नही वरदान साबित होती है क्योंकि आपको ज़्यादा देर तक बैठना होता है और बुद्धिमान बनने की पहली शर्त यही तो है, जो लोग चाल में रहते है या सरकारी या सुलभ स्थलो का उपयोग उस क्रिया से मुक्त होने के लिए करते है तो वहाँ निर्धारित समय होने की वजह से बुद्धिमान बनने को मौका अति सूक्ष्म होता है,

अब गाँवो से देखे तो काफ़ी कम बुद्धिमान निकलते है वजह वही की उस क्रिया के लिए गाँवो में खुली जगह का इस्तेमाल होता है अब अगर पेट ज़्यादा खराब हो या पिछली रात किसी भोज आयोजन (रिसेप्शन) में गये हो तो अधिक खाने की वजह से कई बार स्थान परिवर्तन करना पड़ता है जो विचारो के लिए काफ़ी पीड़ादाई और रुकावट डालने वाला होता है ,और ट्रेन की पटरियों से सटी बस्तियों में सुअरों के आतंक की वजह से डंडा लेकर बैठना पड़ता है एवं सुअर दिखते ही कुशलता से इसका इस्तेमाल करना पड़ता है जो ध्यान को भटकाता है ;

सो यहाँ आप मुख्य अंतर से पूरी तरह अवगत हो चुके है ,अब इसकी प्रामाणिकता तब और मजबूत हो जाती है जब कुछ नामचीन महानुभावो के अनुभव सामने आते है जैसे कहा जाता है कि हिटलर अपनी काफ़ी सारी योजनाए वही बैठकर बनाता था, खैर….. यह तो इतिहास है और आज के सन्दर्भ में देखे तो हमारे बॉलीवुड  के मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर ख़ान साहब थ्री ईडियट नामक फिल्म में सीट पर इंजिनियरिंग की किताब के साथ दिखाए गये थे, और हमारे किंग ख़ान साहब तो एक टीवी शो पर स्वीकार कर चुके है कि वो अपनी सारी योजनाए वही उसी क्रिया की दौरान बनाते है, इसी क्रम में अमिताभ बच्चन और कई अन्य राजनेता तक शामिल है अगर लिस्ट बनाई जाए तो कई पन्ने भर जाएँगे.

सो इससे लब्बे लुआब यह निकलता है कि अब एक नया ट्रेंड जन्म ले चुका है, वो यह कि स्टडी रूम पूरी तरह से शिफ्ट हो चुका है और यह ट्रेंड अपना शैशव काल पूरा करते हुए चुपचाप अपने पैरो पर चलाने लगा है एवं जैसे जैसे बड़ा होता जाएगा तो समाज में चारो ओर बुद्धिमान लोग पाए जाने लगेंगे, वैसे इस विधि वाले कुछ तत्कालीन बुद्धिमान आप रोज रात 8 से 9 बजे तक अलग अलग टीवी चेनल्स पर रोज एक नये विषय पर बहस करते देखे जा सकते है.

अंत में यही कहेंगे की आजकल इसी दिशा में व्यक्तिगत स्तर पर काफ़ी खोज और सुधार हो रहे है और इसका सारांश यही है की उस क्रिया के लिए पाश्चात्य शैली अपनाए और “कुछ वक़्त तो गुज़ारिए अपने संडास में” जहाँ आप अपने आप से रूबरू होंगे और अपनी बुद्धिमत्ता का न्यायोचित उपयोग कर पाएँगे,

 “उस क्रिया को अपना थोड़ा वक़्त दीजिए और वह क्रिया आपको बुद्धिमानी देगी”

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धन्यवाद.